आखों में तेरे खोया हूँ अब तक, कितनी ही रातें न सोया हूँ अब तक , जागे हुए सपनों की बातें करूँ क्या , न पूरी हुई मुलाकाते वो कहूँ क्या , बाँहों का घेरा था कितना अकेला था खिलता अँधेरा था तन्हायी ने घेरा था यादें महकी थी आहें बहकी थी गमनीन सीरत थी तू बड़ी खुबसूरत थी फिजा गुनगुनायी थी चाहत सुगबुगाई थी तू मन मंजर पे छाई थी तू न मेरी हुई न परायी थी किस्से अधूरे हैं वाकये न पूरे हैं जीवन के लम्हे है हंसते और सहमे है
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।