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जनवरी, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हंगामा है क्यों बरपा -----------

पब कल्चर का विरोध अब चुनाव का मुद्दा बन रहा है । वो भी मुंबई और बंगलोर जैसे शहरो के नाम पे । हम तरक्की तो चाहते है लेकिन सडी गली विचार धारा को भी नही छोडना चाहते । जब भारत मे पूजी आती है ,विदेशी आते हैं तो हमे अच्छा लगता है ,लेकिन इनके साथ आने वाली संस्कृति को हम बरदास नही कर पाते । ये दो तरफी चाल बड़ी भयानक है । हमे इस पे सोचना ही होगा ।

अभिलाषा

मेरे मन की एक अभिलाषा पलती इसमे है एक आशा उस आशा मे प्यार भरा प्यार भरा संसार बसा नही जरूरत किसी की इसको इसमे अजब विस्वास भरा उतना ही यह है गहरा जितना नभ है तारों भरा तुम जो हो अभिलाषा ----- और किसी की करूँ क्या आशा \ तुम ---तुम वो जो -------- कहना मुस्किल है ------ कोई क्या कह सके गा तुम्हे ---सिवा की तुम हो एक आशा ------------------- ...

कैसे ग़लत हैं राज ठाकरे ?

मीडिया जो चाहे लिखे,कहे,दिखाये और बताये उसको पूरी आजादी है । फ़िर देश की आम जनता की औकात ही क्या है ? यह बात राज ठाकरे वाले मामले से आसानी से समझा जा सकता है । अपनी राजनीतिक जमीन तलास कर रहे राज ठाकरे ने ऐसा कुछ नही किया जो इस देश की राजनीत के लिये नया हो । उन्होने बस अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढाया । अब अगर राज को आप ग़लत कहेंगे तो आप को इस देश की राजनीतिक और संवैधानिक स्थितियों को भी ग़लत कहना पड़ेगा । इस देश मे कानून कब राजनेतावो पर नकेल कसने मे कामयाब हुवा है ? शायद तभी जब उसकी राजनीतिक गोटियाँ राजनीति की बिसाद पे सही नही बैठी । हाल ही मे सत्यम का घोटाला उजागर हुआ ,क्योंकि सत्यम का राजनीतिक मडर सुनिश्चित किया गया । राज ठाकरे राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं । आगे बढ़ने के शोर्ट -कट को जानते है । आज अगर आप राज को ग़लत मानते हैं तो कृपया एक ऐसा नाम बता दीजिये जो आप की नजरो मे सही हो । आजादी के बाद का मोह भंग और उसके बाद की अव...

हिन्दी साहित्य का इतिहास -----नई चर्चा

हाल ही मे वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक मे मेरा भी लेख शामिल किया गया है । हिन्दी साहित्य के अध्यन मे यह पुस्तक उपयोगी है । आप अगर हिन्दी साहित्य लेखन के विवादस्पद मुद्दों से रूबरू होना चाहते हैं ,तो यह पुस्तक आप के लिये उपयोगी है ।

संत तेऊराम जी

सिन्धी समाज मे गुरूजी बहुत पूजनीय हैं । उन्ही के साहित्य का संछिप्त परिचय यंहा प्रस्तुत है । “Respect honourable guruji LIFE AND WORKS OF SANT TEUNRAMJI Who is crown to the head, Whose blessed look alone Gets every work completed.” It is cited in Srimad Bhagwad Puran – from the origin of the universe – as and when the need was felt Almighty Paramatman has taken incarnations viz. Matsya Avtar, Varah Avtar for instance. There are many types of incarnations of God such as : 1) Purna Avtar :Complete Incarnation 2) Ansh Avtar :Partial Incarnation 3) Naimittik Avtar :Casual Incarnation 4) Nittya Avtar :Mundane Incarnation In continuation of this series of incarnations, in the later part of the 19th century, on 6th July, 1887, in the sacred land of Sindh, on the shores of Indian Ocean (Sindhu Dariyah), in Khandu village of Hyderabad, Sadguru Swami Teunramji Maharaj took the incarnation for the well being of human race. His father, chelaram, as well as his mother Krishnadevi, were...

