Wednesday, 20 May 2026

हिन्दी : पक्ष – प्रतिपक्ष

 

          हिंदी के पक्ष में जिस भावुकता के साथ तर्क रखे जाते हैं उन्होंने हिंदी का कोई भला नहीं किया अपितु नुकसान ही अधिक हुआ । हिंदी की पक्षधरता में ही व्यापक दोष रहा है । आजादी के बाद भाषाई आधार पर राज्यों के निर्धारण के बाद भी अगर कोई देशज / क्षेत्रीय भाषाओं के वर्चस्व को नहीं समझ पा रहा है तो निश्चित ही यह विचार उसे निष्पक्षता से आकलन नहीं करने देगा । इस देश की संरचना ही बहुवचनात्मक है । इस संरचना के बीच अगर किसी एक भाषा को व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता दिलानी है तो वह इन तमाम भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय और आदान - प्रदान की व्यापक श्रृंखला के माध्यम से ही हो सकता है । क्योंकि जिस भाषा को भी आप "राष्ट्र भाषा" का ताज देना चाहते हैं, उस भाषा का प्राण तत्व इन्हीं भारतीय भाषाओं में निहित होना चाहिए । अगर ऐसा नहीं हुआ तो विरोध,संघर्ष और अस्मिता मूलक विचारधाराओं के बोझ के नीचे "राष्ट्र भाषा" का सपना टूट या बिखर जायेगा । शायद आज तक यही हुआ भी । बावजूद इसके कि आप के पास वो सारे आंकड़े हैं जो ये बताते हैं कि हिंदी विश्व में सबसे अधिक बोली जानेवाली भाषा है, यह विश्व के सैकड़ों विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है इत्यादि ।

          इन आकड़ों की बाजीगरी के साथ हिंदी की श्रेष्ठता को लेकर चर्चा करते हुए हम फ़िर एक बहुत बड़ी गलती करते हैं । हिंदी के श्रेष्ठ या अधिक व्यापक हो जाने से अन्य भारतीय भाषाओं का महत्व कम नहीं हो जाता, इस बात को हम भूल जाते हैं । लेकिन अपरोक्ष रूप से हम उन्हें कमतर आंकने लगते हैं और फ़िर तुलना की नई बहस शुरू हो जाती है । तमिल जैसी प्राचीन और समृद्ध भाषा को अपनी तुलना ही करवानी होगी तो वह संस्कृति से एक बार करवा भी ले, हिंदी से क्यों करवाए ? ऐसी ही तमाम बातें अन्य भारतीय भाषाओं के साथ भी हैं ।

         ख़ुद हिंदी पट्टी में हिंदी की सहायक कई भाषाओं ने इधर अपने तेवर कड़े कर लिए तो हम यह तर्क देने लगे कि बोलियां भाषा होने का स्वप्न देख रही हैं । अब ऐसी बातों से संघर्ष की स्थिति बन गई । भोजपुरी, राजस्थानी इत्यादि इसका उदाहरण है । फ़िर हमारा तर्क भी कितना अपमानजनक है । जिन्हें आप सिर्फ़ बोली समझने या मानने की भूल कर रहे हैं उनकी व्याप्ति विश्व की कई भाषाओं से बड़ी है । इसलिए हमें ऐसे तर्कों से बचना चाहिए । भोजपुरी को लेकर तो स्वर अधिक ही मुखर है ।

          दूसरी गलती हम यह करते हैं कि अंग्रेजी को अपना दुश्मन सिद्ध करने में लग जाते हैं जबकि उसी अंग्रेजी को भारतीय संविधान ने 343(1) के तहत आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया हुआ है । अंडमान, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, गोवा, मेघालय, मिज़ोरम और नागालैंड जैसे प्रदेशों की अंग्रेजी एकमात्र आधिकारिक भाषा है ।1 सह आधिकारिक भाषा तो कई राज्यों की है । हमारा संविधान इसी अंग्रेजी भाषा में लिखा गया । उच्च शिक्षा और शोध के तमाम कार्य अंग्रेजी में हो रहे हैं । सच कहूँ तो भारत के पिछले 700-800 वर्षों के इतिहास पर नज़र डालें तो सबसे अधिक “व्याप्ति, रोज़गार और पसंद” की भाषा के रूप में अंग्रेजी का कोई मुक़ाबला ही नहीं है ।  लगभग 600 वर्षों तक राज़ करने वाली फ़ारसी भी नहीं ।

          डॉ. रामविलास शर्मा जी लिखते हैं कि,’’इस दास्ता में भी हमने अंग्रेजी को क्यों नहीं अपनाया ? इसलिए कि हमारी भाषा हमारी राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक है ।’’2 रामविलास जी बड़े आलोचक हैं,लेकिन क्या वे नहीं जानते कि हमने अंग्रेजी को बड़ी शिद्दत के साथ अपनाया ? रोज़गार एवं उच्च शिक्षा की भाषा के रूप में अपनाया । विश्व के ज्ञान से जोडनेवाली एक व्यापक भाषा के रूप में अपनाया । इसी अंग्रेजी भाषा में उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद भारत लौटे डॉ. आंबेडकर और महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश साम्राज्य की ईंट से ईंट बजा दी । अंग्रेजी सीखने वाले कैसे राष्ट्रनिष्ठ नहीं थे यह समझ में नहीं आता । जहां तक प्रश्न राष्ट्रीय चेतना का है तो इस संदर्भ में 1951 में गठित राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट में साफ़ लिखा गया है कि,”यह सत्य है कि अंग्रेजी भाषा देश की एकता के उत्थान में एक महत्वपूर्ण तथ्य रही है । दरअसल, राष्ट्रीयता की संकल्पना तथा राष्ट्रीयता की भावना मुख्य रूप से भारत में अंग्रेजी भाषा तथा साहित्य के उपहार हैं ।’’3

