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उज़्बेकिस्तान में एक पार्क ऐसा भी

  उज़्बेकिस्तान में एक पार्क ऐसा भी है जो यहां के वरिष्ठ साहित्यकारों के नाम है। यहां उनकी मूर्तियां पूरे सम्मान से लगी हैं। अली शेर नवाई, ऑयबेक, अगाही, गफूर गुलाम और जुल्फियां की प्रतिमाएं आप यहां देख सकते हैं। इस तरह के पार्क पर कोई भी राष्ट्र गर्व कर सकता है। पार्क के बीचों बीच एक म्यूज़ियम भी है। छायांकन सहयोग भाई Parveen Sharma

डॉ.मनीष कुमार मिश्रा संक्षिप्त परिचय 2024

  नाम :   डॉ . मनीष कुमार मिश्रा जन्म : वसंत पंचमी 09 फरवरी 1981 शिक्षा : मुंबई विद्यापीठ से MA हिंदी ( Gold medalist) वर्ष 2003 , B.Ed. वर्ष 2005 , “ कथाकार अमरकांत : संवेदना और शिल्प ” विषय पर डॉ. रामजी तिवारी के निर्देशन में वर्ष 2009 में PhD ,   MBA ( मानव संसाधन ) वर्ष 2014 , MA English वर्ष 2018 संप्रति :   विजिटिंग प्रोफेसर , ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ , उज्बेकिस्तान                    के एम अग्रवाल महाविद्यालय ( मुंबई विद्यापीठ से सम्बद्ध ) कल्याण पश्चिम , महाराष्ट्र में सहायक आचार्य हिन्दी विभाग में 14 सितंबर 2010 से कार्यरत । सृजन : ·          राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पत्र – पत्रिकाओं / पुस्तकों इत्यादि में 80 से अधिक शोध आलेख प्रकाशित । ·          250 से अधिक राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों / वेबिनारों में सहभागिता । ·     ...

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा उज़्बेकिस्तान में खोज रहे हैं हिंदी की नई बोलियां ।

  डॉ. मनीष कुमार मिश्रा उज़्बेकिस्तान में खोज रहे हैं हिंदी की नई बोलियां । माना जाता है कि दूसरी शताब्दी के आस पास कुछ घुमंतू जातियां मध्य एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका की तरफ गईं और अलग अलग स्थानों पर रहने लगीं । समय के साथ इन्होंने अपनी मूल भाषा को खो दिया और स्थानीय भाषाओं को बोलचाल के लिए स्वीकार कर लिया । इन्हें मूल रूप से जिप्सी कहा जाता है। मध्य एशिया के देश उज़्बेकिस्तान में भी ऐसे कई समुदाय रहते हैं। इन लोगों को यहां स्थानीय उज़्बेक भाषा में लोले या लोली कहा जाता है। इनके बीच भी कई समुदाय हैं जैसे कि अफ़गान, मुल्तान, पारया, जोगी, मजांग, कव्वाल, चिश्तानी, सोहूतराश और मुगांत इत्यादि । ये सभी भारत से हैं या नहीं यह शोध का विषय है।  इस संबंध में विधिवत शोध कार्य न के बराबर हुए हैं। डॉ भोलानाथ तिवारी ने ताशकंद रहते हुए अफ़गान समूह की भाषा पर काम किया और उनकी भाषा को "ताजुज्बेकी" नाम देते हुए इसे हिंदी की एक नई बोली बताई । लेकिन वे लोले या जिप्सियों को इनसे अलग मानते हैं। डॉ मनीष कुमार मिश्रा इन दिनों ICCR हिन्दी चेयर पर उज़्बेकिस्तान में हैं और ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिट...

लाल बहादुर शास्त्री विद्यालय : उज़्बेकिस्तान में हिन्दी अध्यापन

    लाल बहादुर शास्त्री विद्यालय : उज़्बेकिस्तान में हिन्दी अध्यापन                                अपने समय और परिस्थितियों की विशेषता और विलक्षणता को समझना हमेशा ही भविष्य की राह आसान बनाता है ।   ऐसे में वे राष्ट्र जो जनतांत्रिक मूल्यों वाले समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा जो अपनी राष्ट्रीय एकता , अखंडता और संप्रभुता के प्रति दृढ़संकल्प होते , हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था और प्रगति के लिए निरंतर प्रयासरत है ; उनमें भारत और उज्बेकिस्तान प्रमुखता से शामिल हैं । दोनों राष्ट्रो के साहित्यिक मूल्यों में आपसदारी की बात करें तो उज़्बेकिस्तान में सन 1925 के आसपास रविंद्रनाथ टैगोर की कहानियों एवं कविताओं का उज़्बेकी एवं रूसी भाषा में अनुवाद के माध्यम से परिचय हुआ । सन 1940 से 1960   के बीच प्रेमचंद , मोहम्मद इकबाल , मिर्जा गालिब , अमृता प्रीतम और यशपाल की रचनाएं यहां की भाषा में अनुवाद करके प्रकाशित की गयीं ।   ...

शास्त्री कोचासी, ताशकंद ।

  शास्त्री कोचासी , ताशकंद   ।   आज़   02 अक्टूबर 2024 को लाल बहादुर शास्त्री जी की जन्म जयंती पर   लाल बहादुर शास्त्री जी के निशान ताशकंद , उज़्बेकिस्तान में   शास्त्री कोचासी अर्थात शास्त्री मार्ग/ सड़क लाल बहादुर शास्त्री स्कूल अर्थात मकतब 24  और   लाल बहादुर शास्त्री   संस्कृति केन्द्र   के रूप में सुरक्षित देख इतिहास को   त्रासदी के आख्यान के साथ साथ वर्तमान की नींव में भी पा रहा हूं ।   शास्त्री कोचासी पर लगी   शास्त्री जी की मूर्ति आने जाने वालों से   तेज़ गति से भागती गाड़ियों से   मानो कह रही हो कि   दुर्घटनाओं के मूल में   अपनी असावधानी ही कारण हो यह ज़रूरी नहीं   बल्कि कई बार   हम दूसरों की गलतियों का भी   अनायास दंड भोगते हैं ।   कहीं पढ़ा था कि   लाल बहादुर शास्त्री स्कूल अर्थात मकतब 24 में लगी शास्त्री जी की भव्य मूर्ति का अनावरण   फिल्म अभिनेता राज कपूर ने   सन 1974 में किया था ...