नयी राह चली है नयी मंजिल पानी , जीवन की है नयी रवानी , क्या पाया क्या खोया अब तक बात रही सब वो बेमानी नयी राह चली है नयी मंजिल पानी गाँव हैं छोड़ा देश है छोड़ा नया भेष है नया है डेरा लोग नए हैं भाषा न्यारी पर लगती है वो बोली प्यारी नयी राह चली है नयी मजिल पानी देखो क्या बनती है नयी कहानी
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।