 

         भारत में आज़ादी के बाद भाषा के रूप में अंग्रेजी का व्यापक प्रसार हुआ । यह आधुनिक ज्ञान – विज्ञान, तकनीक, शोध और उच्च शिक्षा की प्रमुख भाषा के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हुई । भारतीय भाषाओं के बीच आपसी वर्चस्व और विरोध की क्षेत्रीय राजनीति ने अंग्रेजी की राह को अधिक सुगम बनाया । “रोज़गार के अवसर वाली भाषा” के रूप में अंग्रेजी के मुक़ाबले कोई भाषा खड़ी ही नहीं हो पाई । इस तरह हिन्दी समेत तमाम भारतीय भाषाओं का जो नुकसान हुआ उसके लिए हमारी वैचारिक संकीर्णता और राजनीतिक अकर्मण्यता ही जिम्मेदार है न कि अंग्रेजी ।

 

         संपर्क भाषा के रूप में हिंदी भी लगातार विकसित हुई । हिंदी पट्टी में तो इसका विस्तार सबसे अधिक है । देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी हिंदी है । किंतु हिंदी इस देश में “अवसर और प्रभाव” की भाषा उस तरह नहीं बन सकी जैसे अंग्रेजी बनी । इस देश के राजनेताओं और हिंदी सेवा के नाम पर मलाई काट रहे मठाधीसों ने हिंदी के नाम पर सिर्फ भावनाएं भड़काईं तथा खाये, पीये और अघाये साँप की तरह कुण्डली मारकर बैठे रहे । आज़ भी वे यही कर रहे हैं । अपनी अकर्मण्यता छिपाने के लिये वो सारा ठीकरा अंग्रेजी पर फोड़ देते हैं । अंग्रेजी को चार गलियाँ देते हुए हिंदी को लेकर बड़ी-बड़ी भावुकतापूर्ण बात करना मानों हिंदी दिवस का राष्ट्रीय फ़ैशन हो गया है । आप तर्क और तथ्यों के साथ इनकी कलई खोलो तो आप देशद्रोही तक बना दिये जाओगे । राष्ट्र भक्ति / राष्ट्र द्रोही  का प्रमाण पत्र तो जैसे ये अपनी जेब में लेकर टहलते हैं । केंद्र सरकार द्वारा संचालित देश भर के केंद्रीय विद्यालयों में हिंदी और सामाजिक अध्ययन को छोडकर बाक़ी सभी विषय अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाये जाते हैं ।4

 

                    बीसवीं शती की शुरुआत तक अनुमानतः इस देश में एक करोड़ के आस-पास की आबादी अंग्रेजी में शिक्षित थी । इसका कारण यह था कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार और प्रशासन का जो ढाँचा विकसित किया वह इस देश के लिए एकदम नया और संभावनाओं से  भरा हुआ था । अनुवादक, द्विभाषिये, मुंशी, डाक़कर्मी, सिपाही, वकील, शिक्षक, क्लर्क, रेल कर्मचारी, कारखानों के मज़दूर, प्रेस के कारीगर, फोटोग्राफी, सिनेमा, संपादक, लेखक, वितरक, दलाल, बैंक कर्मचारी, चिकित्सक इत्यादि को लेकर एक सुनियोजित संगठनात्मक ढाँचा जो अंग्रेज़ खड़ा कर रहे थे उसमें भारतीय युवाओं को अपना भविष्य नज़र आ रहा था । वो इन अवसरों का लाभ उठाते हुए अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर करना चाहते थे । इसलिए उन्होने अंग्रेजी भाषा में रुचि दिखाई और उसे अपनाया । अंग्रेजी को अपनाने के पीछे उनके अंदर कोई राष्ट्रद्रोह की भावना काम नहीं कर रही थी ।

 

                    जहाँ तक अंग्रेजी को भारतीयों पर धोपने का आरोप है इस संदर्भ में मैं यह कहना चाहूँगा कि 26 जनवरी 1835 को अंग्रेजों ने यह नीति स्पष्ट कर दी कि तकनीकी और चिकित्सा क्षेत्र की शिक्षा सिर्फ़ और सिर्फ़ अंग्रेजी में ही दी जायेगी । इस नीति के पीछे  एक महत्वपूर्ण कारक राजाराम मोहनराय जैसे विचारकों की अंग्रेजी शिक्षा के हक में मांग भी थी । लेकिन ये वही अंग्रेज़ ही थे जो 1835 के पहले स्थानीय भाषाओं में ऐसी शिक्षा के हिमायती थे और उसे प्रोत्साहन भी दे रहे थे । 1783 के आस-पास उन्होने उच्च न्यायालय से फ़ारसी को हटाकर वह जगह अंग्रेजी को दे दी । यह काम उन्होने / ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में आते ही नहीं किया अपितु यह करने के लिए उन्होने लगभग दो शताब्दियों का इंतजार किया ।

