विनोद दास की कविता में रोज़मर्रा का जीवन, सामाजिक असमानता और प्रतिरोध का सौंदर्य वस्तु, देह, स्मृति और नागरिकता का पाठ-केंद्रित अध्ययन डॉ. मनीष कुमार मिश्रा सारांश विनोद दास की कविता साधारण जीवन की वस्तुओं और छोटी घटनाओं के माध्यम से सामाजिक संबंधों की जटिल संरचना को सामने लाती है। तवा, संदूक़, नमक, स्वेटर, साइकिल, बीड़ी, जूते और दफ़्तर की घंटी उनके यहाँ केवल दृश्य को विश्वसनीय बनाने वाली सामग्री नहीं हैं; इनके उपयोग, अभाव, स्वामित्व और अर्थ में मनुष्यों के बीच मौजूद असमानता दिखाई देती है। प्रस्तुत अध्ययन हिन्दवी पर उपलब्ध सत्ताईस कविताओं का निकट पाठ करते हुए यह तर्क विकसित करता है कि इस काव्य-संसार में सामाजिक आलोचना का प्रमुख आधार जीवन को बनाए रखने वाली प्रक्रियाओं और उन्हें बाधित करने वाली शक्तियों का संघर्ष है। भोजन, आवास, शिक्षा, श्रम, प्रेम और स्वास्थ्य इसी संघर्ष के अलग प्रसंग हैं। जातिगत अस्पृश्यता, स्त्री की स्थगित इच्छाएँ, जीविका की विवशता, सार्वजनिक उदासीनता और राष्ट्र की प्रदर्शनकारी धारणाएँ कविता में अनुभव के ठोस रूप ग्रहण करती हैं। अध्ययन में कवि के मानवीय सरोकारों ...
विनोद दास : व्यक्तित्व और कृतित्व साधारण जीवन की संवेदना और आलोचनात्मक विवेक का साहित्य डॉ. मनीष कुमार मिश्रा एसोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण पश्चिम, महाराष्ट्र शोध-सार विनोद दास का साहित्यिक व्यक्तित्व कविता, आलोचना, कथा, संस्मरण, अनुवाद और संपादन के परस्पर संबंधों से निर्मित होता है। उनकी रचनाओं में दैनिक जीवन की वस्तुएँ और घटनाएँ सामाजिक संबंधों की जटिलता को व्यक्त करती हैं। तवा, नमक, बिंदी, कमरा और दफ़्तर की घंटी जैसे परिचित उपादान उनकी कविता में भूख, श्रम, असमानता, स्त्री-अस्मिता तथा सत्ता के व्यवहार को समझने के माध्यम बनते हैं। प्रस्तुत आलेख प्रमाणित लेखक-परिचयों, प्रकाशकीय विवरणों और उपलब्ध मूल रचनाओं के निकट पाठ पर आधारित है। इसका केंद्रीय प्रतिपाद्य है कि विनोद दास की रचनात्मक पहचान साधारण मनुष्य के अनुभवों के प्रति संवेदनशीलता और उन अनुभवों की सामाजिक संरचना को पहचानने वाले आलोचनात्मक विवेक के संयोग में निहित है। उनके व्यक्तित्व का विवेचन साहित्यिक कार्यों और लेखकीय अभिव्यक्तियों तक सीमित रखा गया है; निजी स्वभाव के अप्रमाणित विवरणों से परहेज...