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अप्रैल, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Bench relief for NET/SET candidates

By Vinodh A M | ENS - MADURAI 27th April 2013 08:49 AM The Madurai Bench of the Madras High Court Bench has declared that all candidates, who obtained separate minimum marks as in the National Eligibility Test (NET) / State Eligibility Test (SET) conducted in 2012 are qualified for the post of Assistant Professors. Allowing a batch of 31 petitions filed by candidates, who appeared for NET and SET exams in 2012, Justice D Hari Paranthaman observed that “What was absent in the regulation cannot be introduced at the fag end of the examination, just before the announcement of the result, whatever may be the justification for the same”. The petitioners approached the Madurai Bench praying to quash the notification issued by the UGC and to declare that they have cleared the NET exam held on June 24, 2012 and the SET exam conducted on October 7, 2012. As per Clause 3.3.1 of the University Grants Commission (the minimum eligibility condition for recruitment and appointm...

शराब और खुदा

तेरे बाद वैसे तो कोई परेशानी नहीं है

तेरे बाद, वैसे तो कोई परेशानी नहीं है  बस ज़िंदगी में,अब कोई नादानी नहीं है ।  उन निकम्मों के बारे में सोचना क्या , जिनकी अपने प्यार की,कोई कहानी नहीं है ।  हुस्न की उफ़नती नदी में जो डूबा नहीं , उसकी जवानी तो, कोई जवानी नहीं है ।  शोख़ है,दिलकश है और बहुत हसीन भी है  मजा तो यह है कि, जादा सयानी नहीं है । 

तेरे इश्क़ के बहाने ही सही ,

कभी-कभी जो मिलना हो जाता है  बस उतना ही तो जीना हो जाता है ।  मेरी इन  खामोश तनहाइयों में, उसका दबे पाँव आना हो जाता है ।  ख़ुद के हालात पे क्या कहूँ , बस जीने के लिए जीना हो जाता है ।  तेरे इश्क़ के बहाने ही सही , रोज़ पीना - पिलाना हो जाता है ।  जब तु ने छू लिया तो यक़ीन आया ,  पारस  छूने से, लोहा सोना हो जाता है । 

एक नया अनुभव

27-28 April Hindi seminar

आधी जीत : एक निष्पक्ष एवं प्रामाणिक साहित्यिक दस्तावेज़

                  ओ म प्रकाश पांडे ‘ नमन ’ द्वारा लिखित उपन्यास आधी जीत समाजसेवी अन्ना हज़ारे के जन लोकपाल बिल से संबंधित दिल्ली के रामलीला मैदान में हुए आंदोलन के परिप्रेक्ष में लिखा गया एक नए कलेवर का उपन्यास है । अगस्त 2011 में हुआ यह आंदोलन कई मायनों में अलग था , इस समग्र आंदोलन को सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक एवं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष में समझने – समझाने का साहित्यिक स्वरूप ही इस उपन्यास की गति है । आंदोलन की दुर्गति या सफलता के प्रश्न पे लेखक का मोटे तौर पे निष्पक्ष रहना उपन्यास को बोझिल या एकांगी बनाने से बचाता है । ठीक इसीतरह तर्क के साथ-साथ तथ्यों का विस्तृत विश्लेषण भी उपन्यास के संवादों को अधिक विश्वसनीय रूप प्रदान करता है ।          भाषा सहज , सरल और सपाट बयानी वाली है । आत्मकथात्मक और संवाद शैली का भरपूर उपयोग किया गया है। शेरो - शायरी और काव्य पंक्तियाँ भी उपयोग में लायी गयी हैं। दिल्ली और आस-पास का परिवेश उपन्यास के केंद्र में है । पात्रों की भाषा को उनके परिवेश के अ...

मेरी नई किताब

National seminar on financial frauds

INTERNATIONAL CONFERENCE ON MARATHI LITERATURE

कुछ इस तरह मैंने

क्या हाल है मेरा तेरे पीछे

अपने ही क़िस्से में, अपना ही लतीफ़ा हूँ ।

मैं आजकल, कुछ  ऐसी प्रक्रिया का हिस्सा हूँ  कि अपने ही क़िस्से में, अपना ही लतीफ़ा हूँ । 

शोर बहुत है लेकिन

शोर बहुत है लेकिन , मेरा चिल्लाना भी ज़रूरी है शामिल सब में हूँ ,  यह दिखाना भी ज़रूरी है ।  

मेरे हिस्से में सिर्फ़, इल्ज़ाम रखते हो

मेरे हिस्से में सिर्फ़, इल्ज़ाम रखते हो  किस्सा-ए-मोहबत्त यूं तमाम करते हो                                    मनीष "मुंतज़िर ''

हर लफ़्ज़ तिरे जिस्म की खुशबू में ढला है / जाँ निसार अख़्तर

हर लफ़्ज़ तिरे जिस्म की खुशबू में ढला है ये तर्ज़ , ये अन्दाज-ए-सुख़न हमसे चला है अरमान हमें एक रहा हो तो कहें भी क्या जाने , ये दिल कितनी चिताओं में जला है अब जैसा भी चाहें जिसे हालात बना दें है यूँ कि कोई शख़्स बुरा है , न भला है।

तो फिर तुमने उसे देखा नहीं है/ तलअत इरफ़ानी

बदन उसका अगर चेहरा नहीं है , तो फिर तुमने उसे देखा नहीं है दरख्तों पर वही पत्ते हैं बाकी , के जिनका धूप से रिश्ता नहीं है वहां पहुँचा हूँ तुमसे बात करने , जहाँ आवाज़ को रस्ता नहीं है सभी चेहरे मकम्मल हो चुके हैं कोई अहसास अब तन्हा नहीं है वही रफ़्तार है तलअत हवा की मगर बादल का वह टुकडा नहीं है