 

                 इन दो शताब्दियों में उन्होने आधुनिक भारतीय भाषाओं को अपने प्रक्षेत्रों में प्रोत्साहित किया । जैसे-जैसे उनके व्यापार/शासन का क्षेत्र बढ़ता गया उन्होने हिंदुस्तानी और अंग्रेजी को अधिक प्रोत्साहित किया । यह प्रोत्साहन उन्होने भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान या प्रेम में नहीं अपितु अपनी प्रशासनिक एवं व्यावसायिक मजबूरियों के नाते दिया । ठीक वैसे ही जैसे भारतीय अवसरों की तलाश में अंग्रेजी को अपना रहे थे । यह पूरा मामला आर्थिक समृद्धि और शक्ति का था जिसमें भाषा एक साधन मात्र थी । अंग्रेजों को जब यह लगने लगा कि शासन- प्रशासन के कार्यों को अब अंग्रेजी के ही बूते चलाया जा सकता है तो उन्होने उस दिशा में कदम उठाये । वैसे भी 1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सारे अधिकार खत्म करते हुए भारत की बागडोर सीधे अपने हांथ में ले चुकी थी ।

 

           अंग्रेज़ अब सीधे-सीधे शासक बन गये थे । फ़िर अंग्रेजी का भारत में कोई व्यापकeee    

 

 विरोध भी नहीं था अपितु भारतीयों द्वारा समर्थन के स्वर अधिक मुखर थे । विष्णू शास्त्री चिपलूंकर जैसे विद्वानों ने अंग्रेजी को “शेरनी का दूध” कहकर संबोधित किया ।  अनुमानतः 1882 तक देश के 60% विद्यालयों में किसी न किसी रूप में अंग्रेजी की शिक्षा दी जा रही थी । इन तमाम बातों के परिप्रेक्ष्य में यह अधिक तर्क संगत लगता है कि भाषा के रूप में अंग्रेजी को अंग्रेजों ने अपनी व्यवस्थित नीतियों द्वारा इतना संभावनापूर्ण बनाया कि इसके समर्थन में एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग खड़ा हो गया । विरोध का स्वर उस तुलना में क्षीण था । अतः व्यापारी और शासक के रूप में उनके हितों को कोई नुकसान नहीं पहुँच रहा था । ऐसे अवसर का एक चतुर शासक के रूप में निश्चित तौर पर उन्होने लाभ उठाया ।   

 

         किसी दूसरे की लकीर को छोटी करके हम अपनी लकीर बड़ी नहीं कर सकते । अपनी लकीर को बड़ी करने के लिये दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति का होना बड़ा आवश्यक है । हाल ही में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की अनिवार्यता को जिस तरह से स्वीकार किया गया है उससे लगता है कि बदलाव की सकारात्मक स्थितियाँ बनेंगी । इस तरह की पहल का स्वागत होना चाहिये । हिंदी को अगर सही अर्थों में राष्ट्रभाषा बनना है तो उसे इन्हीं आधुनिक भारतीय भाषाओं के बीच अपने प्राण तत्वों को सिंचित करना होगा । इन भाषाओं के साथ आदान-प्रदान की व्यापक शृंखला की शुरुआत करनी होगी । “भारतीय भाषा और संस्कृति विश्वविद्यालय” जैसी कोई नई शृंखला बड़े स्तर पर शुरू करनी होगी ।

 

           किसी भी भारतीय भाषा में परास्नातक की उपाधि लेने वाले के लिये यह अनिवार्य हो कि वह उस भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भारतीय भाषा में भी लिखने और बोलने का विधिवत ज्ञान हासिल करे । क्षेत्रीय नौकरियों में डोमेसाइल की अनिवार्यता की जगह उस क्षेत्र विशेष की भाषा में स्नातक या परास्नातक वाले आवेदकों को वरीयता दी जाये । कहने का तात्पर्य यह है कि भाषिक स्तर पर आदान-प्रदान की संभावनाओं को अधिक से अधिक प्रोत्साहन देना । जब तक भारतीय भाषाओं को “अवसर की भाषा” के रूप में प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी तब तक “इच्छित भाषा” के रूप में उनकी लोकप्रियता नहीं बढ़ेगी । किसी भाषा विशेष के विरोध से तो बिलकुल भी नहीं ।

         निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी के साथ जो सपने सँजोये गये हैं वे बिलकुल पूरे किये जा सकते हैं लेकिन उसके लिये चरणबद्ध तरीके से ढाँचागत संरचना पर कार्य करना होगा । कुछ बुनियादी बातों का विशेष खयाल रखना होगा । जैसे कि –

1. अंग्रेजी सहित विश्व की किसी भी भाषा के प्रति दुराग्रह उचित नहीं । यह हमारी सोच को संकीर्ण करेगा ।

