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Saturday, 3 May 2014

हर शाम छत पे अकेले

हर शाम छत पे अकेले
गुमसुम से टहलते हैं । 

खुली जुल्फों के बादल
बरसने से डरते हैं । 

कितना कुछ कहने के बाद भी
कुछ कहने को तरसते हैं । 

कभी कहा तो नहीं पर
दिल दोनों के मचलते हैं ।

बनारस की हर सुबह में
तेरी यादों की सलवटें हैं ।

संविधान सभा की बहसों में शराब अनुच्छेद 47 की निर्मिति, निषेध-विमर्श, स्वतंत्रता, जनस्वास्थ्य और आदिवासी स्वायत्तता का ऐतिहासिक-संवैधानिक अध्ययन डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

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