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Tuesday, 25 January 2011

गम ही दे पर दे इन्तहा वो भी ,

गम  ही  दे पर दे इन्तहा वो भी ,
खुशियों  पे तेरा अब बस नहीं
चाहा है टूट कर जिसको
 मिटा दे हस्ती गम दे तू ही

दर्द  का मेला चाहूं तुझसे
तकलीफों का झोला चाहूं तुझसे
चाहत का क्या है वो तू कब का भूली
ग़मों का लम्हा चाहूं अब तुझसे


श्रीमद्भगवद्गीता का मनोविज्ञान विषाद, आत्म-नियमन, निष्काम कर्म, समत्व और मनोवैज्ञानिक कल्याण का समकालीन अध्ययन डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

  भारतीय मनोविज्ञान एवं जीवन-दर्शन श्रीमद्भगवद्गीता का मनोविज्ञान विषाद, आत्म-नियमन, निष्काम कर्म, समत्व और मनोवैज्ञानिक कल्याण का समकालीन अ...

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