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जुलाई, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इम्तहान लेती रही जिंदगी मेरी

इम्तहान लेती रही जिंदगी मेरी यूँ ही चलती रही जिदगी मेरी कमियाँ तलाशते रहे लोग अपने असफलताएं सजाती रही मेरी जिंदगी व्यवहार बदलता रहा हर मोड़ पे लोंगों का मेरी मुसीबतों पे मुस्कराती  रही मेरी जिंदगी हर ठोकर के बाद लंगडाती रही मेरी जिंदगी अपनो को यूँ  सुकूँ  पहुंचाती रही मेरी जिंदगी कोई मरहम लगता नमक का कोई तिरस्कार की बातें कोई अहसान की दवा देता कोई दया की बातें कोई मुस्कराता हर तकलीफ पे कोई खिलखिलाता हर चोट पे ऐसे  कितनो को सुख पहुंचाती रही मेरी जिंदगी  

एक दिवसीय हिंदी कार्यशाला का आयोजन

                                        बुधवार , दिनांक  १८ अगस्त  २०१० को महाविद्यालय के हिंदी विभाग और हिंदी अध्ययन मंडल,मुंबई विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में बी.ए. प्रथम वर्ष (वैकल्पिक ) पेपर-१ पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया है.                          कार्यशाला के लिए पंजीकरण का समय सुबह ९.३० से १०.०० बजे तक रहेगा .१०.०० बजे से ११.०० बजे तक उदघाटन सत्र चलेगा .१११.०० बजे से १.३० बजे तक चर्चा सत्र चलेगा. १.३० बजे से २.३० तक भोजनावकाश रहेगा .२.३० बजे से ३.०० बजे तक समापन सत्र होगा .                        महाविद्यालय का पता इस प्रकार है ------  के.एम.अग्रवाल  कला,वाणिज्य और विज्ञान महाविद्यालय   पडघा रोड,गांधारी गाँव , कल्याण (पश्चिम )४२१३०१  ...

जिंदगानी भटकी हुई या खोया हुआ हूँ मै

  जिंदगानी भटकी  हुई या खोया हुआ हूँ मै  राह चुनी थी सीधी चलता रहा हूँ मै   रिश्तों में राजनीती थी या संबंधों में कूटनीति  स्वार्थ था नातों में या नाता था स्वार्थ  का बातें दुविधाओं की थी या दुविधाओं  की बातें   भाव ले प्यार का सरल चलता रहा हूँ मै उलझे हुए किस्से  सुने  झूठे  फलसफे  सुने मोहब्बत की खोटी कसमे सुनी सच्चाई की असत्य रस्में सुनी प्यार को सजोये दिल में चलता रहा हूँ मै इश्क के वादों को  वफ़ा करता रहा हूँ मै भटकी हुई जिंदगानी या खोया हुआ हूँ मै राह चुनी थी सीधी चलता रहा हूँ मै

बेवफा सनम मेरा

बेवफा सनम मेरा झूठ है फितरत सच ना कह सका कभी मेरी सच्चाई से है उसे नफरत बेवफा सनम मेरा अपने रिश्तों की बानगी क्या कहे बदलती उसके दिल की रवानगी झूठ का बड़ता उसका अंबार है झूठे प्यार का उसका व्यापार है बेवफा सनम मेरा गलती नहीं उसकी कोई बदलती कहाँ आदत कोई गोपनीयता का वो सरताज है बेवफाई पे ही उसका संसार है बेवफा सनम मेरा

प्यास बुझा के प्यास बड़ाता पानी

जंगल का कोहरा और बरसता पानी पेड़ के पत्तों से सरकता पानी पहाड़ों पे रिमझिम बहकता पानी सूरज  को बादलों  से ढकता पानी चाँद तरसता तेरे बदन पे पड़ता पानी प्यास बुझा के  प्यास बड़ाता पानी

ढहता रहा जहाँ , मेरा विश्वास देखते रहे /

कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे ऐ जिंदगी तेरा खुमार देखते  रहे जलजला गुजर रहा भूमि पे जहां हैं खड़े    ढहता रहा जहाँ मेरा विश्वास देखते  रहे   

