मराठी भाषा की बात करें तो 1188 ई. के आस-पास नाथपंथीय मुकुंदराज के ‘ विवेकसिंधु ’ की चर्चा सबसे पहले होती है , जो अद्वैत भक्ति से संबन्धित है । इन्हें मराठी का आदिकवि भी माना जाता है । 1128 से 1200 ई. के बीच इनका जीवनकाल माना जाता है । "विवेकसिंधु" और "परमामृत" नामक इनके दो ग्रंथों की चर्चा मिलती है । ज्ञानेश्वर की ‘ ज्ञानेश्वरी ’ को कैसे भुलाया जा सकता है ? जो कि 1290 ई. के आस-पास की रचना मानी जाती है । कृष्ण पर केंद्रित वामन पंडित की रचना यथार्थदीपिका भी बहुत महत्वपूर्ण है । नारायनदास कृत ‘ नारायण किर्ति ’ और रत्नाकर कृत ‘ रत्नाकर ’ भी महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं । मुगलकाल के संत एकनाथ के साहित्य से सभी परिचित हैं । रामायण पर केंद्रित सबसे अधिक ग्रंथ बांग्ला और मराठी में लिखे गये हैं । कवि गिरिधर के सात अलग संस्करण , माधव स्वामी का एक और मोरेश्वर रामचंद्र पराड़कर / मोरोपंत (1729-1794) के 108 संस्करण की बात अद्भुद हैं । वैसे मोरेश्वर रामचंद्र पराड़कर / मोरोपंत के लिखे 94-95 संस्करण मिलते हैं । ...
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।