न राह है न मुकद्दर , फिर मेरा दिल तेरा है क्यूँ कर , वक़्त न धूमिल कर पाया , राहों ने कितना ही भरमाया , अपने लोग भाव उलझाते ही हैं , रिश्तों में अड़चन लाते ही है , बड़ती कशिश समय भी रोक न पाई , बड़ती तपिश भले तुझे ना भायी , इश्क को चोटों से क्यूँ भागूं मैं तेरे संबंधों से घबरायु क्यूँ मै , मै अविचलित अपने प्यार पे , भले नम हैं आखें तेरे बेवफाई के नाम पे /
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।