रात के बाद / खलीलुर्रहमान आज़मी

नश्शा-ए-मय के सिवा कितने नशे और भी हैं कुछ बहाने मेरे जीने के लिए और भी हैं ठंडी-ठंडी सी मगर गम से है भरपूर हवा कई बादल मेरी आँखों से परे और भी हैं ज़िंदगी आज तलक जैसे गुज़ारी है न पूछ ज़िंदगी है तो अभी कितने मजे और भी हैं हिज्र तो हिज्र था अब देखिए क्या बीतेगी उसकी कुर्बत में कई दर्द नए और भी हैं रात तो खैर किसी तरह से कट जाएगी रात के बाद कई कोस कड़े और भी हैं वादी-ए-गम में मुझे देर तक आवाज़ न दे वादी-ए-गम के सिवा मेरे पते और भी हैं

प्रेम विस्तार है

 प्रेम  विस्तार  है , स्वार्थ  संकुचन  है . इसलिए  प्रेम  जीवन  का  सिद्धांत  है . वह  जो  प्रेम  करता  है  जीता  है , वह  जो  स्वार्थी  है  मर  रहा  है .   इसलिए  प्रेम  के  लिए  प्रेम  करो , क्योंकि  जीने  का  यही  एक  मात्र  सिद्धांत  है , वैसे  ही  जैसे  कि  तुम  जीने  के  लिए  सांस  लेते  हो . स्वामी विवेकानंद                                                                                             

September 2012 IIAS SHIMLA ASSOCIATES

IIAS SHIMLA ASSOCIATES -    September 2012 Dr. Bijay Kumar Barnwal China-Myanmar Relations: The Road Ahead Dr. Leena Chauhan Tarkon Se Pare Kuch Ansuljhe Rahasye . Dr. Harinder Kaur Woes and Worries of the Tribal Women in Punjab. Dr. Kaustav Chakraborty Dirty Issues: Reconsidering the ‘Impure’ in two Bengali Texts .          Dr. Chandrabhan Singh Yadav Hindi Cinema Mein Stri Sasktikaran. Dr. Madan Lal Mankotia   Inventorization of Medicinal Plants in different Agro-Ecological Zone of Himachal Pradesh . Dr. Pushpesh Kumar Pande Van Raji: A Tribe in Transition. Shri Pankaj Roy  “ Translating Violence” :  A Study Performance in Indian Drama and of Selected Plays of Vijay Tendulkar . Dr. Devender Kumar Classification and Functions: Contextualizing Hariani Peasant Women’s Folksongs within Folkloristics. Dr. Manish Kumar C. Mishra   Bharat mein Kisore Ladkio ki Taskari . Dr. Hamda Zarin Effective Communi...

KABIR - HAJARIPRASAD

कबीर – आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी (पूरी किताब) www.debateonline.in डाउनलोड के लिए उपलब्ध. ऐसे कुल में पैदा हुए व्यक्ति के लिये कल्पित ऊंच-नीच भावना और जाति व्यवस्था का फौलादी ढांचा तर्क और बहस की वस्तु नहीं होती, जीवन-मरण का प्रश्न होता है। कबीरदास इसी समाज के रत्न थे।

राहत इन्दौरी की एक रचना

 : किसका नारा , कैसा कौल , अल्लाह बोल अभी बदलता है माहौल , अल्लाह बोल कैसे साथी , कैसे यार , सब मक्कार सबकी नीयत डाँवाडोल , अल्लाह बोल जैसा गाहक , वैसा माल , देकर ताल कागज़ में अंगारे तोल , अल्लाह बोल हर पत्थर के सामने रख दे आइना नोच ले हर चेहरे का खोल , अल्लाह बोल दलालों से नाता तोड़ , सबको छोड़ भेज कमीनों पर लाहौल , अल्लाह बोल इन्सानों से इन्सानों तक एक सदा क्या तातारी , क्या मंगोल , अल्लाह बोल शाख-ए-सहर पे महके फूल अज़ानों के फेंक रजाई , आँखें खोल , अल्लाह बोल

मेरी बन्दगी वो है बन्दगी जो/ शकील बँदायूनी

मेरी ज़िन्दगी पे न मुस्करा मुझे ज़िन्दगी का अलम नहीं जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ाँ बहार से कम नहीं मेरा कुफ़्र हासिल - ए - ज़ूद है मेरा ज़ूद हासिल - ए - कुफ़्र है मेरी बन्दगी वो है बन्दगी जो रहीन - ए - दैर - ओ - हरम नहीं मुझे रास आये ख़ुदा करे यही इश्तिबाह की साअतें उन्हें ऐतबार - ए - वफ़ा तो है मुझे ऐतबार - ए - सितम नहीं वही कारवाँ वही रास्ते वही ज़िन्दगी वही मरहले मगर अपने - अपने मुक़ाम पर कभी तुम नहीं कभी हम नहीं न वो शान - ए - जब्र - ए - शबाब है न वो रंग - ए - क़हर - ए - इताब है दिल - ए - बेक़रार पे इन दिनों है सितम यही कि सितम नहीं न फ़ना मेरी न बक़ा मेरी मुझे ऐ ' शकील ' न ढूँढीये मैं किसी का हुस्न - ए - ख़्याल हूँ मेरा कुछ वुजूद - ओ - अदम नहीं