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डाॅ. मनीष मिश्रा विरचित काव्य संग्रह ‘अक्टूबर उस साल’ की समीक्षा

डाॅ. मनीष मिश्रा विरचित काव्य संग्रह ‘अक्टूबर उस साल’ की समीक्षा डाॅ. गजेन्द्र भारद्वाज, सहायक प्राचार्य हिंदी सी.एम.बी. काॅलेज डेवढ़, घोघरडीहा, जिला- मधुबनी, बिहार ORCID iD- 0000-0002-0712-9187 काव्य संग्रह ‘अक्टूबर उस साल’ साल 2019 में प्रकाशित लेखक मनीष मिश्रा जी के कृतित्व का वह इतिहास है जो उनके उत्तरोत्तर मँझते हुए लेखन और उनकी कविताओं के भाव गांभीर्य की विकास यात्रा को न केवल संकलित कविताओं के शीर्षक अपितु उनकी भाव संपदा की तन्मयता की गाथा सुनाता है। आज अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों से जो भी कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं उनमें से अधिकांश को पढ़कर ऐसा लगता है मानो उन्हें एक ढाँचा निर्मित करके सायास लिखा गया है ऐसी कविताओं के लेखन के बीच से ऐसी कविता जो अनायास बन जाए इस संग्रह में दिखाई दी हैं जिन्हें पढ़कर यह लगता है कि आज भी कविता शब्दों और भावनाओं के परे जाकर हमारी चैतन्यता से जुड़ी है। संग्रह के लेखक इस संग्रह और इसमें संकलित कविताओं के प्रस्तुतिकरण के लिए बधाई के पात्र हैं जिनका प्रयास इतने कम समय में भी परिपक्वता की ओर अग्रसर दिखाई पड़ रहा है। इस संग्रह में कुल 56 कविताएँ संकलित ...

ठुमरी की ठनक और ठसक का दस्तावेज़ ।

ठुमरी की ठनक और ठसक का दस्तावेज़ । भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला में अध्येता के रूप में दो वर्षों तक जिस समर्पण और निष्ठा के साथ डॉ. ज्योति सिन्हा अपने शोधकार्य में लगी रहीं, उसके प्रतिफल के रूप में 614 पृष्ठों की यह पुस्तक हमारे सामने है । पुस्तक का शीर्षक है –“बनारसी ठुमरी की परंपरा में ठुमरी गायिकाओं की चुनौतियाँ एवं उपलब्धियां (19वीं-20वीं सदी ) । पुस्तक का प्रथम संस्करण वर्ष 2019 में प्रकाशित हुआ । प्रकाशक रहा स्वयं भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला, हिमाचल प्रदेश । डॉ. ज्योति सिन्हा अपने शोध आलेखों एवं पुस्तकों के माध्यम से संगीत के विभिन्न पक्षों पर अकादमिक योगदान देती रही हैं । लेकिन यह पुस्तक उनकी एक “नई पहचान” गढ़ती सी दिख रही है । इस पुस्तक के माध्यम से ज्ञात होता है कि इन ठुमरी गायिकाओं ने अपने संघर्ष को समयानुकूल रूपांतरित करने एवं उसे धार देने में कोई कमी नहीं छोड़ी । ऐसा इसलिए ताकि जीवन जीना थोड़ा सरल हो सके और कला का सफ़र अधिक खूबसूरत । ये गायिकायें अपने जीवन की ही नहीं अपितु अपनी कला की भी शिल्पी रहीं । इन डेरेवालियों, कोठेवालियों के निजी जीवन क...

खजुरन : जोगियों का गांव ।

  खजुरन : जोगियों का गांव । उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले अन्तर्गत आनेवाले बदलापुर तहसील का एक गांव है खजुरन । यह गांव "जोगियों का गांव" के रूप में भी जाना जाता है । ऐसा नहीं है कि इस गांव के सभी लोग जोगी हैं, अपितु यहां जोगियों की पूरी एक बस्ती / टोला है । लगभग साठ से सत्तर घरों का यह जोगियान 400 से 500 की आबादी का है । ये सभी मुस्लिम परिवार हैं जो कई पुश्तों से यहां रह रहे हैं । कितनी पुश्तों से ? यह ठीक से कोई नहीं बता सकता । इनमें से अधिकांश के पास अपनी खेती बाड़ी की ज़मीन नहीं है । कुछ के पास है भी तो बड़ी मामूली सी । आवास भी अधिकांश लोगों को इंदिरा आवास  एवं प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से मिली हुई "कालोनी" है । बस्ती तक जानेवाली सड़क पक्की है, लेकिन बस्ती इनकी तंगहाली और ग़रीबी को उघार कर रख देती है । अब इनमें से अधिकांश लोग चीनी मिट्टी के बने बर्तन और कांच के कप और ग्लास बेचने का काम करते हैं । बेचने का यह सारा सामान ये मछलीशहर नामक जगह से लाते हैं । कुछ लोग पढ़ लिखकर दूसरे प्रतिष्ठित कार्य भी करने लगे हैं । नन्हें मास्टर ऐसे ही व्यक्ति हैं जो पास के प्रा...

