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जून, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आधी जीत की समीक्षा

मेरी मराठी कविता

दो कोयल

फोन पे , बातों ही बातों में उसने कहा - ध्यान से सुनो ,  कोयल बोल रही है । सुनाई दिया ? मैंने कहा - हाँ ,  दो कोयल बोल रही हैं ।  एक मुझसे और एक सब से ।

नहीं रहे डॉ शिव कुमार मिश्र जी

मार्क्सवादी आलोचक शिवकुमार मिश्र

हिन्दी के प्रख्यात मार्क्सवादी आलोचक शिवकुमार मिश्र का आज सुबह निधन हो गया। विनम्र श्रद्धांजलि . मि‍श्रजी का जन्‍म 3 सि‍तम्‍बर 1930 को कानपुर के महोली नामक गांव में हुआ था . मि‍श्रजी ने आलोचना की तकरीबन 15 कि‍ताबें लि‍खी हैं और 10 से ज्‍यादा कि‍ताबें संपादि‍त की हैं।

तुम चले जाओगे --रचनाकार: अशोक वाजपेयी

तुम चले जाओगे पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे जैसे रह जाती है पहली बारिश के बाद  हवा में धरती की सोंधी-सी गंध  भोर के उजास में  थोड़ा-सा चंद्रमा  खंडहर हो रहे मंदिर में अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार| तुम चले जाओगे पर थोड़ी-सी हँसी आँखों की थोड़ी-सी चमक हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी यहीं रह जाएँगे प्रेम के इस सुनसान में| तुम चले जाओगे  पर मेरे पास  रह जाएगी प्रार्थना की तरह पवित्र  और अदम्य तुम्हारी उपस्थिति, छंद की तरह गूँजता तुम्हारे पास होने का अहसास| तुम चले जाओगे और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे| --रचनाकार: अशोक वाजपेयी 

कनेक्टिविटी

                उनसे फोन पे बात हो रही थी           मैंने पूछा – कहाँ  हो           जवाब आया -  छत पे             मैंने फ़िर पूछा –           छत पे क्या कर रही हो ?           यहाँ कनेक्टिविटी मिल जाती है – उनका जवाब           मैंने कहा –           अभी भी छत पे  कनेक्टिविटी खोजती हो ?           उसने कहा –           हाँ , मोबाईल की कनेक्टिविटी यहीं मिलती है ।   

thought

कोशिश करने वालों की

पिताजी होली के रंग में

फरवरी में गाँव में