2. भारतीय भाषाओं को समान स्तर पर आदर और सम्मान देना, हिंदी के विकासात्मक भविष्य के लिये अनिवार्य है ।

3. हिंदी और समस्त भारतीय भाषाओं / बोलियों के बीच व्यापक और सतत आदान-प्रदान की आवश्यकता है ।

4. यह आदान-प्रदान किसी प्रकल्प की तरह समितियों या अकादमियों के सीमित व्यक्तियों के बीच में नहीं बल्कि जीवन शैली और दैनिक व्यवहार के बीच शामिल हो ।

5. भारतीय भाषा और संस्कृति के व्यापक अध्ययन और अंतर्विषयी शोध कार्यों के लिये सैकड़ों शैक्षणिक संस्थाओं का गठन IIT की तरह चरण बद्ध तरीके से हो ।

6. हिंदी पट्टी के छात्रों को दक्षिण भारतीय और दक्षिण के छात्रों को हिंदी पट्टी की भाषा को पढ़ने हेतु प्रोत्साहित किया जाय ।

7. अधिक से अधिक भारतीय भाषाओं के ज्ञान पर नौकरी में विशेष भत्ते की योजना रहे । इन्हें नौकरी और पदोन्नति में विशेष वरियता भी मिले ।

8. भारतीय भाषाओं में सभी प्रकार की उच्च शिक्षा सहज रूप से सुलभ हो सके इस पर गंभीरता पूर्वक कार्य होना चाहिये ।

9. हमें हिंदी विरोध के प्रतिउत्तर में किसी भाषा का विरोध नहीं करना है अपितु उस विरोध के कारणों के समूल नाश के लिये कार्य करना होगा ।

10.          हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं को “आर्थिक प्रगति और रोज़गार के व्यापक अवसर वाली भाषा” के रूप में बदलना होगा ।

                      इन सभी बातों के लिये दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का होना बहुत ज़रूरी है । हम एक लोकतांत्रिक देश हैं, सभी की भावनाओं का ख्याल रखना ज़रूरी है । इसलिए तमाम वाद – विवादों के बीच संवादों के माध्यम से धैर्य और दृढ़ता पूर्वक आगे बढ़ना होगा । भारतीय भाषाओं को जिद्दी नहीं ज़मीनी होते हुए नाम से अधिक काम के बारे में सोचना होगा । जिस भाषा के पास जितना अधिक काम / रोजगार का अवसर होगा उतना ही उसका नाम होगा । अन्यथा कौन सी भाषा का अख़बार अधिक छपता है और किस भाषा को बोलने वाले लोग कितने अधिक हैं, ऐसे आकड़ों के साथ हम आत्ममुग्ध होकर अपने आप को सिर्फ़ छलते रह जायेंगे ।

 

 

 डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

सहायक प्राध्यापक , हिन्दी विभाग

के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय

कल्याण – पश्चिम , महाराष्ट्र 

 

संदर्भ :

1.       भारत में विदेशी लोग एवं विदेशी भाषाएँ, समाजभाषा – वैज्ञानिक इतिहास – श्रीश चौधरी, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2108 । पृष्ठ संख्या – 419 ।

2.       भारत की भाषा समस्या – रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, सातवाँ संस्करण-2017 । पृष्ठ संख्या – 24

3.       राधाकृष्णन समिति रिपोर्ट ( 1951 : 316 ) नई दिल्ली, भारत सरकार प्रकाशन विभाग ।

4.       भारत में विदेशी लोग एवं विदेशी भाषाएँ, समाजभाषा – वैज्ञानिक इतिहास – श्रीश चौधरी, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, प्रथम संस्करण -2108 । पृष्ठ संख्या – 421 ।

 

Friday, 8 May 2026

जाता हुआ साल

 


जाता हुआ साल

किसी पुराने कैलेंडर की तरह

दीवार से उतर रहा है

और कीलों पर

हमारी उम्मीदें टँगी रह जाती हैं।


 नया वर्ष

आ गया है पर तुम मेंरे

गए नहीं 

पर मिट्टी अब भी

बीजों की नींद सँभाले हुए है

कुछ प्रश्न

उत्तर बनने से पहले

आदत बन गए—

जैसे शाम की थकान,

जिसे हम

नाम नहीं देते।

धीरे से आदतें बदलीं—

यही उसका सबसे

गहरा हस्तक्षेप था।


Dr Manish Kumar Mishra 


Friday, 1 May 2026

प्रेम और संवेदना के जैविक कवि : मनीष

 


 

प्रेम और संवेदना के जैविक कवि : मनीष

डॉ. चमन लाल शर्मा

प्रोफेसर 'हिन्‍दी'

शासकीय कला एवं विज्ञान स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय, रतलाम

(विक्रम विश्‍वविद्यालय, उज्‍जैन) मध्‍य प्रदेश


 

