किसी के होने न होने के बीच एक जगह ज़रूर होती है जिसे हमेशा किसी की ज़रूरत होती है । हमारे ही अंदर , ये वो रिक्त स्थान हैं जो संवेदनाओं से सिंचित और प्रेम की ऊष्मा से भरे होते हैं ये रिक्त स्थान आसक्त नहीं अनुरक्त होते हैं । किसी के आने के बाद दायित्व और विश्वास के साथ ये लुटाने लगते हैं संस्कारों से सिंचित अनुराग के पुष्प । किसी के जाने के बाद दुख और अवसाद के बादलों से ये अपना ही अभिषेक करते हैं एक दम चुपचाप । नई आशा और नई उम्मीद के लिए प्रेम और विश्वास ज़रूरी है अत: ये रिक्त स्थान अपने संकल्पों के साथ जीते हैं ख़ुद की रिक्तता के साथ हमेशा प्रतिक्षारत । इन रिक्त स्थानों में यादें भरपूर हैं वादे-इरादे , न जाने क्या –क्या । इन रिक्त स्थानों की पूर्ति समर्पण की शर्त पे है क्षमा और प्रेम की बुनियाद पे है अहम के त्याग पे है जीवन जीने की अनिवार्य शर्त पे है । सोचना कभी तुम्हारे अंदर भी यह रिक्त स्थान ज़रूर होगा ।
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।