तेरी आँखों से मेरा एक ख़ास रिश्ता है एक सपना है जो यहीं से हौंसला पाता है । शिकार हो जायेंगे हर हाल में सवाल सारे इस दौर ए निज़ाम में यह व्यवस्था पुख्ता है । तोड़ दिये गये हैं सब दाँत निरर्थक बताकर क्योंकि चाटने की परंपरा में काटना समस्या है । विश्व के इस सबसे बड़े सियासी लोकतंत्र में आवाम की कोई भी मजबूरी सिर्फ़ एक मौक़ा है । अपराधियों की श्रेणी में अब वो सब शामिल हैं जिनका कि खून व्यवस्था के ख़िलाफ़ खौलता है । जब कोई आख़री पायदान से चीख़ता-चिल्लाता है तो यक़ीनन वह उम्मीद की नई मशाल जलाता है । तुम्हें अब तक जितनी भी शिकायत रही है मुझसे वो तेरे इश्क़ का अंदाज़ है जो मुझे बहुत भाता है । ----------------- मनीष कुमार मिश्रा
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।