छुं लूँ मन के भाव तेरे ,रंगू रक्तिम गाल तेरे , आशा भरी पिचकारी थामे ,घुमू तेरे द्वार प्रिये , फागुन के मौसम में मन कब थमता है , जीवन तेरी अभिलाषा में रमता है ; डालूँगा रंग कपड़ों पे तेरे , शायद दिल तेरा रंग जाय प्रिये , आशा भरी पिचकारी थामे ,घुमू तेरे द्वार प्रिये , चंचल मन है ,बहकी चितवन है , उसपे होली का त्यौहार प्रिये , मन को भावों से रंगुंगा ,तन को अहसासों से रंगुंगा , लाल ,हरा, पीला, नीला कितना प्यारा प्यार प्रिये , आशा भरी पिचकारी थामे ,घुमू तेरे द्वार प्रिये ,
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।