Wednesday, 11 January 2023

स्वामी विवेकानन्द: व्यक्तित्व और कृतित्व

     स्वामी विवेकानंद जी का जन्म मकर संक्रांति 12 जनवरी सन 1863 में कोलकाता के सिमला पाली,गौर मोहन मुखर्जी लेन, के एक संपन्न परिवार में सुबह 6.33 पर हुआ । आप अपने माता-पिता की छठवीं संतान थे।  आप के दो अन्य भाई महेन्द्रनाथ और भूपेन्द्र्नाथ थे । आप तीनों भाई आजीवन अविवाहित रहे । मात्र 39 साल की उम्र में स्वामी विवेकानंद ने जो ख्याति अर्जित की वो दुर्लभ है । भारत के सबसे प्रभावशाली शिक्षाविद् और आध्यात्मिक विचारक के रूप में स्वामी जी हमेशा के लिए अमर हो चुके हैं । उनके निडर एवं साहसी व्यक्तित्व  के लिए कई लोग उन्हें एक आइकन / एक आदर्श के रूप में मानते हैं । युवाओं के लिए उनके सकारात्मक उपदेश, सामाजिक समस्याओं के प्रति उनका व्यापक दृष्टिकोण और वेदांत दर्शन पर अनगिनत व्याख्यान और प्रवचन हमेशा ही उनके व्यक्तित्व को एक प्रकाश पुंज के रूप में पूरी दुनियाँ को आकर्षित करता रहेगा । विवेकानंद का व्यक्तित्व  ज्ञान और विचार की व्यापकता और गहराई के लिए हमेशा ही उल्लेखनीय रहेगा । सामाजिक-आर्थिक और नैतिक संरचना में व्याप्त बुराइयों के प्रति संवेदनशीलता, अद्वैत तप और समाज सेवा को लेकर उनकी दृष्टि बेहद स्पष्ट थी ।  

                स्वामी जी के दादा दुर्गा चंद्र दत्त बड़े जमींदार और धनी व्यक्ति थे । आप ने बाद में संन्यास ले लिया था । विश्वनाथ दत्त आप के इकलौते पुत्र थे । स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता उच्च न्यायालय में वकील/अटॉर्नी  थे । आप की माँ भुवनेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं । माँ के व्यक्तित्व की व्यापक छाप विवेकानंद पर पड़ी । आप के पिता कम उम्र में ही सब कुछ त्याग कर संन्यासी हो गए थे, जिसका प्रभाव भी स्वामी जी के ऊपर हुआ । बचपन से ही आप साधू-संतों को ध्यान से सुनते और जो कुछ उनके पास होता , उसे खुले दिल से दान कर देते । आप का वास्तविक नाम नरेन्द्र्नाथ दत्त था । रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बनने के उपरांत आप स्वामी विवेकानंद के रूप में जाने गए । आप की स्मरण शक्ति विलक्षण थी । अपने मित्रों के बीच बड़े लोकप्रिय और सदैव उनका आप नेतृत्व करते । गाय, बंदर और पक्षियों से आप को विशेष लगाव था । आप पाक कला में भी निपुण थे । आप को घुड़सवारी, तैराकी, कुश्ती, मुक्केबाज़ी और शास्त्रीय संगीत से विशेष लगाव था । आप को संगीत की शिक्षा देने वालों में उस्ताद बेनी गुप्ता और अहमद खान का नाम लिया जाता है । स्वामी जी बंगाली गीत नहीं गाते थे, लेकिन परमहंस जी के लिए आप ने बंगाली गीत सीखे । आप ने जो पहला बंगाली गीत सीखा वह था – “मन चलो निजी निकेतन” 

                       सन 1877 में आप के पिता सपरिवार रायपुर आ गए । यहीं रहते हुए स्वामी जी नें हिन्दी सीखी । क्या ईश्वर है ? यह प्रश्न भी आप के मन में पहली बार यहीं रहते हुए आया । सन 1879 में आप पुनः परिवार के साथ कोलकाता आ गए । कई लोग यह मानते हैं कि रायपुर ही स्वामी जी की”आध्यात्मिक जन्मभूमि” रही ।  स्कूल की शिक्षा पूरी करके आप ने प्रेसीडेंसी कॉलेज और स्काटिश मिशनरी कालेज में शिक्षा का क्रम जारी रखा । आप के प्राचार्य डॉ. हेस्टी ( Hastie) आप से प्रभावित थे । आप बचपन से ही ध्यान लगाते थे । कहते हैं कि बचपन में ध्यान की अवस्था में एक सर्प आप के पास आ गया लेकिन आप को इस बात का भान ही नहीं हुआ । सन 1881 में आप ने फ़ाईन आर्ट्स की परीक्षा पास की और सन 1884 में आप स्नातक हुए । स्नातक होने के बाद आप ने मेट्रोपोलिटेंट इंस्टीट्यूट (वर्तमान विद्यासागर कालेज ) से कानून की पढ़ाई शुरू की । लेकिन आप अंतिम परीक्षा में शामिल न हो सके । आप के पिता की मृत्यु सन 1884 में हुई । 

                    स्वामी जी  की आश्चर्यजनक याददाश्त के कारण उन्हें कुछ लोग ‘श्रुतिधरा’ भी कहते थे । ब्रह्म समाज का भी आप के ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा । आप ब्रह्म समाज के सदस्य भी रहे । ब्रह्म समाज से जुड़ने के बाद नरेन्द्र को ब्रह्म समाज के प्रमुख महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर से मिलने का मौका मिला और अपनी आदत के अनुसार उनसे पूछा कि “क्या उन्होंने ईश्वर को देखा हैं?”, तब देवेन्द्रनाथजी ने उनके प्रश्न का उत्तर देने की बजाय उनसे कहा कि “बेटे, तुम्हारी नज़र एक योगी की हैं”, और इसके बाद भी उनकी ईश्वर की खोज जारी रही । आप अपने चिंतन में “प्रमाण” को प्रमुख मानते थे । आप केशव चंद्र सेन से भी कुछ दार्शनिक प्रश्नों को लेकर मिले किन्तु यहाँ भी आप को समाधान नहीं मिला । 

                  नवंबर 1880 में आप पहली बार रामकृष्ण परमहंस जी से मिले । पिता की मृत्यु के बाद तो आप दक्षिणेश्वर में रामकृष्ण परमहंस जी से मिलने कई बार गए । यहीं पर काली माता से उन्होने आर्थिक तंगी दूर करने की बजाय विवेक और वैराग्य मांगा ।  पिता की मृत्यु के बाद आर्थिक तंगी दूर करने के लिए आप ने कुछ समय के लिए मेट्रोपोलिटेंट इंस्टीट्यूट में शिक्षक के रूप में भी कार्य किया ।  सन 1885 में रामकृष्ण जी को गले का कैंसर हो गया तो वे कोलकाता चले आए । यहाँ रहते हुए स्वामी विवेकानंद ने गुरु की बहुत सेवा की । 16 अगस्त सन 1886 में रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु तक तो आप उनके सबसे प्रिय शिष्यों में अपनी जगह बना चुके थे । कोई गुरु अपने शिष्य के लिए महान वचनों को कहे यह हमेशा ही महत्वपूर्ण होता है । रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद को महानताओं का प्रतीक मानते थे । वे उन्हें सोलह पंखुड़ियों वाला कमल नहीं अपितु सहस्रदल कमल के रूप में संबोधित करते थे । अद्वैत वेदांत की शिक्षा आप को अपने गुरु से ही मिली । 

              स्वतंत्रता और समानता जैसे सिद्धान्त जो कि फ्रांसीसी राज्य क्रांति के नींव में थे, उनसे भी आप प्रभावित रहे । संस्कृत और अँग्रेजी भाषा के आप बड़े ज्ञाता थे । पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान और लोकतांत्रिक पद्धतियों की भी उन्हें गहरी समझ थी । शेले के सर्वात्मवाद और वर्ड्सवर्थ के दार्शनिक मान्यताओं के आप प्रशंसक थे ।अपने गुरु की मृत्यु के पश्चात् वे स्वयं और रामकृष्ण परमहंस के अन्य शिष्यों ने सब कुछ त्याग करके, मठवासी बनने की शपथ ली और वे सभी बरंगोर में निवास करने लगे जो कि किराये पर लिया गया स्थान था । सन1887 में नरेंद्रनाथ सहित रामकृष्ण के पंद्रह शिष्यों ने मठवासी होने की प्रतिज्ञा ली। और वहीं से नरेंद्र,  स्वामी विवेकानंद बने । ‘विवेकानंद’ शब्द का अर्थ है - ज्ञान की अनुभूति का आनंद ।  ये सभी पंद्रह शिष्य उत्तरी कलकत्ता के बारानगर में एक साथ रहते थे, जिसे रामकृष्ण मठ के नाम से जाना जाता था । वे सभी योग और ध्यान का अभ्यास करते थे। 

