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Saturday, 3 May 2014

हर शाम छत पे अकेले

हर शाम छत पे अकेले
गुमसुम से टहलते हैं । 

खुली जुल्फों के बादल
बरसने से डरते हैं । 

कितना कुछ कहने के बाद भी
कुछ कहने को तरसते हैं । 

कभी कहा तो नहीं पर
दिल दोनों के मचलते हैं ।

बनारस की हर सुबह में
तेरी यादों की सलवटें हैं ।

थाली की राजनीति: भारतीय साहित्य में भोजन, भूख, जाति, लैंगिकता और सांस्कृतिक सत्ता डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

  थाली की राजनीति: भारतीय साहित्य में भोजन, भूख, जाति, लैंगिकता और सांस्कृतिक सत्ता डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग...

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