तुम से तुम ही को चुराने क़ी आदत में जो कुछ बातें शामिल हैं वो हैं - तुमसे मिलना तुम्हे देखना तुमसे बातें करना और जब ये संभव न हों तो तुम्हें सोचना तुम्हें महसूस करना या कि तुम पर ही कविता लिखना तुम अब मेरे लिए जीवन की एक अनिवार्य शर्त सी हो तुम एक आदत हो तुम परा-अपरा के बीच मेरे लिए संतुलन का भाव हो तुम जितना ख़ुद की हो , उससे कँही अधिक मेरी हो। हो ना ?
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।