            आजकल कविता में जो कुछ लिखा जा रहा है वह सब समकालीन है, यह पूरी तरह सच नहीं है। दरअसल समकालीनता एक रचना दृष्टि है, जहां कवि अपने समय का आकलन करता है, अपने अनुभव, अपने चिंतन और अपनी दृष्टि से वह कविता में जीवन का नया विन्यास गढ़ता है। कवि होने के अपने खतरे भी हैं, अपनी चुनौतियां भी हैं, क्योंकि कई बार कविता में  वैयक्तिकता हावी हो जाने की संभावना बनी रहती है। यकीनन कविता का आशय या उद्देश्य इतना भर नहीं है कि समाज में जो कुछ भी घटित हो रहा है या जैसा दिखाई दे रहा है उसे ज्यों का त्यों लिखकर प्रस्तुत कर दिया जाय, इससे कविता के खत्म होने का खतरा बढ़ जाता है। एक कविता पाठक को कई अर्थ देती है। कविता एक वैचारिक फलक के साथ-साथ एक कला रूप भी है, इसलिए कविता में भाषा, भाव और शैली का एक संतुलन भी जरूरी है। इधर नई पीढ़ी के  जो रचनाकार कविता लेखन में सक्रिय हैं उनमें मनीष मिश्र का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है, उनकी कविताओं में वैचारिकता की सपाट बयानी की मजबूरी नहीं है, नाही चिल्लाकर अपनी बात को दूर तक फैलाने की जुगत है। मनीष संवेदनाओं की शक्ल में कविता के माध्यम से पाठकों से सीधे संवाद करते हुए दिखाई देते हैं। छप्‍पन कविताओं वाले उनके पहले काव्य संग्रह 'अक्टूबर उस साल' की पहली कविता 'आत्मीयता' में वे सीधे पाठक से बात कर रहे हैं - 'क्षमा की शक्ति / और / विवेक का आराधन / यह अनुभव की / साधना से / संचित / शक्तिपीठ है / आत्मीयता से भरे / आत्मीय मित्रो /

सवागत है / आपका /'  

                जिन पाठकों ने मनीष की कविताओं को ठीक से पढ़ा होगा उनको मालूम होगा कि मनीष की कविताएं कला की सीमाओं से परे जाकर भी पाठक के मन को झकझोरती हैं और मन के अंदर एक उत्प्रेरण  के भाव को जन्म देती हैं। मनीष की कविताओं का अलहदापन  संवेदना, भाव, विचार, दर्शन एवं भाषा के स्तर पर ही नहीं है बल्कि उनकी शैली में भी नवीनता है। बिंबों और प्रतीकों से कैसे यथार्थ को लिबास पहनाकर वे अपनी कविता रचते हैं, यह वस्तुतः मनीष की अपनी शैली है-  'जब तुम्हें लिखता हूँ / तो जतन से लिखता हूँ / हर शब्द को चखकर लिखता हूँ / जब तुम्हें लिखता हूँ / तो बसंत लिखता हूँ / होली के रंग में / तुम्हें रंग कर लिखता हूँ / 'जब तुम्हें देखता हूँ' कविता की इन पंक्तियों में मनीष न केवल गहरी संवेदना को कविता के केन्‍द्र में रखते हैं बल्कि कविता को शब्‍दों की जुगाली से मुक्‍त कर जीवनानुभव से भी जोड़ते हैं। आजकल जीवन के रिश्तों में भी बाजारवाद हावी होता दिखाई दे रहा है। फलतः मनुष्य के बीच सम्बन्धों की ऊष्मा भाप बनकर खत्म होती जा रही है। मनीष की कविताएं रिश्तों के उधड़ने-बुनने की कविताएं हैं। मनुष्य के दोहरे चरित्र को उजागर करती उनकी कविताएं सच को मरते नहीं देखना चाहतीं। मनीष कभी नितान्त निजी अनुभवों की कविताई करते प्रतीत होते हैं तो कभी कठोर व्यंग्य से सामाजिक यथार्थ को उघाड़ते हुए दिखाई देते हैं। जीवन की आपाधापी के बीच मनुष्य अपने मन के भीतर कहीं कमजोर भी है, भविष्य को लेकर चिंतित भी है, घबराया हुआ भी है और रिश्तों को निभाने की उसके अंदर  अकुलआहट भी है, पर आधुनिक जीवन शैली को अपनाने की होड़ में और आगे बढ़ने के दबाव के कारण उसे रिश्ते दरकते हुए दिखाई देते हैं। ऐसे में मनीष रिश्तों की गरमाहट को महसूस करते हुए कहते हैं - 'जीवन की जटिलताओं / और प्रपंचों से दूर / अपनी सहजता / और संवेदना के साथ / तुम जब भी मिलती हो / भर देती हो / तृप्ति का भाव / तुम जब भी मिलती हो / तो मिलता है / विश्वास / सौभाग्य / और / जीवन के लिए / ऊष्मा, ऊर्जा और संकल्प भी /'

           

 

