धमाल : संघर्ष का इकबालिया बयान । सूफी संगीत के प्रभाव से जो गायन - शैली भारत में विकसित हुई उनमें ‘कव्वाली’ प्रमुख रही है। कव्वाली के साथ ही गुजरात के ‘सिद्दी’ संप्रदाय के नृत्य और गायन शैली ‘गोमा’ और ‘धमाल’ भी सूफियों की परंपरा से ही विकसित हुए हैं। पश्चिमी गुजरात के राज पीपला जंगलों के नजदीक गोरीपीर ( सोलहवीं शताब्दी )की खानकाह है। सिद्दी पूर्वी अफ़्रीका के लोग हैं,जो गुजरात, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में स्थायी निवास करते हैं। ‘मलंगा’ एक अफ़्रीकी मूल का वाद्ययंत्र है। ‘गोमा’ शब्द सवाहिली ( Swahili) भाषा का है जिसका अभिप्राय धार्मिक उत्सव मनाने से है। अफ्रीकी मूल के सिद्दी समुदाय के इस लोक नृत्य में विशिष्ट मुखाभिनय और वन्य जीवन से अनुप्राणित आहार्य के साथ संगीत की जादुई लय-ताल का समावेश विशेष प्रभाव उत्पन्न करता है । ‘धमाल’ एक धार्मिक नृत्य की शैली रही है जो कि 19 वी शताब्दी से हिंदू - मुस्लिम सभी द्वारा समान रूप से मनायी /प्रस्तुत की जाती रही है। वैसे धमाल नामक एक शैली खुसरो ने शुरू की थी । इस शैली में लोग खड़े होकर अपने पैरों से एक...
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।