टूट कर सवरने की फितरत हो गयी है , न जाने क्यों ,मुझे मोहब्बत हो गयी है . जानता हूँ ,अब तुम किसी और की हो, पर क्या करूँ, तुम्हारी आदत हो गयी है तुम्हे भुला देने के ख़याल भर से, अजीब सी बड़ी, मेरी हालत हो गयी है .
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।