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जून, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जितना प्रेम करना जानता हूँ

जितना प्रेम करना जानता हूँ  काश उतना जताना भी जानता ।  बे वजह तुम्हारे रूठने पर, हर बार तुम्हें मनाना भी जानता ।  जैसे तुम छिपाए रहती हो कई राज, काश कुछ छिपाना मैं भी जानता ।  चलो छोड़ो कुछ भी नहीं और बोलो, यह बोल, दिल जलाना मैं भी जानता ।

मेरी आवारगी में भी

मेरी आवारगी में भी, एक सलीका है  हम दिल तोड़ते हैं, पर एक तरीका है ।

तुम्हें मनाने में

छोड़ो भी कि अब, मैं ऊब सा गया हूँ तुम्हें मनाने में ख़ुद से रूठ सा गया हूँ ।

फ़िर भी बोलती हो कि

आजकल सारी रात तो बोलता हूँ तुमसे, फ़िर भी बोलती हो कि,कुछ और बोलो ।

तेरे सिवा भी हम पे बहुत से सितम हुए ............

             मिर्ज़ा असदउल्ला खाँ “गालिब” उर्फ़ मिर्ज़ा नौशा  के नाम से उर्दू और फ़ारसी साहित्य जगत अच्छे से परिचित है । वैसे अब परिचित तो विश्व का अधिकांश साहित्य जगत है । गालिब वो नाम है जिनके बिना उर्दू और फ़ारसी अदब की शायरी को समझा नहीं जा सकता ।            गालिब के दादा  मिर्ज़ा कौकान बेग समरकन्द से भारत आए थे । समरकन्द काफ़ी लम्बे समय से इतिहास के प्रसिद्ध नगरों में से एक रहा है। यह नगर सोवियत संघ में , मध्य एशिया के उज़बेकिस्तान में स्थित है। उनके कई पुत्रों में से एक थे अब्दुल्ला बेग खाँ उर्फ़ मिर्ज़ा दूल्हा जिनकी शादी आगरा के प्रतिष्ठित ख़्वाजा गुलाम हुसैन खाँ कुमीदान की बेटी इज्जतउन्निसा से हुई थी । इन्हीं के सुपुत्र थे गालिब । गालिब तीन भाइयों में सबसे बड़े थे । आप का जन्म 27 दिसंबर 1797 ई. को आगरा में हुआ । गालिब जब पाँच साल के थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी । पिता की मृत्यु के बाद गालिब के चाचा मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग ने अपने भाई के परिवार को संभाला । लेकिन गालिब जब आठ साल के हुए त...

किसी के होने न होने के बीच

किसी के होने न होने के बीच एक जगह ज़रूर होती है जिसे हमेशा किसी की ज़रूरत होती है । हमारे ही अंदर , ये वो रिक्त स्थान हैं जो संवेदनाओं से सिंचित और प्रेम की ऊष्मा से भरे होते हैं ये रिक्त स्थान आसक्त नहीं अनुरक्त होते हैं । किसी के आने के बाद दायित्व और विश्वास के साथ ये लुटाने लगते हैं संस्कारों से सिंचित अनुराग के पुष्प । किसी के जाने के बाद दुख और अवसाद के बादलों से ये अपना ही अभिषेक करते हैं एक दम चुपचाप । नई आशा और नई उम्मीद के लिए प्रेम और विश्वास ज़रूरी है अत: ये रिक्त स्थान अपने संकल्पों के साथ जीते हैं ख़ुद की रिक्तता के साथ हमेशा प्रतिक्षारत । इन रिक्त स्थानों में यादें भरपूर हैं वादे-इरादे , न जाने क्या –क्या । इन रिक्त स्थानों की पूर्ति समर्पण की शर्त पे है क्षमा और प्रेम की बुनियाद पे है अहम के त्याग पे है जीवन जीने की अनिवार्य शर्त पे है । सोचना कभी तुम्हारे अंदर भी यह रिक्त स्थान ज़रूर होगा ।