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ISB16 कनाडा 2027: हिन्दी, बहुभाषिकता और अनुवाद शोध-पत्रों के लिए प्रस्ताव आमंत्रित

हिन्दी भाषा, बहुभाषिक शिक्षा, अनुवाद, समाजभाषाविज्ञान और प्रवासी भाषाओं पर शोध करने वाले अध्यापकों एवं शोधार्थियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय अवसर उपलब्ध है। कनाडा की University of Saskatchewan द्वारा आयोजित 16th International Symposium on Bilingualism (ISB16) ने व्यक्तिगत शोध-प्रस्तुतियों के लिए प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं। प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तिथि 1 अक्तूबर 2026 है। सम्मेलन का संक्षिप्त परिचय ISB16 का आयोजन 14–18 जून 2027 के दौरान Saskatoon, Saskatchewan, Canada में होगा। सम्मेलन मुख्यतः प्रत्यक्ष रूप में आयोजित किया जाएगा, लेकिन सीमित संख्या में ऑनलाइन प्रस्तुति के अवसर भी उपलब्ध होंगे। आयोजन का केंद्रीय विषय “Languages in Academia and in Communities” है, अर्थात अकादमिक जगत और समुदायों में भाषाओं की भूमिका। सम्मेलन का उद्देश्य द्विभाषिकता और बहुभाषिकता से संबंधित विभिन्न अनुशासनों के शोधकर्ताओं को संवाद और सहयोग का मंच प्रदान करना है। हिन्दी के शोधकर्ताओं के लिए इसकी उपयोगिता यद्यपि यह सम्मेलन केवल हिन्दी पर केंद्रित नहीं है, इसके विषय-क्षेत्र हिन्दी औ...
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स्त्री और कामू : अस्तित्व, देह, मौन और प्रतिरोध का प्रश्न

  स्त्री और कामू : अस्तित्व, देह, मौन और प्रतिरोध का प्रश्न प्रस्तावना बीसवीं शताब्दी के फ्रांसीसी साहित्य में अल्बेर कामू (Albert Camus, 1913–1960) का नाम उन लेखकों और चिंतकों में लिया जाता है जिन्होंने आधुनिक मनुष्य की निरर्थकता, अकेलेपन, स्वतंत्रता, नैतिक दुविधा और विद्रोह को नई दार्शनिक संवेदना प्रदान की। द मिथ ऑफ सिसिफस , द स्ट्रेंजर , द प्लेग , द फॉल , द रिबेल और द फर्स्ट मैन जैसी रचनाओं में कामू मनुष्य और संसार के बीच उपस्थित असंगति को रेखांकित करते हैं। उनके लिए जीवन की “असंगति” अथवा “एब्सर्ड” (Absurd) का जन्म मनुष्य की अर्थ पाने की आकांक्षा और संसार की चुप्पी के टकराव से होता है। कामू का चिंतन सामान्यतः “मनुष्य” के अस्तित्वगत संकट के रूप में पढ़ा गया है, परंतु नारीवादी दृष्टि से यह पूछना आवश्यक है कि उनके साहित्य में जिस मनुष्य की स्वतंत्रता, पीड़ा और विद्रोह की चर्चा होती है, उसमें स्त्री कहाँ उपस्थित है। क्या स्त्री स्वयं एक स्वतंत्र अस्तित्वगत चेतना है अथवा वह पुरुष नायक के प्रेम, कामना, स्मृति और अकेलेपन को अभिव्यक्त करने का माध्यम मात्र बन जाती है? कामू के साहित्य म...

The River as a Cultural Metaphor in Hindi Literature: Myth, Memory, Displacement and Identity

  The River as a Cultural Metaphor in Hindi Literature: Myth, Memory, Displacement and Identity Dr. Manish Kumar C. Mishra Associate Professor, Department of Hindi K. M. Agrawal College, Kalyan (West), Maharashtra, India Former Visiting Professor, ICCR Hindi Chair, Tashkent State University of Oriental Studies, Tashkent, Uzbekistan Abstract Rivers occupy a distinctive position in the cultural imagination of South Asia, functioning simultaneously as geographical realities, sacred entities, repositories of collective memory, and witnesses to migration and social transformation. Hindi literature has repeatedly drawn upon rivers not merely as elements of landscape but as dynamic cultural metaphors through which questions of memory, belonging, displacement, identity, and ecological change are articulated. This paper examines selected representations of rivers in modern Hindi literature, with particular attention to Agyeya, Phanishwarnath Renu, Kedarnath Singh, Bhawani Prasad Mishra and ...