तेरे सिने में बुझी राख थी /

कल तक तो तू मेरा था आज क्यूँ तेरी बातों में अँधेरा था क्यूँ धुंध है दिल में वहां   जहाँ कल तक मेरा बसेरा था चमकती चांदनी में कितनी आग थी सुबह रक्तिम सूरज में भी छावं थी  क्या खोया मन ने तेरे  तेरे सिने में बुझी राख थी / 

बोझिल से कदमों से वो बाज़ार चला

बोझिल से कदमों से वो बाज़ार चला बहु बेटो ने समझा कुछ देर के लिए ही सही अजार चला कांपते पग चौराहे पे भीड़ वाहनों का कारवां और उनकी चिग्घाडती गूँज खस्ताहाल  सिग्नल बंद पड़ा रास्ता भी गड्ढों से जड़ा था हवालदार कोने में कमाई में जुटा चाय कि चुस्किया लगा रहा  छोर पे युवकों का झुण्ड जाने वालों कि खूबसूरती सराह रहा  चौराहा का तंत्र बदहवाल  था उसके कदमों में भी कहाँ सुर ताल था तादात्म्यता जीवन कि बिठाते बिठाते जीवन के इस मोड़ पे अकेला पड़ा था लोग चलते रुकते दौड़ते थमते एक मुस्तैद संगीतकार कि धुन कि तरह अजीब संयोजन कि गान कि तरह दाहिने हाथ के शातिर खिलाडी के बाएं हाथ के खेल की तरह केंद्र और राज्य के अलग सत्तादारी पार्टियों के मेल की तरह चौराहा लाँघ जाते फांद जाते  उसके ठिठके पैरों कि तरफ कौन देखता ८० बसंत पार उम्रदराज को कौन सोचता निसहाय सा खड़ा था ह्रदय द्वन्द से भरा था   मन में साहस भरा कांपते पैरों में जीवट हनुमान सा आत्मबल और जीवन का कर्मठ  युद्धस्थल म...

विवेकी राय जी का नया उपन्यास -बनगंगी मुक्त है .भाग १

विवेकी राय जी का जन्म १९२७ में हुआ.आप हिंदी और भोजपुरी साहित्य में काफी प्रसिद्ध  रहे.आप उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के एक छोटे से गाँव  सोनवानी से हैं. आप ने ५० से अधिक पुस्तकें लिखीं .आप को कई पुरस्कार भी प्राप्त हुवे.सोनामाटी आप का मशहूर उपन्यास रहा.  महापंडित  राहुल  संकृत्यायन  अवार्ड  सन  २००१ में और   उत्तर  प्रदेश ' का यश  भारती  अवार्ड  सन  २००६ में आप को मिला .    आप क़ी प्रमुख कृतियाँ है  मंगल  भवन  नमामि  ग्रामं  देहरी  के  पार  सर्कस सोनामाटी कालातीत  गंगा जहाज  पुरुस  पुरान समर  शेष  है  फिर  बैतलवा  डार  पर  आम  रास्ता  नहीं  है  आंगन  के  बन्दनवार  आस्था  और  चिंतन  अतिथि  बबूल  चली  फगुनहट  बुरे  आम  गंवाई  गंध  गुलाब  जीवन  अज्ञान  का  गणित  है  लौटकर...

अकेलापन और रिश्ता

अकेलापन और हो तन्हाई                             किसी कि याद भी आई न ये मोहब्बत न  अपनेपन  कि निशानी है ये बस खाली लम्हों  की  कहानी है न काम से हो फुरसत खुशियाँ हो और हो रौनक सोचो किसी को तुम याद आये कोई  हरपल  ये है अपनापन है  इस रिश्ते में तेरा मन इसमे मोहब्बत है  और इस रिश्ते को है नमन /                                                                       

मोहब्बत जवानी

हंसती कली महकती फली बरसती बुँदे सुलगती यादें गरजती लिप्सा दहकती  आशा बदलती सीमायें बहकती निष्ठाएं प्यार या पिपासा रिश्ते औ निराशा अधीर कामनाएं लरजती वासनाएँ उलझा  भाव अधुरा लगाव चंचल मन  प्यासा तन  सामाजिक सरोकार  रोकता संस्कार   मंजिल व गंतव्य  झूलता मंतव्य  बड़ती चेष्टाए  ढहती मान्यताएं  लगन दीवानी  मोहब्बत जवानी  काम प्रबल  भावों में बल  टूटता  बंधन  आल्हादित आलिंगन 

