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देखो क्या बनती है नयी कहानी

नयी राह चली है नयी मंजिल पानी , जीवन की है नयी रवानी , क्या पाया क्या खोया अब तक बात रही सब वो बेमानी नयी राह चली है नयी मंजिल पानी गाँव हैं छोड़ा देश है छोड़ा नया भेष है नया है डेरा लोग नए हैं भाषा न्यारी पर लगती है वो बोली प्यारी नयी राह चली है नयी मजिल पानी देखो क्या बनती है नयी कहानी   

हंस भी लेती है वो मन ही मन

शादी की चौदहवीं सालगिरह है सुबह से वो व्यस्त रात तक है पति आज भी खाली हाथ ही है आज उसका उपवास भी है कर्मिणी है धर्मिणी है काम में अपने गुणी है बात में मीठापन नहीं है कर्कशा भी वो नहीं है खीज के रह गयी है पति से बहस हो गयी है सालगिरह  आंसूं में कटी है सुबह फिर जिंदगी सर पे खड़ी है /  संघर्षमय जीवन रहा है माता का वियोग सहा है पति का व्यवहार सरल है घर में उसका कब  चला है नौकरी वो कर रही है बेटा औ बेटी की धनी वो चिडचिडा जाती है उनपे शरीर की सीमा पे खड़ी है पाले में उसके  कम भाग्य  आया पति ने भी कहाँ पैसे कमाया कुढ़ रही मन ही मन वो गुस्सा निकाले पति पे सब वो जिंदगी से नहीं है हार मानी  उसके जीवट की भी है एक कहानी   सँवार रही है वो बच्चों का बचपन हंस भी लेती है वो मन  ही मन

जिंदगी तेरी पगडण्डी फिर चल आया मै ,

जिंदगी तेरी पगडण्डी फिर चल आया मै , जिंदगी तेरी बंदगी फिर कर आया मै खुदा बसता है जमीं पे यकीं न था तेरी राहों में खुदा देख आया मै तेरी मोहब्बत तो शामिल है मेरे रग रग में तेरी चाहत असीम है मेरे हर पल में तड़प गम  ख़ुशी सब अमानत तेरी जिंदगी जिन्दा हूँ मै तेरी जफ़ाओं में /

मुफलिसी ने जीना सिखा दिया

मुफलिसी ने जीना सिखा दिया अपनो की भीड़ में अपना बता दिया / नजर फेर बगल से निकल गया  यार था मेरा मेरी कीमत बता गया  घर में बहस थी चल रही कमरे में बैठा सुन रहा न पूंछ कुछ मुझे मेरी अहमियत बता दिया काम कोई होता सबको मेरी याद आती काम होने पे कामचोर की तोहमत लगा  दिया   मुफलिसी ने जीना सिखा दिया अपनो की भीड़ में अपना बता दिया /

जिंदगी तू ही बता तू है क्या चाहती ,

जिंदगी तू ही बता तू है क्या चाहती , अहसास नहीं आभास नहीं मृतप्राय  जीवन क्यूँ चाहती बंधन नहीं हो उलझन नहीं हो क्या तू है मांगती ऐ जिंदगी तू ही बता तू क्या है चाहती , भाव में है प्यार लेकिन  कहाँ मांग रहा इकरार तेरा जिंदगी कटी  अभाव से  माँगा कब अहसान तेरा झुरमुट हो उत्पीडन  का या घोर  समुद्र हो जीवन का कब प्यार है छूटा श्रद्धा छोड़ी कब रास्ता छोड़ा प्रियतम का ऐ जिंदगी तू ही बता तू क्या है चाहती , ना रुठती ना है मनाती ना राह करती साथ का ना विफरती ना अकड़ती साथ करती हमेशा दुस्वार का ना सिमटती ना बहकती  ना कोई अधिकार छोड़े प्यार का दूरियां भाती नहीं नजदीकियां जमती नहीं क्या कहे इस साथ का ऐ जिंदगी तू ही बता तू क्या है चाहती