                    गुरु की मृत्यु के बाद स्वामी जी ने पाँच वर्षों तक पूरे देश का भ्रमण किया । इन यात्राओं के बीच उन्होने संस्कृत और भारतीय धर्म शास्त्रों का गहन अध्ययन किया । सन 1888 में आप ने अपनी यात्रा काशी से शुरू की । यहाँ वे भूदेव मुखोपाध्याय और  बाबू परम दास से मिले । इसके बाद वे अयोध्या, लखनऊ, आगरा, वृंदावन, हाथरस और ऋषिकेश गए । हाथरस में ही आप स्टेशन मास्टर शरत चंद्र गुप्ता से मिले जो आगे चलकर आप के शिष्य बने । 1888 से 1890 के बीच बैद्यनाथ, इलाहाबाद, गाजीपुर, नैनीताल, अल्मोड़ा, श्रीनगर, देहरादून, हरिद्वार और हिमालय के अनेक स्थलों की आप ने यात्रा पूरी की । अपनी यात्रा के अंत में सन 1891 के आस-पास आप दिल्ली आए । यहाँ से अलवर, जयपुर, अजमेर, माउंट आबू और फिर आप महाराष्ट्र आए । महाराष्ट्र के अहमदाबाद और लिम्बडी की यात्रा आप ने की । यहीं आप की मुलाक़ात ठाकोरे जी से हुई जिनसे मिलकर आप को पश्चिम में वेदांत की शिक्षा देने का ख़्याल आया । आगे की यात्रा में आप जूनागढ़, पोरबंदर, कच्छ, द्वारका और बड़ोदा होते हुए पुणे और महाबलेश्वर आए । सन 1892 में आप मध्यप्रदेश के खंडवा और इंदौर में रहे । दिसंबर 1892 में आप कन्याकुमारी के एक मंदिर में आए । यहीं उनकी बाल गंगाधर तिलक से भी मुलाक़ात हुई । भारत के अंतिम छोर की आखिरी चट्टान पर बैठकर आप ने अपने भविष्य की राह सुनिश्चित की । यह जगह आज “विवेकानंद शिला” के नाम से जानी जाती है ।   

                 गुजरात और मद्रास के अपने गुरु भाइयों एवं शिष्यों के माध्यम से आप को शिकागो में आयोजित होनेवाली धर्म संसद के बारे में पता चला । पहले उन्हे यहाँ जाने में संकोच हो रहा था, लेकिन एक दिन स्वप्न में उन्हें गुरु का आदेश प्राप्त हुआ जिसके बाद वो शिकागो जाने के लिए तैयार हुए । 31 मई 1893 में आप अमेरिका के शिकागो में आयोजित सर्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने गए । सिंगापुर, हाँगकाँग और टोकियो होते हुए वे अमेरिका पहुंचे । अमेरिका पहुँचने पर उन्हें पता चला कि सम्मेलन में भाग लेने के लिए उन्हें इस आशय का पत्र देना होगा कि वे अपने धर्म के अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में आए हुए हैं । स्वामी जी ने ऐसा कोई पत्र किसी से लिया नहीं था । उन्हें लगा कि अमेरिका आने का उनका प्रयोजन अधूरा रह जाएगा । अपनी चिंता से उन्होने उस अमेरिकी प्रोफेसर J.H.Wright को अवगत कराया जिनसे उनकी ट्रेन में मुलाक़ात हुई थी । प्रोफ़ेसर साहब आप के व्यक्तित्व से प्रभावित थे अतः उन्होने सम्मेलन के अध्यक्ष को “Letter of Introduction” लिखा । 

                     लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं हुई । सूचना मिली कि कतिपय कारणों से सम्मेलन कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया है । स्वामी जी के पास न तो अधिक धन राशि बची थी ना ही वहाँ रहने का कोई ठिकाना था । ऐसे में कुछ लोग जो स्वामी जी की सादगी और विचारों से प्रभावित थे उन्होने स्वामी जी को अपने घर में शरण दी । आखिर धर्म संसद के आयोजन का समय आ गया । स्वामी जी ने 11 सितंबर 1893 को वहाँ अपना ऐतिहासिक व्याख्यान दिया । 11 मिनट के आप के व्याख्यान के बाद तो पूरा अमेरिका आप का मुरीद हो चुका था ।  स्वामी विवेकानंद जी को वहाँ की प्रेस ने “Cyclonic Monk from India” का नाम दिया था । द न्यूयार्क हरोल्ड ने स्वामी जी के विषय में लिखा कि,” Vivekananda was undoubtedly the greatest figure in the parliament of Religion; after hearing him we feel how foolish it is to send missionaries to this learned Nation.” अमेरिका के अख़बार आप की प्रशंसा से पट गए ।  धर्म संसद में 11 बार आप के व्याख्यान अलग-अलग प्रसंगों पर हुए । 27 सितंबर 1893 को धर्म संसद का कार्यक्रम समाप्त हुआ । उन्होंने ऐसी ही कई जगहों, घरों, कॉलेजों में अपने व्याख्यान दिए । अमेरिका से आप पेरिस होते हुए इंगलैंड गए । आप के तमाम व्याख्यानों को श्रीमान J.J. Goodwin ने लिपिबद्ध किया । वहाँ से 1895 में भारत लौटने  पर  आप का शाही स्वागत हुआ । कोलकाता में हज़ारों की भीड़ आप को देखने के लिए उतावली दिखी । अमेरिका में दिये आप के व्याख्यानों का संग्रह “ Lectures from Colombo to Almora” शीर्षक से प्रकाशित हुआ । देश-विदेश के कई लोग आप से प्रभावित होकर आप के शिष्य बने । ऐसे ही प्रमुख नामों में सिस्टर निवेदिता भी थी । जिन प्रमुख लोगों से आप की मुलाक़ात हुई उनमें प्रोफ़ेसर मैक्स मूलर, पॉल ड्युसेन, ए. स्टर्डी, श्रीमान सेवियर एवं मिस मार्गरेट प्रमुख थीं । 

                सन 1897 में आप ने कोलकाता के बैलूर में “रामकृष्ण मिशन” की स्थापना की । सन 1898 में आप दुबारा पश्चिम की यात्रा पर गए । इसी बीच आप ने सैनफ्रांसिस्को में “शांति आश्रम” की स्थापना की । यहीं से वापस भारत लौटने पर 04 जुलाई सन 1902 को आप का देहांत हो गया । स्वामी जी ने कुछ व्याख्यान हिन्दी में भी दिये थे जो कि उपलब्ध नहीं हैं । आप का सम्पूर्ण साहित्य अँग्रेजी में 08 खण्डों में “Complete Works of Swami Vivekananda” शीर्षक से प्रकाशित है । इनमें आप के लिखे पत्र और कुछ कवितायें भी शामिल हैं । आप की पहली पुस्तक “कर्मयोग” सन 1896 में न्युयार्क से, “राजयोग” इंगलैंड से और “भक्तियोग” मद्रास से प्रकाशित हुई थी । इन पुस्तकों के प्रकाशन के बाद डॉ. आर.सी. मजूमदार और श्री आर.जी.प्रधान जैसे विद्वानों ने आप को “आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद का पितामह” घोषित किया । 

                      अपने मौलिक चिंतन और सेवा कार्य के प्रति जुनून के कारण सभी में विशेष रूप से लोकप्रिय भी थे । उन्होंने गरीबों और दलितों की सेवा पर जोर दिया एवं इसे बड़ा पवित्र कार्य माना । एक दार्शनिक उपदेशक और समाज सुधारक  के रूप में स्वामी विवेकानंद ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया । मानवता का उत्थान उनके जीवन का परम लक्ष्य था । उन्होने  विचारों की गतिशीलता पर जोर दिया तथा मानव जीवन की उत्कृष्टता के लिए शरीर और आत्मा की पवित्रता की बात की । शिक्षा संबंधी अपने विचारों को लेकर वो स्पष्ट रूप से कहते थे कि अधिकांश देशों में औपचारिक स्कूली शिक्षा पर जोर दिया जाता है न कि श्रेष्ठ मानव-निर्माण संबंधी गतिविधियों पर । परिणाम यह है कि इतनी शिक्षा के बाद भी अराजकता का कोई अंत नहीं है । स्वामी जी यह समझ चुके थे कि मानव मात्र की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है । स्वामी जी कहते थे कि,” I am s Socialist not because I think it is a perfect system, but because half-a-loaf is better than no bread.” गरीबों के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रगति के लिए वे समाज के बड़े वर्ग को हमेशा चेताते रहे । 

                    वे साफ़ मानते थे कि धन का आधिक्य मूलभूत मानवीय मूल्यों पर हावी नहीं होना चाहिए। विवेकानंद जैसा द्रष्टा ही बहुत पहले ही इस मानवीय पीड़ा के कारण को समझ सकता था और उसका प्रचार कर सकता था । शिक्षा का दर्शन मानव जाति के कल्याण और उद्धार के लिए है यह सीख विवेकानंद से ही मिलती है । आप कर्म के बिना ज्ञान को निरर्थक मानते थे । अद्वैत वेदान्त को व्यावहारिक बनाने पर आप ने विशेष ज़ोर दिया । वेद, वेदान्त, गुरु की शिक्षा और अपने मौलिक चिंतन को उन्होने अपने विचारों की धुरी बनाई । विवेकानंद जी ने कभी उस ईश्वर की चर्चा नहीं की जो मृत्यु के बाद सुख प्रदान करे । उन्होने अपने वेदान्त के सिद्धान्त को सार्वभौमिक माना । वे भक्ति, ज्ञान और कर्म के समन्वय में विश्वास करते थे । वे वेदान्त को प्रतिदिन की पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन की कुंजी के रूप में देखते थे । धर्म के प्रति आप का दृष्टिकोण वैज्ञानिक और बुद्धिवादी रहा । आप ने सांप्रदायिकता का खुल के विरोध किया । हिन्दू धर्म की मानवतावादी व्याख्या प्रस्तुत करने में आप पूरी तरह सफल रहे । 

