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अप्रैल, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मराठी भाषा में राष्ट्रीय गौरव

              मराठी भाषा की बात करें तो 1188 ई. के आस-पास नाथपंथीय मुकुंदराज के ‘ विवेकसिंधु ’ की चर्चा सबसे पहले होती है , जो अद्वैत भक्ति से संबन्धित है । इन्हें मराठी का आदिकवि भी माना जाता है । 1128 से 1200 ई. के बीच इनका जीवनकाल माना जाता है । "विवेकसिंधु" और "परमामृत" नामक इनके दो ग्रंथों की चर्चा मिलती है ।   ज्ञानेश्वर की ‘ ज्ञानेश्वरी ’ को कैसे भुलाया जा सकता है ? जो कि 1290 ई. के आस-पास की रचना मानी जाती है । कृष्ण पर केंद्रित वामन पंडित की रचना यथार्थदीपिका भी बहुत महत्वपूर्ण है । नारायनदास कृत ‘ नारायण किर्ति ’ और रत्नाकर कृत ‘ रत्नाकर ’ भी महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं । मुगलकाल के संत एकनाथ के साहित्य से सभी परिचित हैं । रामायण पर केंद्रित सबसे अधिक ग्रंथ बांग्ला और मराठी में लिखे गये हैं । कवि गिरिधर के सात अलग संस्करण , माधव स्वामी का एक और मोरेश्वर रामचंद्र पराड़कर / मोरोपंत (1729-1794) के 108 संस्करण की बात अद्भुद हैं । वैसे मोरेश्वर रामचंद्र पराड़कर / मोरोपंत के लिखे 94-95 संस्करण मिलते हैं । ...

भारतीय क्षेत्रीय साहित्य

           भारतीय क्षेत्रीय साहित्य किसी एक मूल तत्व को लेकर सबसे अधिक आंदोलित भक्तिकाल में दिखाई पड़ता है । सभी सगुण-निर्गुण संतों ने मानवता को जीवन के सबसे बड़े सत्य के रूप में स्वीकार किया है । आसाम में शंकरदेव , बंगाल में चंडीदास , उत्तर में सूरदास , तुलसीदास , कबीर और मीराबाई इत्यादि । कर्नाटक में पुरंदरदास , तमिलनाडु में कंबन , चेरुशशेरी केरला में , त्यागराज आंध्रा , तुकाराम महाराष्ट्र , नरसी मेहता गुजरात और बलरामदास उड़ीसा में इसी मानवीय भाव के गीत गा रहे थे । इनके पहले के रासो ग्रंथ , आल्हा गीत , पोवाड़ा इत्यादि के अंदर भी ऐसे ही राष्ट्रीय भाव थे । ठीक इसी तरह आगे चलकर पूरा भारत एक स्वर में आज़ादी के तराने बुन रहा था । नवीनचंद्र सेन द्वारा लिखित ‘ बैटल ऑफ प्लासी ’ का हिंदी अनुवाद मैथिलीशरण गुप्त ने किया । काजी नज़रुल इस्लाम ने हिंदी में ‘ अग्निवीणा ’ लिखी । ऐसे कई रचनाकार रहे जिन्होंने क्षेत्रीय दायरे में अपने को समेटे नहीं रक्खा । कन्नड के पुटप्पा , गुजराती के नर्मदाशंकर दवे , असमिया के अंबिकागिरी रामचौधरी और सावरकर ,...

डॉ रमेश पोखरियाल निशंक के कहानी संग्रह पर चर्चा

 

मालेगांव सिनेमा

 
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फ़िल्म रूपांतरण : संदिग्ध सकारात्मक अतिक्रमण ।

     फ़िल्म रूपांतरण : संदिग्ध सकारात्मक अतिक्रमण ।             शाब्दिक दृष्टि से देखें तो “रूपांतरण” शब्द ‘ रूप ’ और ‘ अंतरण ’ इन दो शब्दों की संधि से बना है । रूपांतरण के लिए पर्यायवाची रूप में अनुकूलन एवं समायोजन जैसे शब्द भी   प्रचलित हैं । रूपांतरण   / अनुकूलन ( Adaptation ) अपने आप में एक जटिल एवं समस्यापूर्ण प्रक्रिया है । किसी कृति का एक विधा से दूसरी विधा के रूप में परिवर्तन अक्सर कतिपय आशंकाओं को जगाता है । ऐसा इसलिए क्योंकि रूपांतरण की प्रक्रिया में पहले का कुछ छूट जाता है तो नए रूप में कुछ नया जुड़ भी जाता है । इस संदर्भ में जो शुरुआती अकादमिक बहसें हुई वो इस बात पर केन्द्रित रहीं हैं कि हर विधा विशेष को पसंद करने वाले लोग अलग – अलग होते हैं । जब हम कोई ‘ पाठ ’ या ‘ कथा ’ पढ़ते हैं तो हमारी विचारशीलता , तर्कशीलता इत्यादि के लिए अत्यधिक स्वतंत्रता होती है । शायद यही कारण है कि एक ही कृति के संदर्भ में समीक्षकों की अलग-अलग राय हमें मिलती है ।          ...

फिल्म रूपांतरण पर शोध आलेख प्रकाशित ।

 

शोध विविधा

 

पूर्वोत्तर भारत के सिक्किम राज्य से प्रकाशित होने वाली पत्रिका *कंचनजंघा* का अंक-2

 पूर्वोत्तर भारत के सिक्किम राज्य से प्रकाशित होने वाली पत्रिका *कंचनजंघा* का अंक-2 आपके समक्ष प्रस्तुत है। 379 पृष्ठों के इस अंक में कुल 55 लेखकों की रचनाशीलता को संकलित किया गया है। *अधिकतम रचनाएं/लेख पूर्वोत्तर भारत की भाषा, साहित्य एवं संस्कृति पर केंद्रित है।*  इस अंक की सार्थकता व गुणवत्ता का मूल्यांकन आप जैसे सुधि पाठक ही करेंगे। पत्रिका पर आपकी बहुमूल्य टिप्पणी अपेक्षित है।अवलोकन हेतु लिंक- *http://www.kanchanjangha.in* सादर! डॉ. प्रदीप त्रिपाठी (संपादक कंचनजंघा)