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राजस्थानी सिनेमा का इतिहास"

https://www.amazon.in/gp/product/9391881971/ref=cx_skuctr_share?smid=AFJ6Q7SHIN15F   मित्रों, आप को सूचित करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि मेरे और डॉ हर्षा त्रिवेदी द्वारा संपादित पुस्तक "राजस्थानी सिनेमा का इतिहास" अनंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित होकर आ गई है। पुस्तक एमेजॉन से ऑनलाईन खरीदी जा सकती है। राजस्थानी सिनेमा पर हिंदी में प्रकाशित संभवतः यह पहली पुस्तक है । राजस्थानी सिनेमा से जुड़े कई लोगों तक हम नहीं पहुंच सके लेकिन भविष्य में इसके संशोधित, परिवर्धित संस्करण की जब भी योजना बनेगी, इसमें नए विचारों और आलेखों को निश्चित ही स्थान दिया जाएगा। पुस्तक में जो प्रूफ इत्यादि की त्रुटियां रह गई हैं, आगामी संस्करण में उसे भी सुधार लिया जाएगा।  इस पुस्तक में कुल 25 आलेख हैं जिनमें से 03 आलेख अंग राजस्थानी सिनेमा पर जो लोग शोध कार्य से जुड़े हैं उनके लिए रिफ्रेंस बुक के रूप में यह किताब निश्चित ही बड़ी सहायक होगी । एकदम अछूते विषयों और क्षेत्रों में काम करने की अपनी अलग चुनौती होती है, सामग्री का अभाव बड़ी समस्या है। ऐसे में हमने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए यथाशक्ति कोशिश की कि ह...

जो प्रेम करते हैं

जो प्रेम करते हैं। जो प्रेम करते हैं उनकी आखों में होते हैं कई कई रंग वो गाते हैं अमरता का गान जीते हैं हर क्षण को किसी उत्सव की तरह। जो प्रेम करते हैं बेफिक्री उनकी आदत होती है उन्हें बोलने के लिए किसी भाषा की जरूरत न के बराबर होती है प्रेम के दिन अक्सर होते हैं वसंत की तरह। जो प्रेम करते हैं वो अक्सर होते हैं औरों से बेखबर वो दुनियां की सबसे अनोखी चीज़ में सुगंध बटोरते रहते हैं सारी दुनियादारी उनके लिए होती है व्यर्थ नाटक की तरह। जो प्रेम करते हैं वे इतिहास के जंगल में पुराने पन्नों की गंध की तरह या कि पोखर के तल की मिट्टी की तरह होते हैं होने न होने के तमाम षड्यंत्रों के बावजूद भी । प्रेम में पगी तरसती आखों का जल किसी प्रेमी की तरह किसी के इशारे पर किसी की यादों में कैद रहता है किसी निरपराध कैदी की तरह।                 डॉ मनीष कुमार मिश्रा                   कल्याण , महाराष्ट्र 

38. तुम्हारी स्मृतियों से ।

  यह जो मेरी मनोभूमि है लबालब भरी हुई तुम्हारी स्मृतियों से यहां रुपहली बर्फ़ पर प्रतिध्वनियां उन लालसाओं को विस्तार देती हैं जो की अधूरी रहीं । ये रोपती हैं जीवन राग के साथ गुमसुम सी यादें लांघते हुए उस समय को कि जिसकी प्रांजल हँसी समाई हुई है मेरे अंदर बहुत गहरे में कहीं पर । इस घनघोर एकांत में उजाड़ मौसमों के बीच बहुत कुछ ओझल हो गया तो बहुत कुछ गर्क। विस्मृतियों के ध्वंस का गुबार इन स्याह रातों में रोशनदान से अब भी झांकते हैं मुझे और मैं ऐसी दुश्वारियों के बीच डूबा रहता हूं अपना ही निषेध करते हुए उन बातों में जो तुम कह चुकी हो । मैं शिलाआें सा जड़ नहीं होना चाहता इसलिए लगा रहता हूं हंसने की जद्दोजहद में भी लेकिन मेरा चेहरा गोया कोई ना पढ़ी जा सकनेवाली किसी इबारत की तरह बिलकुल नहीं है । ऐसे में सोचता हूं कि विपदाओं की इस बारिश में पीड़ाओं के बीच कोई पुल बनाऊं ताकि साझा कर सकूं पीड़ाओं से भरी चुप्पियां । इन चुप्पियों में कठिन पर कई जरूरी प्रश्न हैं जिनका अभिलेखों में संरक्षित होना ज़रूरी है वैसे भी प्रेम में लोच बहुत ज़रूरी है। फिर इसी बहाने तुम याद आती रहोगी पूरे वेग से और एक उपा...

हिंदी ब्लॉगर श्री रवि रतलामी जी हमारे बीच नहीं रहे।

 जाने माने हिंदी ब्लॉगर श्री रवि रतलामी जी हमारे बीच नहीं रहे। ईश्वर चरणों में प्रार्थना है कि वो पुण्य आत्मा को शान्ति प्रदान करें। सन 2011 में हिंदी ब्लॉगिंग पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित कर रहा था। विषय नया था अतः उत्साह और भय का एक अलग  रोमांच हो रहा था। उस समय इस संगोष्ठी को सफल बनाने में श्री रवि रतलामी जी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। आप स्वयं भी इस संगोष्ठी में उपस्थित रहे। रवि रतलामी जी की पावन स्मृतियों को प्रणाम ।

उज़्बेकिस्तान में हिन्दी प्रचार-प्रसार की स्थिति

  उज्बेकिस्तान में हिंदी के वैश्विक प्रचार- प्रसार को लेकर ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जो हमें खुश कर सके । हिंदी के वैश्विक रूप के संदर्भ में ये दरअसल हमारे देखे हुए ख्वाब हैं जिसे उज़्बेकिस्तान और भारत के लोग मिलकर साकार कर रहे हैं । हिंदी उज़्बेकी के रिश्ते का नयापन और उनकी भाषायी कशीदाकारी का यह जाल एक ऐसे ताने-बाने को बुन रहा है जो दोनों देशों के हित में है । दोनों तरफ के साहित्यिक विद्वान जिस तरह आदान-प्रदान के कार्य में अनुवाद के माध्यम से लगे हुए हैं, उसमें यह निश्चित कर पाना बड़ा मुश्किल सा लगता है कि कौन किसका ज्यादा मुरीद है । ऐसा लगता है कि एक दूसरे की भाषा के जादू में सम्मोहित होने की हद तक काम हो रहा है । यह फैलाव और प्रभाव निश्चित तौर पर भविष्य में एक नई दिशा का आगाज होगा । पसर जानेवाली मुस्कान की तरह हिंदी उज़्बेकियों के दिल को छू रही है और भाषा के स्तर पर इन दोनों ही देश में अभी एक-दूसरे को आजमाने की बहुत गुंजाइश है । इन दोनों देश के लोगों के बीच की स्वभावगत उदारता और किरदार का बड़प्पन इन्हें बेहतरीन की तलाश में एक साथ लाया है । हिन्दी प्रचार-प्रसार की दृष्टि से उज़्बेकिस्...