पति पत्नी का रिश्ता हो मिनट का पल का या हो दिन महीने साल का मिटा सके ये इतना बस नहीं है काल का ; शिव की भभूती औ माता का सिंदूर भरा था औ भाव अटूट प्यार का तब मांग भरी थी तेरी मैंने इश्वर स्वयम गवाह था , कैसे भूलूं वो घड़ियाँ मैं आंसूं से सींचा था रिश्ता प्यार का , झूठ कहे या भूले तू पर ये रिश्ता मेरे हर जनम हर सांस का ; भाव से बड़कर क्या दुनिया में प्यार से अच्छा क्या इन्सा में सही गलत उंच नीच का फैसला कोई कैसे करे है है मोहब्बत खुदा का जज्बा उसे बुरा कैसे कहे है / राधा कृष्ण भजते सभी हैं द्रौपदी को कहते सती हैं रीती में उलझे है क्यूँकर प्रीती बिन जीना हो क्यूँ कर प्यार से बड़कर पूजा नहीं कोई इस जगत इस संसार में क्यूँ झिझक कैसी ये दुविधा क्या मैं नहीं तेरे दिल की छाँव में सरल नहीं है राह प्रीती की पर सरल कहाँ जीना संसार में क्यूँ हो अब तक तू उलझी क्या कमी रही मेरे प्यार में ; प्यार को रब समझा और तुझको जिंदगी मेरे जीने का उद्देश्य तू ही है तेरी करूँ मै बंदगी / नाम ले मेरा या पति कह ले या कुछ भी कह के पुकार ले मेरा जीवन तेरा साँसे तेर...
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।