               आप ने राष्ट्रवाद का सांस्कृतिक एवं धार्मिक सिद्धान्त प्रतिपादित किया । गुलाम भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अलख जगाने में विवेकानंद का महत्वपूर्ण योगदान रहा है । वे भारत के राष्ट्रवाद का प्रधान तत्व धर्म को मानते थे । वे हमारी आध्यात्मिकता की तुलना हमारे जीवन रक्त से करते हैं । भारत के कल्याण को अपना कल्याण माननेवाले वे एक कद्दावर विचारक थे । वे चिंतन और कार्य की स्वतंत्रता के परम हिमायती थे । समाज में किसी भी प्रकार के भेदभाव और शोषण का आप ने खुलकर विरोध किया । आप ने अधिकारों की जगह कर्तव्य को हमेशा ही प्रमुखता दी । आप सार्वभौमिकता और विश्व बंधुत्व के सबसे बड़े हिमायती रहे । छुआछूत, स्त्री अधिकार, बाल विवाह का विरोध एवं दलित उत्थान जैसे विषयों को लेकर आप जीवन भर सक्रिय रहे । स्वामी जी शुद्ध भारतीय शिक्षा पद्धति के समर्थक थे । आप शिक्षा पाठ्यक्रमों में धर्मग्रंथों को इस उद्देश्य से सम्मिलित करवाना चाहते थे कि इससे धार्मिक आडंबर और अंधविश्वास को व्यापक रूप से नियंत्रित किया जा सकेगा । स्वामी जी कहते हैं कि, “Soul is a circle whose circumstances is nowhere (limitless), but whose center is in somebody. Death is but a change of center. God is a circle whose circumference is nowhere and whose center everywhere. When we can get out of the limited center of body, we shall realize God, our true self.”  

        वास्तव में, शिक्षा का उनका दर्शन उपनिषदों, गीता, अद्वैत वेदांत एवं  भागवत के शाश्वत सत्य पर आधारित है । विवेकानंद के लिए, "शिक्षा पूर्णता की अभिव्यक्ति है।“ उनकी दृष्टि में शिक्षा जीवन का स्वरूप है ।  विवेकानंद ऐसे उच्च नैतिक आदर्श की तलाश करते हैं जैसे कि - सार्वभौमिक प्रेम, जो मनुष्य और मनुष्य के बीच सभी बाधाओं को पार करते हुए उन्हें एक सूत्र में जोड़ सके । वे एक ऐसे आधार को तलाशते हैं जो एक दुनिया के गठन को बढ़ावा देता है । इसे हम  “अस्तित्व की आध्यात्मिक एकता” के रूप में भी समझ सकते हैं । इसमें कोई संदेह नहीं है कि, दुनिया का एकीकरण करने में  इस तरह की शिक्षा की तत्काल आवश्यकता है । 

            19वीं शताब्दी के निर्णायक काल में भारत के शिक्षित लोग अधिकतर थे जो पश्चिम की संस्कृति से प्रभावित थे । इनके अंदर आत्मगौरव के लिए कोई सूत्र नहीं था । लेकिन विवेकानन्द की दृष्टि में शिक्षा जड़ विचार नहीं अपितु एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से जीवन के आंतरिक मूल्यों का निर्माण किया जा सकता है।  पश्चिम की सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति से ऊपर उठकर उन्होने सोचने की एक नई दृष्टि दी । उनके विचार में सच्ची शिक्षा निहित है जो आधुनिक विज्ञान के साथ वेदांत का सम्मिश्रण या संलयन करती हुई दिखाई पड़ती है। पुनरुत्थानवादी भारत के अग्रदूत के रूप में उनके पास अपनी मौलिक सोच थी जिसके केंद्र में मनुष्यता थी । मानवता के सार्वभौमिक शिक्षक, विवेकानंद ने पूर्व और पश्चिम दोनों की समस्याओं को गहराई से महसूस किया। उनके द्वारा निर्धारित समाधान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों थे। एक मनुष्य के रूप में अपने व्यक्ति को पूर्वाग्रहों और अंधविश्वासों से मुक्त करना विवेकानंद अनिवार्य मानते थे । शिक्षा की अपनी अवधारणा में विवेकानंद का वेदांतिक दृष्टिकोण का बहुत अधिक योगदान है ।

           भारत में शिक्षा का स्वरूप स्पष्ट करते हुए स्वामी जी मनोविज्ञान, योग और अद्वैत के विचार के उपयोग पर बल देते हुए दिखाई पड़ते हैं । वे धर्म को माध्यम और योग को उचित तरीका मानते हैं । विवेकानंद स्पष्ट रूप से मानते थे कि शिक्षा पेशे के लिए नहीं अपितु जीवन के लिए होनी चाहिए । जीवन के लिए शिक्षा आवश्यक रूप से  व्यापक होनी चाहिए। यह  एक निरंतर जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है । आदर्श शिक्षा का अर्थ केवल सूचना एकत्र करना नहीं है। विवेकानंद ने परिभाषित किया है कि शिक्षा - "मनुष्य में पहले से ही पूर्णता की अभिव्यक्ति" के रूप में और धर्म - "मनुष्य में पहले से ही दिव्यता की अभिव्यक्ति" के रूप में । इस तरह सच्ची शिक्षा और सच्चा धर्म लगभग विनिमेय शब्द हैं । विवेकानंद की भारत के नवनिर्माण की योजना में गरीबी, बेरोजगारी को दूर करना और जनता को शिक्षित करना महत्वपूर्ण है  ताकि उनकी खोई हुई वैयक्तिकता हो बहाल किया जा सके । आज हम विवेकानंद के विचारों से पूरी तरह मेल खाते हुए पूरे भारत में अनेकों को देखते हैं । विवेकानंद के मानव-निर्माण के विचारों के मूल उद्देश्यों का समर्थन करते हुए आज कई विचारक उनके गुणगान गाते नहीं थकते । स्वामी जी चाहते थे कि सारी शिक्षा की नींव आध्यात्मिकता के मूल आधार पर रखी जाए।

             एक राष्ट्र या समाज के जीवन को बनाए रखने और एकीकृत करने के साथ-साथ पूरा करने के लिए,जिस समग्र मानवीय चिंतन की जरूरत थी वो स्वामी विवेकानंद के विचारों में स्पष्ट होती है ।  एक राष्ट्र के जीवन में संस्कृति इस अर्थ में व्यापक और एकीकृत है कि समाज जो कुछ भी करता है  इसके लिए  प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसकी “संस्कृति की अभिव्यक्ति” को ही जिम्मेदार माना जा सकता है। हालांकि विभिन्न संस्थानों, रीति-रिवाजों और शिष्टाचार के साथ-साथ विचार पैटर्न भी अपनी संस्कृति को व्यक्त करने में मदद करता है, संस्कृति ऐसी कोई चीज नहीं है किसी एक या एक से अधिक के संदर्भ में  व्यक्त होती रहे । इसे तो अति व्यापक रूप से पहचाना और परिभाषित किया जाना चाहिए ।  किसी संस्कृति को समझना, उसे जीना और उसमें विकसित होना एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा है। इसमें भाग लिए बिना एक संस्कृति की सराहना करना काफी कठिन है।  उन्होने स्पष्ट रूप से कहा है – 

       “ National union in India must be the gathering up of the scattered spiritual forces. A nation in India must be the union of those whose hearts beat to the same spiritual tune.”                 

           भारतीय संस्कृति  के हिंदू विचारकों में यह विवेकानंद थे जिन्होंने सार को समझने की कोशिश की और भीतर से भारतीय संस्कृति का अर्थ भी । उनके पास ऐसे व्यक्ति के करीब रहने का दुर्लभ विशेषाधिकार था जो भारतीय आध्यात्मिकता का एक जीवित अवतार माने जाते हैं ।  एक साधु के रूप में भारत की लंबाई और चौड़ाई में उनकी व्यापक यात्राएँ, भारतीय स्रोत साहित्य की उनकी गहन समझ, और उनका व्यक्तिगत बोध इसके उच्चतम मूल्यों ने उन्हें संस्कृति के  अर्थ को गहराई से समझने में मदद की । हिंदू धर्म की सबसे रचनात्मक तरीके से व्याख्या करने की उनकी क्षमता से कहीं अधिक उनकी सफलता भारत को उसकी आध्यात्मिक नींद से जगाने में, उसका मार्गदर्शन करने में निहित है । विवेकानंद अधिकांश अन्य महान और रचनात्मक लोगों की तरह अपनी अंतर्दृष्टि के लिए अधिक जाने जाते हैं । विवेकानंद ने भारतीय जीवन के लगभग सभी पहलुओं को छुआ है और उन्हें उनके सही परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशिश की। स्वामी जी के शब्दों में – 

“When the blood is strong and pure, no disease germs can live in the body. Our life blood is spirituality. if it flows clear, if it flows strong and pure and vigorous, everything is right; political, social, any other material defects, even the poverty of the land will all be cured if that blood is pure. For if the disease-germ is thrown out, nothing will be able to enter into the blood.” 

