बदन उसका अगर चेहरा नहीं है , तो फिर तुमने उसे देखा नहीं है दरख्तों पर वही पत्ते हैं बाकी , के जिनका धूप से रिश्ता नहीं है वहां पहुँचा हूँ तुमसे बात करने , जहाँ आवाज़ को रस्ता नहीं है सभी चेहरे मकम्मल हो चुके हैं कोई अहसास अब तन्हा नहीं है वही रफ़्तार है तलअत हवा की मगर बादल का वह टुकडा नहीं है
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।