युवा कवि मनीष न किसी वाद के  चौखट्टे में फिट बैठने के लिए लिखते हैं, और ना ही किसी विचारधारा के साथ सामंजस्य बैठाने की उठापटक के लिए कविताई करते हैं, बल्कि वे आत्म चेतना के स्तर पर पाठक को टहलाते  हुए वहां ले जाना चाहते हैं, जहां सीखने और टकराने दोनों की जरूरत है। वस्‍तुत: तिमिर के शिकंजे में रमणीयतम लावण्य है मनीष की कविताई। स्त्री-पुरुष के संबंधों के व्याकरण से उनकी कविताएं जीवन के मायनों को तलाशती हुई दिखाई देती हैं -   'और तुम / वन लताओं सी / कुम्‍हलाती / अपनी दिव्य आभा के साथ / घुलती हो चंद्रमा में / ज्योति के कलश में / आरती की गूंज में / और देती हो मुझे / नक्षत्रों के लबादे में / अनुराग का व्याकरण /  आचरण के शुभ रंग / तथा / त्याग के / आत्मीय प्रतीक चिन्ह /'  'प्रतीक्षा की स्थापत्य कला' कविता में मनीष जीवन में अनुराग के व्याकरण को अनिवार्य मानते हैं। अनुराग के बिना जीवन लगभग व्‍यर्थ है। संभावनाओं के कवि मनीष अपने पहले कविता संग्रह 'अक्टूबर उस साल' में अनुभूति,  जीवनानुभूति और कलात्मक अनुभूति का बेहद जरूरी संयोजन कर अपनी उत्पाद्य प्रतिभा का परिचय दे देते हैं। कवि और कविता के लिए महत्वपूर्ण है अनुभव, जिसे सामाजिक व्यवहार से अर्जित किया जा सकता है। यह अनुभव ही काव्य में संवेदना बनकर पाठक तक पहुंचता है। 'गंभीर चिंताओं की परिधि' कविता में युवा कवि मनीष आज के तथाकथित विमर्शों पर प्रासंगिक टिप्पणी करते हैं - 'अप्रासंगिक होना / उसके हिस्से की / सबसे बड़ी त्रासदी है / तकलीफ और विपन्नता / से क्षत-विक्षत / उसकी उत्सुक आंखें / दरअसल / यातना की भाषा में लिखा / चुप्पी का महाकाव्य है /'    दरअसल यह भाड़े पर या उधार ली हुई संवेदना नहीं है, बल्कि अनुभव से अर्जित की हुई है। 'यूं तो संकीर्णताओं को' कविता में कवि एक और जहां अपनी परम्‍परा और संस्‍कृति की जड़ों से उखड़े लोगों की मज़म्मत करते हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनीति के चरित्र को बेनकाब करने में युवा कवि ने जरा भी संकोच नहीं किया है, बल्कि तल्ख लहजे में सियासतदानों की असलियत को बड़ी बेवाकी से पाठकों के सामने रखने की ईमानदार कोशिश की है, और नेताओं के भाषणों से सम्मोहित जनता की यथास्थिति वादी सोच पर चिंता प्रकट की है। दरअसल मनीष की कविता छीजती मनुष्‍यता के बीच आशा का एक सुन्‍दर विहान है। सामाजिक सन्‍दर्भों को तलाशती मनीष की कविता मेहनतकशों और मजदूरों के पक्ष में खड़ी हुई दिखाई देती है। कार्पोरेट कल्‍चर में जहां मजदूरों की चिंता करने वाला कोई नहीं है, ऐसी स्थिति में मनीष पक्षधरता के साथ मजदूरों के सवालों को उठाते हैं - 'उन मजदूरों के / हिस्से में / क्यों कुछ भी नहीं /   जो मेहनत से / एक धरा और गगन कर रहे हैं /'

            कविता को सफल बनाने के लिए कवि का ईमानदार होना अत्यंत आवश्यक है। वह विषय स्थिति को स्पष्ट करने के लिए अपनी निजी अनुभूतियों का इस्तेमाल करता है। मनीष की कविताओं से गुजरते हुए यह आभास सहज ही हो जाता है। जब सामयिक सामाजिक परिस्थितियां जीवन में इतनी अधिक प्रभावी हो जाएं कि समय का एक पल भी भारी लगने लगे, कविताएं वहीं से आकार लेना शुरू करती हैं। कवि की आवश्यकता समय और समाज को वहीं से अधिक महसूस होने लगती है। मां पर लिखी कविता में मनीष मां के उस शाश्वत रूप के दर्शन कराते हैं जो हर पाठक को अपना सा लगता है। दरअसल कविता की खासियत ही यह है कि वह कवि की होती हुई भी सबकी हो। हर पाठक को वह अपनी ही रचना लगे।  नई पीढ़ी के कवियों में मनीष अलग विशेषता बनाए हुए हैं। उनकी कविता सकारात्मक मूल्यों के साथ ही मनुष्य को समग्रता में आत्मसात कर चलती है। उनकी कविताओं में जहां एक ओर सकारात्मक हस्तक्षेप का स्वर है, वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों की संवेदना भी है, जिससे पाठक के ज्ञान के क्षितिज का विस्तार होता है। मैं बहुत प्रामाणिकता के साथ कह सकता हूं कि मनीष की कविताएं इंसानियत की रक्षा के लिए एक संवेदनशील धरातल तैयार करती हैं, जिसमें प्राकृतिक उपादानों को भी वे शामिल करते हैं -  'प्रेम से अभिभूत / ममता से भरी / वह गीली चिड़िया / शीशम की टहनियों के बीच / उस घोंसले तक /  पहुंचती है / जहां / प्रतीक्षा में है / एक बच्चा / मां के लिए / भूख / अन्न के लिए / और प्राण / जीवन के लिए /'