            स्वामी विवेकानंद के व्याख्यानों और भाषणों से बहुत से युवाओं को समाज-सेवा और चरित्र-निर्माण की प्रेरणा मिली । स्वामी विवेकानंद ने अपना जीवन समर्पित कर दिया युवाओं को समाज-सेवा के महत्व को पढ़ाने और मार्गदर्शन करने में । स्वामी विवेकानंद अपने पूरे जीवनकाल में युवाओं के लिए एक शक्तिशाली प्रेरणा थे ।  स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि 1984 में, भारत सरकार ने इसकी औपचारिक घोषणा की । स्वामी जी  समझते थे कि किसी भी सामाजिक परिवर्तन के लिए भारी ऊर्जा की आवश्यकता होती है और हमेशा रहेगी । इसलिए उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे न केवल अपनी मानसिक ऊर्जा  का निर्माण करें, बल्कि शरीर से भी ताकतवर बनें । वे  चाहते थे कि युवाओं में अदम्य इच्छाशक्ति और महासागर पीने की ताकत हो । वह युवाओं को शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से तैयार करना चाहते थे । 

            स्वामी विवेकानंद के इतिहास के काम को हमेशा भारत के इतिहास में बड़े योगदान के रूप में याद किया जाता है। वह एक भारतीय हिंदू भिक्षु जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदू धर्म के विश्वासों और मान्यताओं को फैलाने में लगा दिया ।  जिनके लिए धार्मिक होने का अर्थ है  जीवन व्यतीत करना एक तरीका जिससे हम अपनी उच्च प्रकृति, सच्चाई, अच्छाई और सुंदरता को अपने विचारों में प्रकट करते हैं । इस लक्ष्य की ओर ले जाने वाले सभी आवेग, विचार और कार्य स्वाभाविक रूप से उदात्त, सामंजस्यपूर्ण और सच्चे अर्थों में  नैतिक हैं। स्वामी विवेकानंद का स्पष्ट मानना था कि हमें तकनीकी शिक्षा और अन्य सभी चीजों की आवश्यकता है, जो उद्योगों का विकास कर सकें । वे ऐसे विकास की बात करते  हैं जो संतुलित राष्ट्र के साथ हमें पश्चिम की गतिशीलता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ने का काम करे ।                        

            इस तरह के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक मिशनरी भावना की आवश्यकता है। हमें अपनी विकास सोच विकसित करना है। हमें क्षमताओं और अधिकारों की दिशा में हमारे कमोडिटी केंद्रित दृष्टिकोण को स्थानांतरित करना होगा। विकास की वास्तविक भावना के लिए हमें अंतर्ज्ञान के आधार पर एक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इस संबंध में मेरा अंतर्ज्ञान यह कह रहा है कि संस्थानों का संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक है। वास्तविकता के वर्तमान चरण में, लिबर्टी और मानव भावना की स्वतंत्रता विचारों के बहुत ही रोचक ध्रुवीकरण को बनाती है। हमें एक समाज या संस्थागत प्रणाली की आवश्यकता है जहां सभी के लिए अपनी क्षमताओं को अनुकूलित करने के अवसर हो सकते हैं। नीतियां जो सामाजिक रूप से उपयोगी और उत्पादक हैं और किसी भी विखंडन से परे हैं। हमें एक इंटरेक्टिव संस्थान की जरूरत है जो जीवन के शिखर को छूता है। स्वामी जी इसी के लिए एक अध्यात्म केन्द्रित शिक्षा की बात करते हैं । 

           संपूर्ण शैक्षिक कार्यक्रम को इस प्रकार नियोजित किया जाना चाहिए कि यह युवाओं को देश की भौतिक प्रगति में योगदान देने के लिए तैयार करे लेकिन  भारत की आध्यात्मिक विरासत के सर्वोच्च मूल्य को बनाए रखना हम सब की ज़िम्मेदारी है । भारत की सबसे प्रतिष्ठित विज्ञान संस्था -- इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंसेज, बेंगलूरू (आई आई एस सी) की स्थापना के पीछे विवेकानंद की प्रेरणा थी । सन 1893 में, जापान के योकोहामा से कनाडा के वैंकूवर तक पानी के जहाज पर स्वामी जी यात्रा कर रहे थे । यहीं एक भारतीय उद्योगपति से भारतीय समाज के कायाकल्प को लेकर उनकी चर्चा हुई। इस घटना के करीब पांच वर्षों बाद नवंबर 1898 में जमशेदजी टाटा ने स्वामी विवेकानंद को पत्र लिखकर यह स्मरण करवाया कि  जहाज यात्रा की उनकी चर्चा अब सार्थक होगी ।  टाटा ने स्वामी जी के विचारों से प्रभावित होकर भारतीय विद्यार्थियों के लिए एक विज्ञान शोध संस्था बनाने का निश्चय कर लिया था । 2 लाख स्टर्लिंग पाउंड की राशि इस कार्य के लिए टाटा ने प्रदान की थी। इस तरह  आई आई एस सी के निर्माण की कहानी बनी ।

                 विवेकानंद एक सच्चे वेदांतवादी थे। वे एक व्यावहारिक संत थे, गतिशील विश्व प्रेरक और मानव प्रेमी, जो मानव जाति को किसी भी चीज़ से अधिक प्यार करता है। वह  एक उत्साही अध्ययनकर्ता थे । दर्शनशास्त्र, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित अनेकों  विषयों की उन्हें गहरी जानकारी थी । विवेकानंद को वेदों, उपनिषदों सहित हिंदू शास्त्रों में भी रुचि थी। भगवद गीता, महाभारत और पुराण उनकी प्रिय पुस्तकों में थी । 

                  विवेकानंद ने अपनी यात्राओं के माध्यम से वर्षों तक वेदांतिक शास्त्रों और दर्शन का प्रचार किया । विवेकानंद एक प्रखर विद्वान, प्रख्यात वेदांतवादी, दार्शनिक और ब्रह्मचारी थे। वे भारतीय अध्यात्म के अमृत में डूबे हुए थे। विवेकानंद ईश्वर को सर्वोच्च शक्ति के रूप में वर्णित करते हैं। वह सर्वशक्तिमान,  और सर्वज्ञ है । मनुष्य ईश्वर का अवतार है, ईश्वर मनुष्य में प्रकट होता है। वह आगे कहते हैं कि आत्मा दिव्य और अमर है । इसलिए पूर्ण आत्मा (ब्रह्मा) और व्यक्तिगत आत्मा  के बीच कोई अंतर नहीं है। विवेकानंद वेदांतिक दर्शन से बहुत प्रभावित थे। उनका मानना था कि मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य निर्माता (भगवान) के साथ एकता प्राप्त करना है। स्वामी जी का धर्म के प्रति व्यापक दृष्टिकोण था। उनका धर्म प्रकृति में सार्वभौमिक है । उनके लिए मनुष्य की पूजा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है। दूसरे शब्दों में  मानवता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। उनके अनुसार वास्तविक सुख न तो शरीर में है न मन में, बल्कि जीवन की स्वतंत्रता में। इस प्रकार जीवन का लक्ष्य स्वतंत्रता है। स्वतंत्रता का प्रेरक है ब्रह्मांड, स्वतंत्रता लक्ष्य है। एक अखंड राष्ट्र के रूप में  भारत का स्वरूप बहुवचनात्मक है । बाह्य विविधताओं से परिपूर्ण इस देश में कुछ आंतरिक मूल तत्व हैं जो इसकी अखंडता के लिए कवच के समान हैं । भारतीयता जैसी अवधारनाएं इन्हीं प्रांजल तत्वों की खोह में सुरक्षित रहती हैं । पूरे विश्व में इस तरह का दूसरा उदाहरण नहीं है । ये तत्व ही प्रकाश के वे अंतःकेंद्र हैं जो पवित्र,निर्मल विचारों और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिये साहित्य और संस्कृति के माध्यम से सच्चा बयान प्रस्तुत करते हैं । एक राष्ट्र के रूप में हमें ऊर्जावान, प्रज्ञावान और अग्रगामी बनाते हैं । यह भी सिखाते हैं कि दृष्टि के विस्तार में हम एक हैं ।

                स्वामी जी के अनुसार हमें अपनीय मानवीय उदारता को और  विस्तार देना होगा,ताकि विस्तृत दृष्टिकोण हमारी थाती रहे ।  निरर्थकता में सार्थकता का रोपण ऐसे ही हो सकता है । स्वीकृत मूल्यों का विस्थापन और विध्वंश चिंतनीय है । विश्व को बहुकेंद्रिक रूप में देखना, देखने की व्यापक,पूर्ण और समग्र प्रक्रिया है । समग्रता के लिए प्रयत्नशील हर घटक राष्ट्रीयता का कारक होता है । जीवन की प्रांजलता, प्रखरता और प्रवाह को निरंतर क्रियाशीलता की आवश्यकता होती है । वैचारिक और कार्मिक क्रियाशीलता ही जीवन की प्रांजलता के प्राणतत्व हैं । जीवन का उत्कर्ष इसी निरंतरता में है । भारतीय संस्कृति के मूल में समन्वयात्मकता प्रमुख है । सब को साथ देखना ही हमारा सही देखना होगा । अँधेरों की चेतावनी और उनकी साख के बावजूद हमें सामाजिक न्याय चेतना को आंदोलित रखना होगा । खण्ड के पीछे अख्ण्ड के लिये सत्य में रत रहना होगा । सांस्कृतिक संरचना में प्रेम, करुणा और सहिष्णुता को निरंतर बुनते हुए इसे अपना सनातन सत्य बनाना होगा । 


