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Wednesday, 9 September 2009

भावनावों का अत्याचार भी खूब है ;

भावनावों का अत्याचार भी खूब है ;
कभी आंसू तो कभी महबूब है ;
कभी अपनो का कारवां ,
कभी आकंछावों की भूख है ;
कभी हलके इनकार पे आखें नम हो गई ;
कभी इकरार पे भी आखें शबनम हो गई ;
कभी दूरियों में भी नजदीकी का अहसास है ;
कभी नजदीकियों में भी दुरी का आभास है ;
कभी दौड़ के लिपटा पर आखें सजल न हुईं;
कभी आखों की आखों की बातों से वो नम हो गई ;

चिरोयली कहानी

 चिरोयली        मैं ताशकंद, उज़्बेकिस्तान में सन 2024 की फ़रवरी के पहले सप्ताह में पहुंचा था, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफ़ेसर ...