Showing posts with label पिछली ऋतुओं की वह साथी ।. Show all posts
Showing posts with label पिछली ऋतुओं की वह साथी ।. Show all posts

Tuesday, 6 March 2018

पिछली ऋतुओं की वह साथी ।


पिछली ऋतुओं की वह साथी
मुझको कैसे तनहा छोड़े
स्मृतियों में तैर-तैर कर
वो तो अब भी नाता जोड़े ।
सावन की बूंदों में दिखती
जाड़े की ठंडक सी लगती
अपनी सांसों का संदल
मेरी सांसों में भरती ।
मेरे सूखे इस मन को
अपने पनघट पर ले जाती
मेरी सारी तृष्णा को
तृषिता का भोग चढ़ाती ।
इस एकाकी मौसम में
वह कितनी अकुलाहट देती
मेरे प्यासे सपनों को
अब भी वो सावन देती ।
पिछली ऋतुओं की वह साथी
आँखों का मोती बनती
मेरी सारी झूठी बातों को
केवल वो ही सच्चा कहती ।
----------मनीष कुमार मिश्रा ।

हिन्दी : पक्ष – प्रतिपक्ष

            हिं दी के पक्ष में जिस भावुकता के साथ तर्क रखे जाते हैं उन्होंने हिंदी का कोई भला नहीं किया अपितु नुकसान ही अधिक हुआ । हिंदी की ...