              शिक्षा का विवेकानंद दर्शन उनके सामान्य दर्शन की एक शाखा है। उनका मानना था कि मनुष्य जन्म के समय पूर्ण होता है। अतः शिक्षा पहले से हीआदमी में पूर्णता की अभिव्यक्ति है । पूर्णता मनुष्य में पहले से ही निहित है और शिक्षा उसी की अभिव्यक्ति है। सभी पूर्णता प्राप्त करने के हकदार हैं। स्वामी विवेकानंद का शिक्षा दर्शन वेदांतिक दर्शन का प्रतिबिंब है। उनके अनुसार मनुष्य के आन्तरिक विकास का सर्वोत्तम साधन शिक्षा है। वे कहते थे कि शिक्षा और सभी प्रशिक्षण का अंतिम उद्देश्य मनुष्य बनाना होना चाहिए। स्वामी जी के अनुसार भारत को एक महान राष्ट्र बनने के लिए केवल एक ही काम करने की आवश्यकता है, और वह है – समन्वय । वे कहते थे कि – 

जब तक जीना, तब तक सीखना,अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। 

हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए ध्यान रखें कि आप क्या सोचते हैं।

यह कभी मत कहों कि 'मैं नहीं कर सकता', क्योंकि आप अनंत हैं। 

जब तक तुम अपने आप में विश्वास नहीं करोगे, तब तक भगवान में विश्वास नहीं कर सकते ।  

उठो, जागों और तब तक मत रुको जब तक अपना लक्ष्य प्राप्त ना कर सको । 

हम जितना बाहर आते हैं और जितना दूसरों का भला करते हैं, हमारा दिल उतना ही शुध्द होता हैं और उसमे उतना ही भगवान का निवास होगा । 

जब एक सोच दिमाग में आती हैं तो वह मानसिक और शारीरिक स्थिति में तब्दील हो जाती हैं । 

संसार एक बहुत बड़ी व्यायामशाला हैं जहाँ हम खुद को शक्तिशाली बनाने आते हैं । 

सच हजारो तरीके से कहा जा सकता हैं तब भी उसका हर एक रूप सच ही हैं । 

जिस वक्त मुझे यह महसूस हुआ कि भगवान शरीर रूपी मंदिर में रहते हैं, उस पल से मैं हर एक व्यक्ति के सामने खड़े हो कर उनकी पूजा करता हूँ । उस पल से मैं सारी बंदिशों से मुक्त हो गया ।  सभी चीज़ें जो बांधती हैं वो खत्म हो गई, और मैं स्वतंत्र हो गया । 

बाहरी स्वभाव आतंरिक स्वभाव का बड़ा रूप हैं । 

जैसे अलग-अलग धाराएँ अलग-अलग जगह से आती हैं पर सभी एक सागर में मिल जाती हैं, उसी तरह भिन्न- भिन्न विचारों के लोग भले सही हो या गलत सभी भगवान के पास जाते हैं । 


                इस तरह हम देखते हैं कि स्वामी विवेकानंद का जीवन उनका देखा हुआ एक उदात्त स्वप्न है । उनके विचार और कार्य एक तरह से उनके जीवन के अनुवाद जैसा है । उनका एक-एक शब्द एक नए भारत के इंतजार में गढ़ा हुआ सा है । वे चाहते थे कि सबकुछ छोडने के बाद भी हमारे अंदर करुणा, सहिष्णुता और प्रेम बचा रहे । फकीरी राह पर वे एक जुनून के साथ निकले थे । स्वामी विवेकानंद के शब्दों में हमारी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना की जड़े हैं । उनकी संवेदना का संबंध मानवीय करुणा और जन जागरण से है । स्वामी विवेकानंद  मनुष्यता की एक शाश्वत उम्मीद बनकर हमेशा अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगे ।स्वामी जी  हमारी शाश्वत सनातन परंपरा का पुनर्पाठ करने वाले पुरोधा हैं । आवश्यकता इस बात की है कि उनके मूल स्वरूप पर पड़े आवरण को हटाकर अपनी परंपरा,संस्कृति एवं आध्यात्मिक उदात्तता के आलोक में उन्हें देखा और समझा जाय । 




संदर्भ ग्रंथ : 


1. विवेकानंद : व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास, प्रभात प्रकाशन,नई दिल्ली, 2017

2. शिक्षा, स्वामी विवेकानंद, तृतीय संस्करण श्री रामकृष्ण आश्रम नागपुर, मध्यप्रदेश, जनवरी 1956 ' वाणी मंदिर, जयपुर. 

3. कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, खंड 44, नई दिल्लीः प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, 1999. 

4. द कंपलीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद, खंड 3, कोलकाताः अद्वैत आश्रम, 1989. 

5. सुमित सरकार, आधुनिक भारत (1885-1947), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1993.

6. योद्धा सन्यासी विवेकानंद, वसंत पोतदार, प्रभात प्रकाशन,प्रथम संस्करण, 2012

7. क्षेमेन्द्र और उनका समाज : डॉ. मोती चन्द्र, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, 1984 में प्रकाशित । 

8. भाषा और समाज – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, 2008 में प्रकाशित । 

9. Swami Vivekananda a Biography of His Vision and Ideas, Edited by Virender Grover, Deep & Deep Publication, New Delhi, 1998. 

10. Swami Vivekananda, edited by M.H. Syed, Himalaya books pvt. Ltd., New Delhi, 2011. 

11. Merina Islam & Desh Raj Sirswal (2013) Philosophy of Swami Vivekananda, CPPIS, Pehowa. 

12. Singh, Sheojee (2013) Man-Making Education: The Essence of a Value Based Society, Milestone Education Review, Year 04, No.1, April 2013. 

13. Bharathi, K.S. (1998), Encyclopedia of eminent thinkers: the political thought of Vivekananda, New Delhi: Concept Publishing Company. 

14. Mukherji, Mani Shankar (2011), The Monk as Man: The Unknown Life of Swami Vivekananda.

15. Chattopadhyay, Raja Gopal (1999), Swami Vivekananda in India: A Corrective Biography, Motilal Banarsidass Publication.

16. IDENTIFICATION OF COMMONNESS AMONG LETTER SETS OF VARIOUS LANGUAGES AND NUMERIC SYSTEMS FROM SANSKRIT. K.S.Vishwanath. Assistant Professor, Department of Aerospace Engineering, IIAEM, Jain University, Bangalore-562112. ISSN: 2320-5407 Int. J. Adv. Res. 6(11), 1060-1068. 

17. Postcolonial Indian Literature Towards a critical framework – Satish C. Aikant, Indian Institute of Advanced Study, Shimla, first published 2018. 

18. Literature and Infinity – Franson Manjali, Indian Institute of Advanced Study, Shimla, first published 2001.  

19. King Serfoji II of Thanjavur and European Music by Professor Indira Viswanathan Peterson, Mount Holyoke College, U.S.A, Journal of the Music Academy of Madras, Dec 2013. 


20. https://www.vifindia.org/article/hindi/2020/september/22/bharat-ke-svatantrata-senaaniyon-par-swami-vivekananda-ka-prabhaav 

21. https://isha.sadhguru.org/in/hi/wisdom/article/swami-vivekananda-ek-krantikari-sanyaasi

22. https://www.exoticindiaart.com/book/details/swami-vivekananda-his-character-and-teachings-nzi855/

23. https://www.hindisamay.com/content/11722/1

24. https://shubhamsirohi.com/swami-vivekanand-biography-in-hindi/

25. https://www.drishtiias.com/hindi/blog/swami-vivekananda-and-scientific-transformation-of-the-nation

26. https://www.bbc.com/hindi/india-41228101


Tuesday, 3 January 2023

स्वामी विवेकानंद पर डॉ. हर्षा त्रिवेदी की पुस्तक प्रकाशित।


 स्वामी विवेकानंद पर डॉ. हर्षा त्रिवेदी की पुस्तक प्रकाशित।



"स्वामी विवेकानंद: समग्र वैचारिक क्रांति" शीर्षक से डॉ. हर्षा त्रिवेदी द्वार संपादित पुस्तक आर. के. पब्लिकेशन, मुंबई से प्रकाशित हो चुकी है। इस पुस्तक में स्वामी विवेकानंद जी के विचारों, व्यक्तित्व और कृतित्व से संबंधित 26 आलेख हैं। पुस्तक की भूमिका पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ लेखिका डॉ विद्या विंदु सिंह ने लिखी है। 

     धर्म और अध्यात्म को आधार बनाकर स्वामी विवेकानंद जी ने राष्ट्रवाद की जो प्रांजल ज्योति प्रज्वलित की उसकी विस्तार से चर्चा पुस्तक के कई आलेखों में है । उनके जीवन, परिवार, संन्यास, यात्राएं, व्याख्यान, संदेश, शिक्षा संबंधी विचार, युवाओं को संदेश और प्रकाशित साहित्य पर केंद्रित आलेख महत्वपूर्ण हैं । जो बात इस पुस्तक को विशेष बनाती है वो है समग्रता में स्वामी विवेकानंद को देखने का प्रयास । इस पुस्तक में स्वामी विवेकानंद से संबंधित सभी रंग उपलब्ध हैं जो समग्रता में एक ऐसा इंद्रधनुष बनाते हैं जिसकी छटा मोहक, महत्त्वपूर्ण और समाजोपयोगी है। डॉ. हर्षा त्रिवेदी ने आलेखों का चयन बड़ी सूक्ष्मता और विवेकपूर्ण तरीके से किया है। यह उनकी संपादकीय दृष्टि ही है जो वे इस पुस्तक के कलेवर को इतनी विविधताओं के साथ समेटने में कामयाब रहीं।