सहमे पत्ते खिले फूल हैं

सहमे पत्ते खिले फूल हैं महका गुलशन  मौसम नम  खिलता चेहरा आखें रिक्त  रुंधा गला बातों मे सख्त  थाली सजी पूजा के फूल  सुखा  पत्ता पैर की धुल खुशियों का मौसम  गम की चिंगारी सीने में सिमटी  बाहें वो प्यारी सहमे पत्ते खिले फूल हैं महका गुलशन मौसम नम

सिमटते दायरों बिखरते संबंधों में भटकाव

सिमटते दायरों बिखरते संबंधों में भटकाव सहमी अपेक्षा उच्श्रीन्खल इच्छा में उलझाव   बदलते स्वरुप रिश्तों में समाहित अधिकार का बड़ता प्रकोप कुछ रिश्तों के नए विकार  का मान्यताएं टूटती स्व को पोषती नए विचार मै का प्रहार हम का घटता प्रचार नयी भागती दुनिया रीती नयी    पल के रिश्ते पल की प्रीती नयी

कौतुहल है उत्सुकता है और बड़ी भावुकता है

कौतुहल है उत्सुकता है और बड़ी भावुकता है मिलेंगे किस अभिवादन से कितनी ही आतुरता है प्रीती दिखेगी प्यार दिखेगा या उलझा  संवाद दिखेगा प्यार मिले तिरस्कार मिले पर ना व्यवहारिक व्यवहार मिले कौतुहल है उत्सुकता है और बड़ी भावुकता है मिलेंगे किस अभिवादन से कितनी ही आतुरता है

काटे कितने ही वसंत अब जीना चाहता हूँ

काटे कितने ही वसंत अब जीना चाहता हूँ ऐ जिंदगी देखा किया तुझे अब छूना चाहता हूँ राह में कांटे सजे या हो फूल बिखरे पैरों तले मंजिल तक पहुँचाना नहीं ख्वाब  जीना चाहता हूँ काटे कितने ही वसंत अब जीना चाहता हूँ ऐ जिंदगी देखा किया तुझे अब छूना चाहता हूँ इशारे मौसम के रहे हों या हों वो महबूब तेरे ताका किया अब तक उन्हें अब छूना चाहता हूँ काटे कितने ही वसंत अब जीना चाहता हूँ    ऐ जिंदगी देखा किया तुझे अब छूना चाहता हूँ   अरमान सजोये या मोहब्बत को यादों में पिरोये अब तक गले लग जा अब तो तुझे अब  जीना चाहता हूँ काटे कितने ही वसंत अब जीना चाहता हूँ ऐ जिंदगी देखा किया तुझे अब छूना चाहता हूँ

दिल है बेक़रार किसी का

दिल है बेक़रार किसी का मन रहा पुकार किसी का कोई है मशगूल अपनी दिनचर्या में कोई कर रहा इंतजार किसी का /

इम्तहान लेती रही जिंदगी मेरी

इम्तहान लेती रही जिंदगी मेरी यूँ ही चलती रही जिदगी मेरी कमियाँ तलाशते रहे लोग अपने असफलताएं सजाती रही मेरी जिंदगी व्यवहार बदलता रहा हर मोड़ पे लोंगों का मेरी मुसीबतों पे मुस्कराती  रही मेरी जिंदगी हर ठोकर के बाद लंगडाती रही मेरी जिंदगी अपनो को यूँ  सुकूँ  पहुंचाती रही मेरी जिंदगी कोई मरहम लगता नमक का कोई तिरस्कार की बातें कोई अहसान की दवा देता कोई दया की बातें कोई मुस्कराता हर तकलीफ पे कोई खिलखिलाता हर चोट पे ऐसे  कितनो को सुख पहुंचाती रही मेरी जिंदगी  

सिर्फ तर्क करे क्या हासिल हो ,

सिर्फ तर्क करे क्या हासिल हो , भावों में आत्मीयता शामिल हो ; हितों के घर्षण से कब कौन बचा है , क्यूँ न अपनो का थोडा आकर्षण हो / झूठे आडम्बर से क्या मिला है थोड़ी मोहब्बत, थोडा त्याग, थोड़ी जरूरत ,थोडा परमार्थ , क्यूँ न ये अपना जीवन दर्शन हो , सिर्फ तर्क करे क्या हासिल हो , भावों में आत्मीयता शामिल हो /