इम्तहान लेती रही जिंदगी मेरी यूँ ही चलती रही जिदगी मेरी कमियाँ तलाशते रहे लोग अपने असफलताएं सजाती रही मेरी जिंदगी व्यवहार बदलता रहा हर मोड़ पे लोंगों का मेरी मुसीबतों पे मुस्कराती रही मेरी जिंदगी हर ठोकर के बाद लंगडाती रही मेरी जिंदगी अपनो को यूँ सुकूँ पहुंचाती रही मेरी जिंदगी कोई मरहम लगता नमक का कोई तिरस्कार की बातें कोई अहसान की दवा देता कोई दया की बातें कोई मुस्कराता हर तकलीफ पे कोई खिलखिलाता हर चोट पे ऐसे कितनो को सुख पहुंचाती रही मेरी जिंदगी
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।