तुम चले जाओगे पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे जैसे रह जाती है पहली बारिश के बाद हवा में धरती की सोंधी-सी गंध भोर के उजास में थोड़ा-सा चंद्रमा खंडहर हो रहे मंदिर में अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार| तुम चले जाओगे पर थोड़ी-सी हँसी आँखों की थोड़ी-सी चमक हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी यहीं रह जाएँगे प्रेम के इस सुनसान में| तुम चले जाओगे पर मेरे पास रह जाएगी प्रार्थना की तरह पवित्र और अदम्य तुम्हारी उपस्थिति, छंद की तरह गूँजता तुम्हारे पास होने का अहसास| तुम चले जाओगे और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे| --रचनाकार: अशोक वाजपेयी
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।