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महीना वही पर मौसम अलग सा है

 महीना वही पर मौसम अलग सा है यह नवंबर कहां तुम्हारी महक सा है।  सबकुछ तो है मगर जैसे फीका सा है  जिंदगी के जायके में तू  नमक सा है। जिसे गुनगुनाना चाहता हूं हरदम मैं हमदम तू बिलकुल उस ग़ज़ल सा है।  निहारता हूं अकेले में अक्सर चांद को यकीनन वह तेरी किसी झलक सा है। मैं अब तुम्हें पाऊं  तो भला पाऊं कैसे  एक कतरा हूं मैं और तू फलक सा है।                           मनीष कुमार मिश्रा 

भगवान परशुराम : सोशल मीडिया और छविकरण

      भगवान परशुराम : सोशल मीडिया और छविकरण डॉ. मनीष कुमार मिश्रा                          भगवान परशुराम से संबंधित कथाओं का कोई अंत नहीं है । पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भगवान परशुराम के राजनीतिक देवताकरण / छविकरण के समकालीन प्रयासों में सोशल मीडिया-आधारित सामग्री जैसे मीम्स , पोस्ट , चित्र , टिप्पणियां और अन्य सुविधाओं का   बना विश्लेषण या सही जानकारी के बहुत सी बातें लिखी जा रही हैं । एक राजनीतिक प्रतीक के रूप में भगवान परशुराम के लोकप्रिय उद्भव को इस तरह उपयोग में लाना देश और समाज के व्यापक हित में नहीं है । हिंदुत्व का वैचारिक जनादेश स्पष्ट रूप से विभिन्न वर्गों के बीच एकता का प्रस्ताव करता है , लेकिन डिजिटल सोशल मीडिया में भगवान परशुराम का कतिपय समकालीन राजनीतिक उपयोग   हिंदुत्व की उस मूल चेतना के लिए ही चुनौती प्रस्तुत करती है । इस प्रक्रिया में , यह लेख धार्मिक आस्था , विश्वास   और सोशल मीडिया   की सामाजिक संरचनाओं के बीच जटिल संबंधों स...