अपनो की नाप तोल में दिल को ना तोड़ना

सच्चाई  की राह  को अच्छाई से तराशना  हो सके तो झूठ  की अच्छाई  तलाशना  भविष्य की राह में भूत न भूलना कभी  दूर दृष्टि ठीक है पर आज भी संभालना रिश्तों की खीचतान में  अपनो को सहेजना मुश्किलों के खौफ में  मोहब्बत ना छोड़ना  कोई कहे कुछ भी प्यार  एक  खुदायी है  जिंदगी  की नाप तोल में  दिल को  ना तोड़ना

होली न खेला दिवाली न मनायी ,बस ढूढता रहा अधेरों में परछाई

होली न खेला दिवाली न मनायी बस ढूढता रहा अधेरों में परछाई बारिश हुई जम के ठंडी का भी  जोर तू नहीं तो हर मंजर कठोर चाँद ताकता अमावास कि रात में तारे गिनता मै बरसात में दोस्तों कि महफिलों में न लगी कोई जान तू ही मेरी धड़कन तू ही मेरी जान चूल्हा नहीं जला न इस घर को कोई चैन सन्नाटा है पसरा हर कमरा एकदम मौन अलमारी के तेरे कपडे रखता हूँ घर में साथ   रहती है तेरी खुसबू  तू  लगती है मेरे पास   घर का आइना रहता बड़ा उदास तेरी खुबसूरत आखों का वो भी है दास घर कि टी. वी. भी तबसे ना चली  उसको लगती है तेरी संगत भली अब इस घर में मिलती नहीं राहत इस दरो दीवार को तेरी छाया कि है चाहत तेरे लबों कि चाह में मै हो रहा पागल इस नशेमन का शौक तू तू ही मेरी आदत त्राहि त्राहि कर रहा रोम रोम प्यास से व्याकुल तड़पता मन मेरा तेरे इक आभास को जल्द आ अब तू कटते नहीं ये पल तड़प रही है जिंदगी वक़्त करने लगा है छल

फ़ैली है आग हार तरफ धधक रहा शहर

फ़ैली है आग हार तरफ धधक रहा शहर गलती है ये किसकी चल रही बहस नेता पत्रकार टी.वी वालों का हुजूम है जानो कि परवा किसे  दोषारोपण का दौर है चीख रहे हैं लोग अरफा तरफी है हर तरफ कहीं तड़प   रहा बुडापा कहीं कहरता हुआ बचपन चित्कारती आवाजें झुलसते हुए बदन  किसपे  लादे दोष ये चल रहा मंथन बह रही हवा अपने पूरे शान से अग्नि देवता हैं अपनी आन पे लोंगों कि तू तू मै मै है या मधुमख्खिओं का शोर है हो रहा न फैसला ये किसका दोष है कलेजे से चिपकाये अपने लाल को चीख रही है माँ उसकी जान को जलते हुए मकाँ में कितने ही लोग हैं कोशिशे अथाह पर दावानल तेज है धूँये से भरा पूरा आकाश है पूरा प्रशासन व्यस्त कि इसमे किसका हाथ है आया किसी को होश कि लोग जल रहे तब जुटे सभी ये आग तो बुझे आग तो बुझी हर तरफ लाशों का ढेर है पर अभी तक हो सका है ना फैसला इसमे किसका दोष है हाय इन्सान कि फितरत या हमारा कसूर है हर कुर्सी पे है वो जों कामचोर हैं बिठाया वहां हमने जिन्हें  बड़े धूम धाम से वो लूट रहे हैं जान बड़े आन बान से ...

इनायत खुदा की कि प्यार का जज्बा दिया

न खुशियों की तलाश  न बदन की कोई प्यास मोहब्बत की पूरे दिल से ये जज्बा खुदा का खास मेरी आखों के पानी को न देखो मेरी बरबादिओं की रवानी को न देखो देखो इश्क का जूनून जों दौड़े है रग रग में मेरे  हंसी  यार की बेवफाई को न देखो                                                                               गम का नहीं है गम मुझे ये मोहब्बत की तासीर हो   तेरा सच तो कह देता भले ये मेरी आखिरी तारीख हो  इनायत खुदा की कि प्यार का जज्बा दिया  मेहरबानी तेरी तुने प्यार को रुसवा किया  सच ये है कि तू है मेरी जिंदगी  क़त्ल क...

