राष्ट्रकवि दिनकर : उपाधि, साहित्यिक प्रतिष्ठा और उसकी निर्मिति रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी साहित्य के उन विरल कवियों में हैं जिनकी पहचान उनकी रचनाओं से आगे बढ़कर एक सार्वजनिक सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में निर्मित हुई। उन्हें सामान्यतः ‘राष्ट्रकवि’ कहा जाता है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, सरकारी प्रकाशनों, साहित्यिक संस्थाओं और जनस्मृति में ‘राष्ट्रकवि दिनकर’ एक लगभग स्थिर संबोधन बन चुका है। किंतु जब इस संबोधन को आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाता है तो कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं—दिनकर को ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि आखिर किसने दी? क्या यह कोई औपचारिक उपाधि थी? यदि नहीं, तो इसका प्रचलन कैसे हुआ? और सबसे महत्वपूर्ण, जब मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सोहनलाल द्विवेदी आदि अनेक कवियों के काव्य में राष्ट्रीय चेतना अत्यंत प्रबल थी, तो ‘राष्ट्रकवि’ संबोधन दिनकर के साथ ही इतनी स्थायी शक्ति से क्यों जुड़ गया? इन प्रश्नों का उत्तर केवल दिनकर की राष्ट्रवादी कविताओं में खोजने से नहीं मिलेगा। इसके लिए साहित्य, राजनीति, सार्वजनिक जीवन, आलोचना, लोकप्...
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हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।