     स्वामी विवेकानन्द जी के विचारों और जीवन पर पुस्तक प्रकाशन की विस्तृत और गौरवशाली परंपरा रही है। इसी श्रृंखला की कड़ी के रूप में डॉ हर्षा त्रिवेदी द्वारा संपादित यह पुस्तक परंपरा का सिर्फ़ निर्वहन नहीं कर रही अपितु कई संदर्भों में उसे अग्रगामी भी बना रही है। वर्तमान भारतीय सामाजिक फलक पर पावनता के पुनर्वास हेतु जिन जीवन मूल्यों, विचारों और आदर्शों की देश को जरूरत है उन्हें स्वामी विवेकानंद के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। एक आदर्श, प्रादर्श और प्रतिदर्श के रूप में स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व एक राष्ट्र नायक का व्यक्तित्व है । उनकी परंपरा से जुड़कर यह अनुभूति होती है कि हम ने सम सामयिक संदर्भों में सार्थक अभिव्यक्ति प्रदान की है। डॉ हर्षा त्रिवेदी ने संपादक के रूप में इस सार्थकता के अकादमिक अभियान का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया है।

      पुस्तक में संकलित आलेखों में विषय की नवीनता, भाषा एवं शैली वैविध्य इसे रोचकता प्रदान करता है। डॉ ज्योति शर्मा, डॉ महात्मा पाण्डेय, डॉ चमनलाल बग्गा, डॉ संदीप कदम, डॉ. कवलजीत कौर, डॉ. अर्जुन सिंह पंवार,डॉ. हर्षा त्रिवेदी,डॉ. मनीष कुमार मिश्रा, डॉ. मनीषा पाटील, डॉ. रवि रमेश, डॉ. गोविंद सिंह, डॉ. कुंजन आचार्य, श्री बृजेश कुमार शर्मा, डॉ. मनीष कुमार जैसल, अनुशांत सिंह तोमर,डॉ. रानू मुखर्जी,डॉ. हर्षल मधुकर बच्छाव ,श्रीमती क्रांती हर्षल बच्छाव, डॉ. अनघा राणे,डॉ. वर्षा महेश “गरिमा”, डॉ अनीता मन्ना, डॉ गजेन्द्र, डॉ बसुंधरा, डॉ सत्यवती चौबे  और डॉ शिवा दुर्गा का आलेख श्रम पूर्वक लिखा गया है। इन आलेखों के माध्यम से स्वामी विवेकानंद के जीवन के विविध पक्षों को भली भांति रेखांकित किया गया है। 

                  पुस्तक की भूमिका में डॉ विद्या विंदु सिंह जी लिखती हैं कि,"   डॉ. हर्षा त्रिवेदी को उनकी इस संपादित पुस्तक के लिये आशीष और बधाई । स्वामी विवेकानंद के जीवन और विचारों पर हमारे युवा इस तरह के रचनात्मक कार्यों में लगे हुए हैं, यह अपने आप में सुख देने वाली बात है । स्वामी जी का स्पष्ट मानना था कि धर्म और अध्यात्मिकता के स्तर पर हम बाहर से भले भिन्न दिखते हों लेकिन अंदर से एक हैं ।  यह एकरूपता आंतरिक है । इस देश में बाहरी रंग रूप से कहीं अधिक महत्व आंतरिक गुणों को दिया गया है । वैसे भी भारतीय होने का अर्थ है मानवीय होना, कृतज्ञतर होना । इस देश के अंदर रचा बसा सबकुछ इस देश का है ।" आदरणीय डॉ विद्या विंदु जी के ये शब्द इस पुस्तक के महत्व को रेखांकित करने में पूरी तरह समर्थ हैं। पुस्तक में संकलित आलेखों की मौलिकता सराहनीय है।


      मैंने पुस्तक में संकलित अपने आलेख में साफ लिखा है कि "हमें अपनीय मानवीय उदारता को और  विस्तार देना होगा,ताकि विस्तृत दृष्टिकोण हमारी थाती रहे ।  निरर्थकता में सार्थकता का रोपण ऐसे ही हो सकता है । स्वीकृत मूल्यों का विस्थापन और विध्वंश चिंतनीय है । विश्व को बहुकेंद्रिक रूप में देखना, देखने की व्यापक,पूर्ण और समग्र प्रक्रिया है । समग्रता के लिए प्रयत्नशील हर घटक राष्ट्रीयता का कारक होता है । जीवन की प्रांजलता, प्रखरता और प्रवाह को निरंतर क्रियाशीलता की आवश्यकता होती है । वैचारिक और कार्मिक क्रियाशीलता ही जीवन की प्रांजलता के प्राणतत्व हैं । जीवन का उत्कर्ष इसी निरंतरता में है । भारतीय संस्कृति के मूल में समन्वयात्मकता प्रमुख है । सब को साथ देखना ही हमारा सही देखना होगा । अँधेरों की चेतावनी और उनकी साख के बावजूद हमें सामाजिक न्याय चेतना को आंदोलित रखना होगा । खण्ड के पीछे अख्ण्ड के लिये सत्य में रत रहना होगा । सांस्कृतिक संरचना में प्रेम, करुणा और सहिष्णुता को निरंतर बुनते हुए इसे अपना सनातन सत्य बनाना होगा ।“ स्वामी विवेकानन्द ने इसी सनातन ताने बाने को वेदांत दर्शन के माध्यम से सार्वभौमिक सत्य के रूप में स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इस तरह के कई अन्य आलेख इस पुस्तक में हैं जो स्वामी जी के विचारों को समसामयिक मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करते हैं।


     समग्र रूप में कहा जा सकता है कि स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती (12 जनवरी) के पूर्व इस पुस्तक का प्रकाशन स्वामी जी के चरणों में सच्ची श्रद्धांजलि है । डॉ हर्षा त्रिवेदी को इस महती कार्य योजना के लिए बधाई । आप स्वयं विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, दिल्ली में प्राध्यापिक के रूप में कार्यरत हैं । निश्चित तौर पर यह पुस्तक उस संस्था के लिए भी गौरव का विषय होगी जो स्वयं स्वामी विवेकानंद के नाम पर संचालित हो रही है । पुस्तक अब पाठकों के बीच उपलब्ध है । अमेजन पर ऑनलाइन पुस्तक प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित लिंक का उपयोग किया जा सकता है ।  https://www.amazon.in/dp/B0BRH48LS4?ref=myi_title_dp

आशा है डॉ हर्षा त्रिवेदी इस तरह की सार्थक अकादमिक दख़ल लगातार बनाए रखेगी। उन्हें बधाई ।


                            डॉ मनीष कुमार मिश्रा

                             सहायक प्राध्यापक

                             के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय

                              कल्याण पश्चिम, महाराष्ट्र 

                            manishmuntazir@gmail.com

                             9082556682

                             


Monday, 26 September 2022

संत मीरा बाई पर संगोष्ठी

 तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी 


वैश्विक संदर्भ में संत मीरा


व्यंजना आर्ट एण्ड कल्चर सोसाइटी प्रयागराज तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय अंतर्विषयी संगोष्ठी चैतन्य प्रेम संस्थान, वृंदावन में दिनांक 7, 8 एवं 9 अक्टूबर 2022 को आयोजित कर रही है ।आप सभी से सम्बद्ध विषयों पर प्रपत्र आमंत्रित हैं—-

शेष विवरण जल्दी ही 😊


सोलहवीं शताब्दी में सामाजिक विषमताओं से विद्रोह करती मीरा का उद्भव एक कवियित्री, गायिका एवं एक संत के रूप में हुआ। राजघराने में जन्मीं एवं पली-बढ़ीं मीरा, अपनी माँ से प्राप्त प्रेरणा के कारण बचपन से ही श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व मानने लगीं थीं


जिस कीर्तिस्तंभ को वर्तमान में मीराबाई के नाम से जाना जाता है, उनका जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण था। मेवाड़ की पावन धरा पर जन्मीं मीरा के लिए तत्कालीन समाज में नवीन विचारधारा को लेकर स्थापित करना आसान न था। समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं बुराइयों का तिरस्कार मीरा ने भक्तिमार्ग अपना कर दृढ़ता से किया। कृष्ण को अपने जीवन की डोर सौंप, स्वयं को कृष्ण की दासी नियुक्त कर वे लेखन, गायन, वादन एवं भक्ति की पराकाष्ठा को प्राप्त हो गईं।


नारी-व्यथा-अभिव्यक्ति की पर्याय मीरा ने जाति-प्रथा, मांसाहार, पारिवारिक उपेक्षा, जौहर, पराधीनता, रंगभेद, अर्थभेद एवं मानव में लघु चेतना का दृढ़ता से विरोध किया। अपने चिंतन एवं तर्कों से मीराबाई ने समाज में व्याप्त अनेकों तुच्छ प्रवृत्तियों का दृढ़ता से विरोध किया और मानव का नैसर्गिक गुण ‘मानवता’ सिखाया।


जीवन की विसंगत एवं विषमतम परिस्थितियों में भी, सत्य के साथ सम्पूर्ण सामर्थ्य एवं अविचल स्थिरता उन्हें श्रीकृष्ण की भक्ति से प्राप्त हुई, ना-ना प्रकार की यातनायें, प्रताड़नायें सहर्ष सहन करती मीरा संसार के उत्कर्ष शिखर पर महानक्षत्र के रूप में सदा के लिए विद्यमान हो गईं।


