उनके साथ चलना चाहता था कुछ देर तक इसीलिए ज़रूरी हर काम कुछ समेटकर , कुछ छोड़कर चल दिया । फ़िर उनसे मासूम सा सवाल किया - आप भी चल रही हैं ? वो मेरी आंखो की शोधार्थी , मुस्कुराती हुई बोली – ज़रूरी हर काम कर लिया या फ़िर मुझे देखकर बस , सब छोड़कर आ गए । बात तो सच थी । काश मैं उसके लिए ज़िंदगी भर के लिए बस उसे देखकर सबकुछ छोडकर जा पाता ।
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।