धमाल : संघर्ष का इकबालिया बयान ।

धमाल : संघर्ष का इकबालिया बयान   । सूफी संगीत के प्रभाव से जो गायन - शैली भारत में विकसित हुई उनमें ‘कव्वाली’ प्रमुख रही है। कव्वाली के साथ ही गुजरात के   ‘सिद्दी’  संप्रदाय के नृत्य और गायन शैली ‘गोमा’ और ‘धमाल’ भी सूफियों की परंपरा से ही विकसित हुए हैं। पश्चिमी गुजरात के राज पीपला जंगलों के नजदीक गोरीपीर ( सोलहवीं शताब्दी )की खानकाह है।  सिद्दी  पूर्वी अफ़्रीका के लोग हैं,जो गुजरात, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में स्थायी निवास करते हैं। ‘मलंगा’ एक अफ़्रीकी मूल का वाद्ययंत्र है। ‘गोमा’ शब्द सवाहिली ( Swahili)  भाषा का है जिसका अभिप्राय धार्मिक उत्सव मनाने से है। अफ्रीकी मूल के सिद्दी समुदाय के इस लोक नृत्य में विशिष्ट मुखाभिनय और वन्य जीवन से अनुप्राणित आहार्य के साथ  संगीत की जादुई लय-ताल का समावेश विशेष प्रभाव उत्पन्न करता है । ‘धमाल’ एक धार्मिक नृत्य की शैली रही है जो कि 19 वी शताब्दी से हिंदू - मुस्लिम सभी द्वारा समान रूप से मनायी /प्रस्तुत की जाती रही है। वैसे धमाल नामक एक शैली खुसरो ने शुरू की थी । इस शैली में लोग खड़े होकर अपने पैरों से एक...

बाउल : वंचितों द्वारा संचित जीवन संगीत ।

  बाउल : वंचितों द्वारा संचित जीवन संगीत । पूर्वी और उत्तर पूर्वी बंगाल ( विभाजन के पूर्व का बांग्लादेश भी ) के आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों   के हाशिये का समाज "बाउल" लोकगीत एवं लोकशैली का जन्मदाता रहा है । किसी भी मुख्यधारा के जाति,धर्म एवं पंथ से अलग अपनी पहचान रखनेवाला यह समाज अपने एक तारे / दो तारे से समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, अन्याय, अज्ञानता इत्यादि का पुरजोर विरोध किया ।   राजस्थान और मध्यप्रदेश में ऐसे गीतों की प्रस्तुति करने वाले भाट कहलाए । उत्तर प्रदेश में इन्हें सरंगी, जोगी या फ़कीर कहा गया । आऊल, बाउल,फ़कीर,साई,दरबेस,जोगी, सेन, नेरा- नेरी, कर्ताभाजा, किशोरी भाजा  और भाट जैसे समुदायों में काफ़ी समानता रही है । इनमें हिन्दू, मुसलमान दोनों ही रहते हैं । इनके संप्रदायों में कई आंतरिक भेद और वर्ग हैं । जैसे कि वैष्णव बाउल गो मांस नहीं खाते । चावल, मछली इत्यादि वे खाते हैं। ये लहसुन और प्याज भी कम ही खाना पसंद करते हैं। इनके आंतरिक समाज में गुरु का महत्व समान रूप से है । स्त्रियां आसानी से परपुरुष से संबंध बना लेती हैं । आपराध...

भारतीय उपमहाद्वीप में क़व्वाली और तकनीकी परिप्रेक्ष्य ।

                  भारतीय उपमहाद्वीप में क़व्वाली और तकनीकी परिप्रेक्ष्य ।                                              डॉ मनीष कुमार मिश्रा                                           डॉ उषा आलोक दुबे                भारतीय उपमहाद्वीप में सूफ़ीवाद की जड़ें   इस्लामिक परमानंद प्राप्ति की उस शास्त्रीय परंपरा में है जो अरब और फ़ारस में 09 वीं से 11 वीं सदी के बीच विकसित हुई और धीरे-धीरे 12 वीं शताब्दी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में आयी । “तरीक़ा” ...