ऐसी प्रेरणास्रोत ‘मीरा’ के जीवन पर चर्चा, विश्लेषण, वर्तमान संदर्भ में उनकी दृष्टि की उपादेयता जैसे आदि विषयों पर चिंतन मंथन आवश्यक है।


 


संगोष्ठी में निम्न बिंदुओं पर चर्चा करने की योजना है:


1.      संत मीराबाई: व्यक्तित्व एवं कृतित्व

2.      भक्ति आन्दोलन में मीराबाई का योगदान

3.      मीरा के पदों में भाषागत वैशिष्ट्य

4.      मीरा के पदों में आध्यात्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि

5.      साहित्य में मीरा

6.      मीरा के जीवन पर आधारित फिल्में

7.      मीरा स्त्री-विमर्श

8.      वर्तमान परिपेक्ष्य में मीरा

9.      सामाजिक संदर्भ में मीराबाई

10.   ललित कलाओं में मीराबाई

11.   मीराबाई के पदों में संगीत

12.   स्थापत्य एवं चित्रकलाओं में मीराबाई

13.   ऐतिहासिक संदर्भ में मीरा बाई

14.   मीरा पर हुए शोध कार्यों का विश्लेषण

15.   समकालीन संत साहित्य में मीराबाई

16.   सूफी संत के रूप में मीराबाई

17.   वैश्विक विचारकों की दृष्टि में मीराबाई

18.ओशो की मीरा

19.एम एस सुब्बुलक्ष्मी एवं मीरा

20.लोक परंपराओं में मीरा

हिन्दी दिवस की शुभकामनायें 2022


 

हिन्दी महोत्सव वीडियो





 

भारतेन्दु हरिश्चंद्र के नाटक

 

भारतेन्दु हरिश्चंद्र के नाटक

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

सहायक प्राध्यापक

के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय

कल्याण-पश्चिम

महाराष्ट्र

 

               कहते हैं कि संपूर्णता में देखना ही समग्रता में देखना है । भारतेन्दु हरिश्चंद्र का मूल्यांकन भी 1857 के बाद की निष्पत्तियों के परिप्रेक्ष्य में होना चाहिये । अंग्रेज़ राज के भक्त होने के बावजूद स्वराज्य, संस्कृति और कौशल विकास की बात करने वाले भारतेन्दु का समय जनजागरण की पुरानी परंपरा का एक विशेष और महत्वपूर्ण समय था । बोलचाल की सहज और सरल भाषा में साहित्य रचते हुए समाज प्रबोधन का समय । स्वाधीनता के महत्व को समझते हुए अंग्रेजी राज के स्वरूप को पहचानने का समय । स्वदेशी आंदोलन को व्यापक और बड़े धरातल पर उतारने का समय । भारतीय समाज की पतनोन्मुखता पर चिंतन का समय । हिन्दी गद्य को विकसित करते हुए अनेकानेक विधाओं में समाजोपयोगी साहित्य रचने का समय । अपने समय की इन सारी चुनौतियों को भारतेन्दु ने न केवल स्वीकार किया अपितु 34 साल और 04 महीने की पूरी आयु में एक कुशल संगठन कर्ता, साहित्यिक मार्गदर्शक और खुले आलोचक के रूप में अपना जीवन समर्पित रखा ।

 

             भारतेन्दु हरिश्चंद्र एक नाम नहीं बल्कि एक आंदोलन के रूप में जाना गया । अपने व्यक्तित्व की तमाम सीमाओं एवं विरोधाभासों के बावजूद, भारतेन्दु बाबू पुनर्जागरण के कद्दावर नायक के रूप में जाने गये । जनसंख्या नियंत्रण, श्रम के महत्व, आत्मबल , स्वदेशी का महत्व, स्त्री शिक्षा, धार्मिक कर्मकांड और आडंबर, तकनीक के महत्व और अपनी भाषा और संस्कृति की चिंता उनके विचारों एवं साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है । राष्ट्रीय स्वाधीनता को लेकर उनके उद्देश्य हमेशा से स्पष्ट रहे । हिन्दी पट्टी के परिवेश एवं आर्थिक स्थिति को भारतेन्दु बाबू ने गहराई से समझा था । हिन्दी को नई चाल में ढालते हुए आपने छोटे – बड़े लगभग 175 ग्रंथ लिखे । अपने श्रम एवं साहित्य साधना के माध्यम से ही आप ने इस आधुनिक हिन्दी गद्य के परिष्कार और परिमार्जन की नई परिपाटी शुरू की । आप हिन्दी के प्रथम समर्थ नाटककार बने । हिन्दी गद्य की अनेकों विधाओं के लिए आप एक आदर्श, प्रादर्श और प्रतिदर्श ( Ideal, Model, Sample)  के रूप में सामने आये ।

 

                     उन्होने अपने समय और समाज की आवश्यकताओं को समझते हुए भाषा के नए चलन या नई चाल को आंदोलित किया । जीवन के सामान्य अनुभव और आवश्यकताओं को गद्य के रूप में लिखने का काम स्वयं भी कर रहे थे और अपनी मित्र मंडली को भी प्रोत्साहित कर रहे थे । आज कई संदर्भों में उनकी अनेकों रचनाएँ बचकानी लग सकती हैं लेकिन जिस समय और परिस्थिति में वे गद्य पल्लवन की नीव डाल रहे थे, वह यह स्पष्ट करता है कि भारतेन्दु जडताओं से नहीं जड़ों से जुड़े हुए युग दृष्टा थे । परिनिष्ठित हिन्दी की नीव डालने वाले भारतेन्दु बाबू एक राष्ट्र वत्सल नायक थे । उनके गद्य को “हंसमुख गद्य” लिखने वाले आलोचक भी इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि उनकी भाषा में देशज मिट्टी की महक है । 1873 में हिन्दी को नई चाल में ढालने वाले भारतेन्दु बाबू के बाद आज 2022 तक 149 वर्षों का समय बीत चुका है । लेकिन आज की हिन्दी अपने इतने बड़े सेवक को भूल नहीं सकती ।

 

                  भारतेन्दु बाबू के नाटकों के संदर्भ में बात की जाय तो उनके द्वारा लिखे एवं अनुदित नाटक लगभग 850 पृष्ठों में छपे । उनके नाटकों में रत्नावली(संदिग्ध), विद्या सुंदर, पाखंड विडंबन, धनंजय विजय, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, प्रेम जोगिनी , सत्य हरिश्चंद्र , कर्पूरमंजरी , श्री विषस्य विषमौषधम,  चंद्रावली, मुद्राराक्षस , दुर्लभ बंधु,  भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, नील देवी, प्रेम प्रलाप, सती प्रताप, भारत जननी,इत्यादि । डॉ. दशरथ ओझा के अनुसार “भारतेन्दु के 18 नाटकों में 10 मौलिक और 07 अनुदित हैं । इनके अतिरिक्त प्रवास नामक उनका एक और नाटक था जो अब अप्राप्य है ।....हिन्दी –नाट्य-मंदिरमें विविध भाषाओं के नाटकों का वातायन बनाकर अभिनव विचार के स्वास्थ्य प्रद वायु प्रवेश के लिए भारतेन्दु ने मार्ग खोल दिया ।“1  आदर्श, यथार्थ, स्वच्छंदता, समाज सुधार और राष्ट्रीयता का भाव भारतेन्दु के नाटकों का केंद्र बिन्दु रहा है ।

 

                भारतेन्दु बाबू अपने पूर्ववर्ती नाटककारों में नेवाज़ एवं ब्रजवासीदास के नामों का उल्लेख करते हैं लेकिन इनके नाटकों को काव्य की भाँति” बताते हैं । 2 अपने पिता गोपालचन्द्र उपनाम गिरिधरदास द्वारा लिखित नाटक “नहुष” को आप विशुद्ध नाटक रीति से हिन्दी का पहला नाटक एवं राजा लक्ष्मण सिंह के शकुंतला नाटक को हिन्दी का दूसरा नाटक स्वीकार करते हैं जो कि एक अनुदित नाटक था। 3  डॉ. रामविलाश शर्मा भारतेन्दु के नाटक के क्षेत्र में अवदान को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि,”भारतेन्दु ने अपने मौलिक एवं अनुदित नाटकों के जरिये एक साथ कई काम किये । उन्होने नाटकों के माध्यम से नयी हिन्दी को लोकप्रिय बनाया, पारसी रंगमंच का विरोध किया और प्राचीन नाटकों का उद्धार किया । .....’’4

 

          भारतेन्दु के नाटकों के संदर्भ में एक बात और महत्वपूर्ण है कि अपने नाटकों को उन्होंने कई नामों से संबोधित किया जो कि संस्कृत नाटकों के रूप हैं । जैसे कि – रूपक, व्यायोग, सट्टक, नाट्यरासक, गीति रूपक, प्रहसन, नाटिका इत्यादि । अपने दो नाटकों को छोडकर बाकी सभी नाटकों को उन्होने संस्कृत परंपरा के अनुसार अंकों में विभाजित किया है । दृश्यों में विभाजित दो नाटकों में “विद्यासुंदर एवं “प्रेमजोगिनी” नाटक हैं । “पाखंड –विडंबन,धनंजय विजय” और “विषस्य विषमौषधम” एकांकी नाटकों में गिने जाते हैं । ये इस बात का साफ प्रमाण है कि वे औपनिवेशिक भाषा परिणाम से प्रभावित नहीं थे । पूरे समाज का चित्त जिस भाषा में गड़ा हुआ था वे उसी को नवीन प्रयोगों के साथ आगे बढ़ा रहे थे । भाषा और साहित्य को युगानुरूप प्रासंगिक एवं लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होने नाटकों का लेखन कार्य किया ।

