जिंदगी गुजर रही अब नए आशियाने में , सीख रहे हर पल कुछ नया जिंदगी नए पैमाने में सोना वही है जागना वही है पर साथ नए अनजाने है दूर देश में बैठे हम आये यहाँ कमाने हैं / फ्रेंच भाषा भी खूब है पर मुझसे कितनी दूर है भरमाती है तड़पाती है है और बड़ा तरसाती है , भागा पीछे वो आगे भागे अलसाया तो वो मुस्काए नजर मिलाये पास बुलाये नित नए वो ठौर दिखाए फ्रेंच भाषा भी खूब है पर कितनी दूर है
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।