             मनीष की कविताओं में  वायवीय भावों, विचारों एवं कल्पनाओं का कौतूहल नहीं है, बल्कि वे जीवन के टूटे- विखरे पलों को भी आत्मीय बनाकर कविता में अपनी विनम्र उपस्थिति दर्ज करा देते हैं। उनके यहां निषेधवादियों की तरह सब चीजों का नकार नहीं है, बल्कि वे सृजनात्मक बीजों की तलाश कर अपने परिवेश के उहा-पोह को भी सहजता के साथ मानवीय संदर्भों से जोड़ देते हैं। वह भरोसे की ऊष्मा और संबंधों के ताप से हर हाल में मनुष्य होने की संभावनाओं को बचाना चाहते हैं - 'मैं / बचाना चाहता हूं / दरकता हुआ / टूटता हुआ / वह सब / जो बचा सकूंगा /  किसी भी कीमत पर /'

             इस संकलन की अधिकांश कविताएं मानवीय रिश्तों, स्त्री-पुरुष के संबंधों और प्रेम पूर्ण संवेदनाओं के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। कविता के बारे में कोई भी संतुलित निर्णय तभी दिया जा सकता है जब हम भाषा, कथ्य और संदर्भ को एक साथ प्रस्तुत करें। भाषा के तत्वों द्वारा ही हम कविता में उपस्थित कवि के अनुभव की सही व्याख्या कर सकते हैं। आजकल की कविताओं की एक सीमा यह भी है कि अक्सर पुराने अनुभवों को दोहराकर सुविधाजनक ढंग से कविता बना ली जाती है। इससे नया अर्थलोक पैदा होने की संभावनाएं भी कम हो जाती हैं।  मनीष की कविताओं की भाषा में नया रंग भरता है। कविता में भाषा के अभिनव प्रयोग का अर्थ यह नहीं है कि बिल्कुल अलग दिखाई देने वाली भाषा का उपयोग किया जाए या जबरदस्ती शब्द ठूंसकर नवीनता का बोध कराया जाए। दरअसल कोई एक शब्द भी कविता को नए भावान्‍वेषण की ओर ले जा सकता है, बशर्ते कवि को उस शब्द के परिप्रेक्ष्य का भान हो और वह उसे सर्जनात्मक रूप देने मे समर्थ हो।  मनीष के इस पहले कविता संग्रह में भाषा बोध के स्तर को बनाए रखने में समर्थ दिखाई देती है।

            2019 में प्रकाशित मनीष का दूसरा कविता संग्रह 'इस बार तेरे शहर में' में कुल साठ  कविताएं हैं,  और इसकी भूमिका हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार रामदरश मिश्र जी ने लिखी है। इस संग्रह की अधिकांश कविताएं प्रेम की द्वन्‍द्वात्मक संवेदनाओं के बीच उभरी हैं, लेकिन कवि की युवा वाणी यहां कविता की सोद्देश्‍यता पर स्पष्ट अभिमत प्रस्तुत करती है -  मुठ्ठियां जहां / बंध दी गई हों   /  शोषण के खिलाफ / वहां रूंधे गले को / वाणी देते हुए / उपस्थित हों /  मेरी भी / कविताओं के शब्द /' मनीष का कवि हृदय युगों से चली आ रही पुरुष की सामंतवादी सोच पर सवाल खड़े करता है, तथा स्त्री को रचना का प्रेरणा स्रोत,  सूर्य की ऊष्मा,  ऊर्जा का उद्गम, जीवन का हर्ष और उल्लास का निर्द्वंद सर्जक मानता है -  'तुम औरत हो / और / और होकर औरत ही / तुम कर सकती हो / वह सब / जिनके होने से ही /  होने का कुछ अर्थ है / अन्यथा / जो भी है / सब का सब / व्यर्थ है/'  छद्म राष्ट्रवाद पर प्रहार करते हुए कवि मनीष कविता में व्यंग्य को नए स्तर पर ले जाते हुए कहते हैं -  'यहां अब देश नहीं / प्रादेशिकता महत्वपूर्ण होने लगी है / प्रादेशिक भाषा में / गाली देने से ही / हम अपने सम्मान की / रक्षा कर पाते हैं / पराये नहीं / अपने समझे जाते हैं / '

            बिगड़ते पर्यावरण की चिंता भी उनकी रचना के मूल में है।  हम अपने आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं? इसकी बानगी देखनी हो तो दिल्ली के बच्चों से पूछें।  किस्तों में मरते हमारे पर्यावरण को बचाने के लिए मनीष कोई बड़ा दर्शन या कोई बड़ा बोझिल तर्क प्रस्‍तुत नहीं करते, बल्कि बहुत ही सादी लिबास की कविता में सीधे दिल को छू लेने वाली बात कह देते हैं - 'इतने दिनों बाद आ रहा हूं / बोलो / तुम्हारे लिए क्या लाऊं? /  उसने कहा / वो मौसम / जो हमारा हो / हमारे लिए हो / और हमारे साथ रहे / हमेशा /'