         नाटक की व्याख्या करते हुए भारतेन्दु लिखते हैं कि,”काव्य के सर्व गुण संयुक्त खेल को नाटक कहते हैं । इसका नाटक कोई महाराज (जैसा दुष्यंत) व ईश्वरांश (जैसा श्रीराम ) वा प्रत्यक्ष परमेश्वर (जैसा श्रीकृष्ण ) होना चाहिये । रस शृंगार वा वीर । अंक पाँच के ऊपर और दस के भीतर । आख्यान मनोहर और अत्यंत सुंदर उज्जवल होना चाहिये । उदाहरण – शाकुंतल, वेणी संहार आदि ।’’5  लेकिन अपने आप को महा अंहकारी घोषित करने वाले भारतेन्दु बाबू अपनी ही परिभाषा के उलट विद्यासुंदर और सत्य हरिश्चंद्र को नाटक लिखते हैं जब कि इनमें क्रमशः तीन और चार अंक हैं । इससे यह स्पष्ट है कि प्राचीन रूपों का उपयोग वे करते तो हैं लेकिन अपनी आवश्यकता के अनुरूप उसमें बदलाव से भी चूकते नहीं हैं । भारतेन्दु नाटक के कथावस्तु को यथार्थवादी बनाते हुए नाटकों में यथार्थवाद की नींव डालते हैं । रमविलाश शर्मा लिखते हैं कि,”...हर नाटक लिखने के पीछे एक उद्देश्य है । नाटकों की कथावस्तु उनके अपने जीवन से और उनके चारों ओर के सामाजिक जीवन से ली गयी हैं । सत्य हरिश्चंद्र के हरिश्चंद्र में उन्होने अपने जीवन की करुणा उड़ेल दी है, प्रेमजोगिनी में उन्होने अपनी परिचित काशी का चित्र खींचा । .......भारतेन्दु ने नाटकों को देशभक्ति की भावना जगाने और चरित्र निर्माण करने का साधन बनाया, यही उनकी सफलता का रहस्य है  ।“6  

          भारतेन्दु बाबू के नाटकों की विवेचना के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन्होने अपनी संस्कृति में रची-बसी नाट्य परंपरा के साथ यूरोपीय नाट्य परंपरा का कुशलता पूर्वक संलयन किया । कथानक के अनुसार उन्हें जो शैली जिस रूप में ठीक लगी,उसे आवश्यक बदलाओं के साथ उन्होने अपना लिया । डॉ दशरथ ओझा के कथनानुसार रचना शैली में उन्होने मध्यम मार्ग पकड़ा – न तो अंग्रेजी नाटकों का अंधा अनुकरण किया और न बांग्ला नाटकों की भांति भारतीय शैली की नितांत उपेक्षा ही की …… तात्पर्य यह कि नाटक का गतिरोध करनेवाले सभी बंधनों से उन्होने अपने को मुक्त रखा ।“7

 

             

 

 

संदर्भ ग्रंथ :

1.                ओझा, डॉ. दशरथ हिन्दी नाटक उद्भव और विकास , राजपाल अँड सन्स, नई दिल्ली, संस्करण 2003, पृष्ठ संख्या 172

2.                शर्मा, रामविलाश - भारतेन्दु हरिश्चंद्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ , राजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली , ग्यारहवाँ संस्करण, पृष्ठ संख्या 111

3.        वही

4.        वही

5.        वही , पृष्ठ संख्या – 112

6.        वही , पृष्ठ संख्या – 113

7.                ओझा, डॉ. दशरथ हिन्दी नाटक उद्भव और विकास , राजपाल अँड सन्स, नई दिल्ली, संस्करण 2003, पृष्ठ संख्या 172

8.         

 

Sunday, 25 September 2022

भारतीय ज्ञान परंपरा और कबीर

 भारतीय ज्ञान परंपरा और कबीर

                 मानवीय आदर्शों के लोक कवि कबीर, भारतीय जनमानस के हृदय में गड़े हुए हैं । उनकी संवेदना का संबंध मानवीय करुणा और जन जागरण से है । कबीर को इसीलिए ‘मनुष्य की आत्मा’ का कवि स्वीकार किया गया । कबीर मनुष्यता की एक शाश्वत उम्मीद बनकर हमेशा अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेंगे । कबीर हमारी शाश्वत सनातन परंपरा का पुनर्पाठ करने वाले पुरोधा हैं । आवश्यकता इस बात की है कि उनके मूल स्वरूप पर पड़े आवरण को हटाकर अपनी परंपरा,संस्कृति एवं आध्यात्मिक उदात्तता के आलोक में उन्हें देखा और समझा जाय । 

                भारतीय दर्शन, रहस्यवाद, भक्ति और समाज सुधार की कबीर की संकल्पना इसी संस्कृति की थाती रही है । कबीर का विस्तृत मानवतावादी दृष्टिकोण सनातन परंपरा का प्राणतत्व रहा है । सिद्ध संत परंपरा, निर्गुण उपासना की परंपरा,पारमार्थिक प्रेम की परंपरा प्राचीन उपनिषदों, गीता और भागवत में विस्तृत रूप से उल्लेखित है । ईशावास्योपनिषद  के अंतिम चारों मंत्र अव्यक्त निराकार परमात्मा के प्रति प्रार्थनाएँ हैं , जिनमें औपनिशिदिक भक्ति का उत्कृष्ट रूप झलकता है । बुद्ध, महावीर, दयानंद और महात्मा गांधी ने अध्यात्मिकता के अनुरोध से समाज सुधार की जिस संकल्पना को प्रांजल किया, कबीर उसी परंपरा के एक आदर्श, प्रादर्श और प्रतिदर्श हैं । ‘कबीर बड़े कवि वहाँ हैं जहां वे अपने ही अंतर्जगत का वैविध्य संधान करते हैं और उसी से जीवन की विराटता सिखाते हैं ।‘ 

            कबीर का व्यक्तित्व एक सांस्कृतिक व्यक्तित्व है । उन्होने राम को गरीब के लिए सुलभ किया । जीवन के सम्पूर्ण कर्म को पूजा कहा । सर्व समावेशी भारतीय चिंतन को अग्रगामी बनाते हुए कबीर ने वैष्णव,शैव,हिन्दू,इस्लाम,ईसाई सब के तत्व को घोल कर प्रेम का ढाई आखर बना दिया । कबीर को सिर्फ असहमति एवं विद्रोह का कवि कहना, उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा करके आँकने जैसा है । कबीर मनुष्य की आस्था, क्षमता और विश्वास को मजबूत करते हुए गौतम बुद्ध की तरह कहते हैं कि – अपना दीपक स्वयं बनों । कबीर के आत्मविश्वास का श्रोत उनकी विरल आध्यात्मिकता या भक्ति है । कबीर का मुक्तिमार्ग प्रेम की विस्तृत और विराट भाव भूमि पर टिका हुआ है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने स्पष्ट लिखा है कि – “उन्होने भारतीय ब्राम्ह्वाद के साथ सूफियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठ योगियों के साधनात्मक रहस्यवाद और वैष्णव के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद का मेल करके अपना पंथ खड़ा किया ।’’ निराकार ईश्वर की संकल्पना के लिए कबीर ने भारतीय वेदांत का ही सिरा पकड़ा । अव्यक्त ब्रह्म की जिज्ञासा और व्यक्त सगुण ईश्वर या भगवान के सानिध्य की अभिलाषा मूल रूप से भारतीय पद्धति ही रही है । 

       कबीर गुरु की सनातन परंपरा को स्वीकार करते हैं । वे तो गुरु गोविंद को एक बताते हैं । अपने सतगुरु से ही कबीर को राम नाम का मंत्र मिलता है । इसके बदले वे गुरुदक्षिणा देना चाहते हैं लेकिन यह आकांक्षा कबीर के मन में ही रह गयी । कबीर का यह पद इसकी पुष्टि करता है – 

                                कबीर राम नाम के पटंतरे , देवे कों कछु नाहिं

                                 क्या ले गुरु संतोषिए , हौंस रही मन मांहि । । 


कबीर के पदों में औपनिषदिक अद्वैतवाद की अनुगूँज है । कबीर इसकी घोषणा करते हुए स्वयं कहते हैं कि-                      आतमलीन अखंडित रामा । कहै कबीर हरि माहि समाना ।। 

ठेठ भारतीय मर्यादा के अनुसार वे प्रभु को अपना पति मानते हैं और अपने को सती (पत्नी) । कबीर की कथन भंगिमा भी भारतीय परंपरा से जुड़ी हुई है । रचना शैली दोहा और पद उन्हें अपभ्रंश साहित्य से मिला । रमैनी भी पद्धड़ियाबंध का विकसित रूप है । अतः कबीर को अपनी ज्ञान परंपरा के आलोक में देखना ही उन्हें समग्रता में देखना होगा । कबीर को हमें जडताओं में नहीं अपनी जड़ों में तलाशना होगा ।

Swami Vivekanand