परछाइयों का साथ है यूँ , न अकेलापन न कोई साथ है यूँ , चंद शब्दों अहसासों की बात थी यूँ , न दूरियां ना इतिहासों की बात थी यूँ . =============================== यादें कुछ धूमिल है खुशियाँ रिमझिम है , गुजरे वक़्त के कारवां में कितनी हकीकते गुमसुम है , =========================================== शरारत तू इसे कह ले , इबादत तू इसे कह ले , चल ज़माने की गर रश्मों से , बेगैरत तू इसे कह ले , मोहब्बत है तू मेरी , चाहत तू इसे कह ले , रिश्तों की बंदिशों में हो उलझे , जरूरत तू इसे कह ले . ============================
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।