मेरी यादों से जब भी मिली होगी वो अंदर ही अंदर खिली होगी . सब के सवालों के बीच में , वह बनी एक पहेली होगी . यंहा में हूँ तनहा-तनहा , वंहा छत पे वो भी अकेली होगी . सूने से खाली रास्तों पे , वह अकेले ही मीलों चली होगी . यूँ बाहर से खामोश है मगर, उसके अंदर एक चंचल तितली होगी . जो जला डी गयी बड़ी बेरहमी से, वो बेटी भी नाजों से पली होगी .
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।