मंदिरों की घंटियाँ चीत्कार सी लगी /

                                                           सुबह में बोझिलता थी मौसम में आकुलता     दिल में तड़प थी दिखती न मंजिल न सड़क थी सोया  था मै हार के     जागा था मन मार के उगता सूरज मौसम साफ़     दिल था पर उदास कोकिला की कूक भी काक सी लगी मंदिरों की घंटियाँ चीत्कार सी लगी मृत जवानों का ढेर था         नक्सालियों का ये खेल था खूं से जमीं लाल थी        दरिंदगी खूंखार थी गृहमंत्री को खेद था       उनका खूं सफ़ेद था भोपाल का फैसला न्याय की हार थी दोष थे खूब बंट रहे इन्साफ की न राह थी कश्मीर सुलग रहा      अलगाववाद फिर पनप रहा लो...

तुझमे दुविधाओं का मंजर पाया

तुझमे दुविधाओं का मंजर पाया थमा हुआ समंदर पाया आखों में खुशिओं का रेला दिल में मचा बवंडर पाया अनेक भाव विधाएं तेरी कितनी ही सदायें तेरी हँसता कोई रोता कोई दिल थामे बैठा है कोई तू  एक पर कितनी ही कथाएं तेरी क्या क्या  है अदाएं तेरी कहीं कोमलताएं बेचीं कही सरलताएं बेचीं किया कहीं भावों का सौदा कहीं तुने अदाएं बेचीं तेरा इतिहास बदलता पाया  तेरा खास बदलता पाया  कब कौनसा रूप नजर आ जाये हरदम खुद को डरता पाया  

कातिल अदा है सादगी ,

कातिल अदा है सादगी इससे बचा करो , क़ज़ा ये ऐसी हुस्न की कि दिल कातिल कि दुआ करे / कातिल अदा है सादगी , हुस्न का दिव्यास्त्र ये जों रखता है वो संभाल , जब आता है इल्जाम ये बन जाता है उसकी ढाल , चलता ये वहां भी जहाँ कोई अंदाज न चले , जीतता है ये ही कैसे भी वो  चले कातिल अदा है सादगी , चलता है वो सादगी जब सूझे न कोई चाल होता है हसीं का हर वार जब बेकार ,                                                                         धीमे धीमे अपनी इस क़ज़ा को वो चले; आशिक को  फिर  हौले हौले वो छले कातिल अदा है सादगी ,/ चाहता है वो जब जीतना हार हाल में करत...

न राह है न मुकद्दर ,

न राह है न मुकद्दर , फिर मेरा दिल तेरा है क्यूँ कर , वक़्त न धूमिल कर पाया , राहों ने कितना ही भरमाया , अपने लोग भाव उलझाते ही हैं , रिश्तों में अड़चन लाते ही है , बड़ती कशिश समय भी रोक न पाई , बड़ती तपिश भले तुझे ना भायी , इश्क को चोटों से क्यूँ भागूं मैं तेरे संबंधों से घबरायु क्यूँ मै , मै अविचलित अपने प्यार पे , भले नम हैं आखें तेरे बेवफाई के नाम पे /                                           

न की इतनी गैरत की मुलाकात कर लेती ,

न की इतनी गैरत की मुलाकात कर लेती , होती अपनो की परवा तो कैसे रात कर लेती , बला की कशिश है तुझमे लोग कहते है , गैरों से न मिली फुर्सत जों मेरे रंजोगम से आखें चार कर लेती /

चाह के भी न कह सका प्यार मै ,

================================ . चाह के भी न कह सका प्यार मै , तेरी आखों ने रोक लिया कैसे करता इजहार मै ; बाहें मचल रही थी तुझे बाँहों में भरने को , तेरी हया को करता कैसे यूँ ही पार मै / ================================

हिंदी से अरुचि ये हिंदी भाषी ही करते हैं ,

Golden Treasury Of Shlokas (4 Cd Set with Hindi Book) हिंदी से अरुचि ये हिंदी भाषी ही करते हैं , हमें अंगरेजी आती कह खुद की पीठ ठोकते है , हीन भाव से निकलो यारों ; अंगरेजी आने से विद्वान नहीं कोई बनता है , सिर्फ भाषा के ज्ञान से कोई इन्सान नहीं बनता है ; निज भाषा से प्रेम नहीं , इससे बड़ा विद्वेष नहीं ;