खामोशी की जुबान -----------------------------------

खामोशी की जुबान कविता संग्रह के प्रकाशन कार्य से भी मै juda reha हूँ । ॐ प्रकाश पाण्डेय की यह किताब देश की वर्तमान अवस्था का बड़ा की मार्मिक चित्त्रण हमारे सामने प्रस्तुत करती है। अगर आप इसे पढेंगे तो इससे अवस्य प्रभावित होंगे । इस पुस्तक के लिये भी आप लिख सकते हैं .मै इसे भी आप के लिये उपलब्ध करा दूंगा ।

कविता संग्रह

मन के सांचे की मिटटी विजय पंडित का नवीनतम काव्य संग्रह है । इस संग्रह की कवितायें अपनेआप मे कई तरह के प्रश्न समाज के सामने खड़ी करती हैं । जो लोग काव्य मे सिर्फ शिल्प के हिमायती हैं , उनकी मुह पे तमाचा जड़ने का काम यह कविता संग्रह करता है । आप भी इसे अवस्य पढें और अपनी राय दें । इस किताब को प्राप्त करने के लिये आप लिखें । मै इसे आप के लिये उपलब्ध करवा दूंगा वो भी मुफ्त, क्योंकि इसका प्रकाशन कार्य मैने ही किया है .

सृजन सन्दर्भ त्रैमासिक पत्रिका

सृजन सन्दर्भ मुंबई से निकलनेवाली एक त्रैमासिक पत्रिका है । डॉ सतीश पाण्डेय इसके संपादक हैं। पत्रिका का प्रयास मुझे अच्छा लगा । आप यदि हिन्दी की कोई नई पत्रिका खोज रहे हैं जिसका हर अंक संग्रहणीय हो, तो आप इस पत्रिका की वार्षिक सदस्यता ले सकते हैं । इस पत्रिका का हर अंक किसी एक महत्वपूर्ण विषय पर केन्द्रित रहता है । पत्रिका की वार्षिक सदस्यता १०० रुपये हैं । आप ''प्रज्ञा प्रकाशन '' के नाम चेक भेज कर इसकी सदस्यता ले सकते हैं । संपादक का पता निम्नलिखित है । डॉ.सतीश पाण्डेय अध्यक्ष हिन्दी विभाग के.जे.सोमैया कॉलेज आफ आर्ट्स ,साअंस एंड कामर्स विद्या विहार मुंबई मोबाइल-९८२०३८५७०५ पत्रिका देखने के बाद अपनी राय अवस्य दें .

शर्म क्यों आती नही ?

सारा देश युद्ध की दहलीज पे खड़ा है ,ऐसे मे पहले से ही मोटी तनख्वा लेने वाले तेल कंपनियों के कर्मचरियों की हड़ताल देश द्रोह से कम नही है । आप को क्या लगता है ? मेरा बस चले तो इन सभी पे देश द्रोह का आरोप लगा सलाखों के पीछे डाल दूँ । लोकतान्त्रिक अधिकारों का इस तरह दुरुपयोग करने से इसकी बुनियाद हिल जायेगी । आप की क्या राय है ?

वो भी कैसे दिन थे ----------------------

वो भी कैसे दिन थे जब हम , छुप के मोहबत करते थे अम्मा,खाला,अब्बा सब की ,हम तो नजर बचाते थे बीच दुपहरी छत के उपर,हम चोरी चुपके आते थे घर के बुढे नौकर से भी ,हम कितना घबराते थे रात-रात भर आंहे भरते,किसी से कुछ ना कहते थे नजरो-ही नजरो मे, हम कितनी ही बाते करते थे नाम तेरा जब कोई लेता ,हम तो चुप हो जाते थे चुप रह कर भी जाने कैसे ,सुबकुछ हम कहते थे वो भी कैसे -------------------------------

प्रेम डगर मे पल दो पल

प्रेम डगर मे पल दो पल ,साथ अगर तुम मेरा देते गीत नया मफिल मे कोई,हम भी आज सुना देते अनजानी सी राह मे कोई ,हम दोनों फ़िर जो टकराते नजरे झुका के अपनी तुम ,फ़िर हौले से तुम जो मुस्काते गीत नया ---------------- बीच जवानी बचपन मे , हम दोनों जो फ़िर जो जा पते गुड्डे -गुडियों के जैसे , हम तो ब्याह रचा लेते गीत नया --------------------- जितना पागल हूँ मे तेरा ,उतना तुम यदि हो जाते एक नही फ़िर सात जनम के, साथी हम हो जाते गीत नया -------------------------

क्या है दलित साहित्य ?

