चुप चाप कही जब सो जाती है ,मीठे सपनो में खो जाती है ।
दर्द बहुत जब बढ़ जाता है ,
आंखे हैं की रो जाती हैं ।
कड़वी बाते सभी पुरानी,
नये प्यार में धो जाती हैं ।
दो फूल खिले हो जिस आँगन ,
खुशियाँ वाही पे हो जाती हैं ।
चुप चाप कही जब सो जाती है ,रिश्तों की भाषा और अनुवाद की सांस्कृतिक चुनौती नीलूफ़र ख़ोदजाएवा के ‘Semantics of Kinship Terms as a Form of Address in Uzbek Translations...
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