            मनीष दरअसल परिवेश में बिखरी हुई प्राकृतिक एवं सामाजिक शक्तियों को जगाने में विश्वास करते हैं। इनकी कविताएं वास्‍तव में मानवीय संवेदनाओं की गहनतम अभिव्यक्ति हैं,  तुकबाजी़ और नारेबाजी से मुक्त।  इनकी कविताएं संवेदना से ही रसग्रहण करती हैं। तभी तो  मनीष की चयन दृष्टि अभीष्ट को ग्रहण कर त्याज्य को छोड़ना चाहती हैं - 'नाखूनों को / काटते हुए/  सोचने लगा कि / अनावश्यक और अनचाही / हर बात के लिए / मेरे पास / एक नेल कटर / क्यों नहीं है? /'  वर्तमान जिंदगी में बनावटीपन ज्यादा है। दिखावे की संस्कृति ने व्यक्ति को बहुरूपिया बना दिया है। उसके जीवन में न तो सहजता है और ना सरलता। इसलिए मनीष संबंधों के अनुबंधों से, जन्म-जन्म के वादों से और रीति-नीति के धागों से रिश्तों का ताना-बाना बुनते हुए दिखाई देते हैं। इनकी कविताओं में सामाजिक, राजनीतिक, वैश्विक एवं धार्मिक जीवन के कटु यथार्थ भी हैं।  जन आकांक्षाओं के कवि मनीष की भाषा ढंकी-छुपी राजनीतिक और सामाजिक बुराइयों को उघाड़ कर रख देने में जरा भी संकोच नहीं करती है। इससे मनीष की चेतना की व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं के ऊपर जहां भी खरोच आती है वहीं मनीष मुखर हो जाते हैं - 'राम / तुम्हारा धर्म-दर्शन / संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता में / अपराध हो गया / हे राम ! / हे राम ! ! / अयोध्या / मानो शेष हों / अवशेष सिर्फ / पर यह नि:शेष नहीं/'          मनीष की कविताओं में आस्था, विश्वास एवं आत्म संबल का विस्तार है। श्यामा, वसंता और कस्तूरिका की इस देवभूमि में वे प्रकृति के साथ जीवन का राग गाते हैं। पहाड़ी चिड़ियों, फूलों और पेड़ों को देखना उन्हें ईश्वर को देखने जैसे लगता है। कवि मनीष का अनुभव परिपक्व और दृष्टि संपन्न है। वे अपने परिवेश के प्रति गंभीर और संवेदनशील हैं। परिवेश और प्राकृतिक सौंदर्य इनकी कविताओं को अलग ही पहचान दिलाता है -  'देवदार और  पाम / के यह घने जंगल / मानो लंगर हों / स्वच्छन्ता उत्सुकता और / आकाश धर्मिता के / व्यास रावी चिनाव / सतलुज और कालिंदी के कल कल से / इठलाती बलखाती / सजती और संवरती देवभूमि / सौंदर्य की / विश्राम स्थली है /'         प्रेम का हर एक स्‍तर मूल्यवान होता है। प्रेम का आकर्षण अंतस् चेतना को अनुराग की ऊष्मा से भर देता है - 'उसी का होकर / उसी में खोकर / उसी के साथ / जी लूंगा तब तक / जब तक कि / वह देती रहेगी अपने प्रेम और स्नेह का जल / अपनेपन की / उष्मा के साथ /'  इसी तरह एक अन्य कविता 'उसे जब देखता हूं'  में कवि कहता है - 'उसे जब देखता हूं / तो बस देखता ही रह जाता हूं / उसमें देखता हूं / अपनी आत्मा का विस्तार / अपने सपनों का / सारा आकाश /'

            कंटेंट और भाषा की अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद मनीष की कविताएं अच्छेपन और इंसानियत का एहसास कराती हैं। 'इस बार तेरे शहर में' ऐसा लघु काव्य संग्रह है, जिसकी लगभग सभी कविताएं पठनीय हैं। इन कविताओं में गुंथे गए भाव धीरे-धीरे शब्दों के जरिए पाठक के अंदर उतरते जाते हैं। मनीष वस्तुतः संवेदनाओं के ऐसे जैविक कवि हैं जिनमें मिलावट का नकार और मौलिकता का स्वीकार है। चाहे भाषा के स्तर पर हो या भाव के स्तर पर अथवा कथन की शैली के स्तर पर 'इस बार तेरे शहर में' में संकलित उनकी सभी कविताएं आश्‍वस्‍त करती हैं। इसी संग्रह की 'झरोखा' कविता की इन पंक्तियों के साथ आपको मनीष की काव्य यात्रा पर चलने का निमंत्रण देता हूं - 'कभी / वक्त मिले तो / पढ़ना / झांकना / इन कविताओं को / यह यकीनन / लौटायेंगी / तुम्हारे चेहरे की / वो गुलाबी मुस्कान / मुझे यकीन है /'

हिन्दी : पक्ष – प्रतिपक्ष

            हिं दी के पक्ष में जिस भावुकता के साथ तर्क रखे जाते हैं उन्होंने हिंदी का कोई भला नहीं किया अपितु नुकसान ही अधिक हुआ । हिंदी की ...