मुंबई मे एक सेमिनार मे भाग लेने का अवसर मिला ,वहा चर्चा के दौरान किसी विद्वान ने यह प्रश्न उठाया की आख़िर जिस दलित साहित्य की आज इतनी चर्चा है , वह है क्या ? इसके लिये उन्होने कुछ विकल्प भी दिये , जो की निम्नलिखित हैं । १- वह साहित्य जो दलितों द्वारा लिखा गया हो ? २-वह साहित्य जो दलित के बारे मे लिखा गया हो ? ३-वह साहित्य जो दलित के बारे मे किसी दलित द्वारा ही लिखा गया हो ? या की ''वह साहित्य जो ख़ुद दलित हो वह दलित साहित्य है । '' विषय पर आगे चर्चा नही हो सकी । वाद-विवाद बढ़ता गया । मगर मैं परेशां हो गया । आज जब इस के बारे मे सोचता हूँ तो लगता है की हम कब तक दूसरो की भावनावो के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे ? दलित साहित्य का प्रारंभिक समय आक्रोश का रहा अतः इन दिनों आक्रोश का साहित्य सामने आया । यह स्वाभाविक भी था । सदियों के शोषण के खिलाफ पहले आक्रोश ही दिखाई पड़ेगा । लेकिन फ़िर यह आन्दोलन आज गंभीर साहित्य की ओर अग्रसर हो रहा है । अब इस आन्दोलन के द्वारा भी लोक मंगल , समन्वय और मानवता का संदेश दिया जा रहा है । केवल विरोध के साहित्य को ख़ुद इस आन्दोलन के अंदर समर्थन नही मिल रह...

हास्य कवि बनाम हास्यास्पद कवि

मैं ख़ुद हास्य व्यंग कवि के रूप मे सालों से अपनी जेब गर्म करता रहा हूँ । मंचों की जोड़ -तोड़ से अच्छी तरह परचित भी हूँ । ऐसे मे आज कल एक सवाल तथाकथित साहित्यकार अक्सर पूछ लते हैं की हम हास्य कवि हैं या हास्यास्पद कवि ? मुझे इस सवाल पे गुस्सा नही आता .मैं बड़ी शालीनता से कहता हूँ की हम हास्यास्पद कवि हैं.आखिर इस देश मे ऐसा बचा क्या है जो हास्यास्पद ना हो ? साहित्य सरोकारों से दूर कुछ आलोचकों की सराब और रंगीन हरी -हरी नोटों का मोहताज हो गया है । किताब छापना अब पैसो वालों का शौख हो गया है .पढ़ने वाले क्या पढ़ना चाहते हैं यह किसी से छुपा नही है । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया किस तरह पूँजी की गिरफ्त मे है यह हम देख ही रहे हैं । प्रिंट मीडिया के पास विज्ञापनो से जो जगह बच जाती है, वहा कुछ ख़बर देने का प्रयास करती है । ऐसे मे आर्थिक परेशानियों से घिरे रचनाकार भी रूपया कमाने के लिये अगर हास्यास्पद बन रहे हैं तो इसमे ग़लत क्या है ? आप ऐसा ना करके कोण सा साहित्य अकादमी का पुरस्कार अपने नाम क...

साहित्यिक सरोकार बनाम वास्तविकता

आज कल सामाजिक सरोकारों की बात करना एक फैसन हो गया है। समाचार चैनलों की बात करे तो जी न्यूज़ पे पुन्यप्रशून वाजपेयी जी अक्सर यही जुमला सुनाते रहते हैं। लेकिन वे ख़ुद इस सन्दर्भ मे क्या करते हैं ये वो ही जाने । कुछ दिनों पहले फणीश्वर रेणु की धर्म पत्नी लतिका रेणु की ख़बर दिखाकर एन .डी.टीव्ही । इंडिया ने भी सामाजिक सरोकारों का रोना रोया.आप को याद होगा की वर्ष २००७ का साहित्य अकादमी पुरस्कार को प्राप्त करने वाले कथाकार अमरकांत की आर्थिक स्थिति को लेकर भी काफ़ी अपील हुई और सामाजिक सरोकारों कई नाम पे कागज रंगे गये । आप इन बातो को कैसे देखते हैं ?