इसतरह तो कुछ, हासिल नहीं होगा
जब मेरे पास,मेरा क़ातिल नहीं होगा ।
डूब कर जाऊँ भी तो, कहाँ जाऊँ
जब जिक्र में, कोई साहिल नहीं होगा ।
जब मेरे पास,मेरा क़ातिल नहीं होगा ।
डूब कर जाऊँ भी तो, कहाँ जाऊँ
जब जिक्र में, कोई साहिल नहीं होगा ।
भारतीय ज्ञान परंपरा में गाली का स्वरूप और महत्व भाषा, लोक-संस्कृति, साहित्य और सामाजिक मनोविज्ञान के संदर्भ में एक अध्ययन डॉ. मनीष कुमार स...