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मई, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्यार मेरा मुझे देख के चौंका , बड़ी अदा से फिर उसने पूंछा ;

प्यार मेरा मुझे देख के चौंका , बड़ी अदा से फिर उसने पूंछा ; कौन है तू क्या तेरा परिचय , क्या इच्छा है तेरी रहबर ; मुंह से निकला मै परछाई हूँ तेरी ,तेरे दिल की प्यास ; न मानेगा इसको तू पर मै हूँ तेरा अहसास /

Birthday wish

This is written to wish someone who care`s a lot. ----------------------------------------------------- The birthday of a beautiful person, who is of caring incursion ; a lady of honest desires , very lovely and poious; a strong character of good intent, upright who believe in consents ; wishing her smile become wider , laugh following the laughter ; happiness roam around , peace & joy with no bound ; wishing your desires come true , dreams you can live ; year full of event you can savour , all the happiness & moments you favour ; HAPPY BIRTHDAY ------------------------------------------------------

कभी इठला के दिल चुराया ,

कभी इठला के दिल चुराया , कभी शरमा के बदन ; इन्तहा तब हो गयी , ढरकता पल्लू औ कहा हमदम /

कहीं गुम था वो पल कहीं खोया हुआ था ,

कहीं गुम था वो पल कहीं खोया हुआ था , कितनी हसरते थी उसमे गम से पिरोया हुआ था ; कशिश जीने की थी तपिश होने की थी ; उलझा था नफरतों में बहकती हकीकतें थी ; कहीं गुम था वो पल कहीं खोया हुआ था , कितनी हसरते थी उसमे गम से पिरोया हुआ था ; चाह थी स्वातंत्र्य की बड़ती प्यास थी प्यार की ; बंधन में जकड़ा था भीड़ से परे अकेला था दहकता ख्वाब था सिमटता आकाश था ; विशाल मत था छिद्र से रिसता मन था , कहीं गुम था वो पल कहीं खोया हुआ था , कितनी हसरते थी उसमे गम से पिरोया हुआ था ;

abhilasha-1001

देखी जो तस्वीर तेरी                                                                               अभिलाषा को पंख मिल गए .                                                                              बची नहीं अब कोई ख्वाइश ,                                                                            इस जीवन में मेरी प्रिये .   (i do nat have any copy right on this image.i have got the same as a e mail )   ...

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''आनर किलिंग'' बंद करो गदहों !!!!/Honour Killings in India

''आनर किलिंग'' बंद करो गदहों !!!!             पिछले कई दिनों से दिल में आग लगी हुई थी . समाचार पत्रों और मीडिया चैनलों के माध्यम से देश भर में मध्यम वर्गीय परिवारों के बीच ''आनर किलिंग '' क़ी खबरें खून में उबाल ला रही थीं .          अपने ही बेटे-बेटी क़ी निर्ममता पूर्वक हत्या सिर्फ इस लिए कर देना  क्योंकि वह प्यार करता है या करती है , इसे सही कहने वाले निकम्मों और नालायकों को क्या कहूं ?               मध्यवर्ग जैसा स्वार्थी,लोभी ,भीरु ,मौकापरस्त और झूठा कोई और हो ही नहीं सकता . झूठी शानो-शौकत के लिए यह वर्ग मानवता का भी खून कर सकता है . शर्म आती है अपने आप पर यह सोच कर क़ि मैं भी इसी समाज का एक हिस्सा हूँ. यह बात दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए भी शर्म की ही है . राधा-कृष्ण को पूजने वाला यह देश किस गर्त में जा रहा है ?             मैं सभी लोगों से हाथ जोड़ के यही विनती करना चाहता हूँ क़ि ,''समाज,परम्परा ,...

ओम प्रकश पांडे''नमन'' जी अब हिंदी ब्लागिंग क़ी दुनिया से जोड़े जा चुके हैं .

हिंदी ब्लागिंग करने के साथ-साथ हमारी एक कोशिस यह भी रहती है क़ि हम हिंदी से जुड़े अच्छे और सजग रचनाकारों को भी इस प्रक्रिया से जोड़ें .  इसी कड़ी में भाई ओम प्रकश पांडे''नमन''  जी अब हिंदी ब्लागिंग क़ी दुनिया से जोड़े जा चुके हैं . आप उनके ब्लॉग http://namanbatkahi.blogspot.com/2010/05/blog-post.हटमल पर जाकर उनके विचारो से अवगत हो सकते हैं.     मुझे पूरा विश्वाश है क़ि आप को उनका ब्लॉग जरूर पसंद आएगा . नमन क़ी बतकही में सहमति का साहस और असहमति का विवेक आप को हमेशा दिखाई देगा .  उन्ही क़ी एक कविता आप लोगों के लिए    भले बाँट दो तुम हमें सरहदों में     भले बाँट दो तुम हमें मजहबों में     भले खीँच दो तुम लकीरें जमीं पर     नहीं बाँट पाओगे दिल को हदों में !     नहीं बाँट पाओगे तुम इन गुलों को      यहाँ भी खिलेंगे वहां भी खिलेंगे     नहीं बाँट पाओगे तुम चाँद तारे     य...

तू आज कौन है मेरा भले कभी तू मेरा महबूब था ?

मेरे आहत मन से बने ,मेरी तल्ख़ आवाज से बुने , मेरे सवालों पे बड़ी शालीनता से पूंछा तेरा सवाल खूब था ; तू आज कौन है मेरा भले कभी तू मेरा महबूब था ? न ही आज तू मेरे किसी काम न आज तेरा कोई रसूख था , आज मेरे खैरख्वाह हैं बहुत, क्या तेरा वक़्त तेरे करीब था ? आवाक था , पर उसका ये सवाल भी मुझे अजीज था ; मेरे आहत मन से बने ,मेरी तल्ख़ आवाज से बुने , मेरे सवालों पे तेरा बड़ी शालीनता से पूंछा सवाल खूब था ; तू आज कौन है मेरा भले कभी तू मेरा महबूब था ? मुस्कराते आंसुओं से उसको दी दुवाएं और रुखसत हुआ राहों में उदासियों ने संबल और काटों ने सुकून दिया , मेरी दिल की धड़कन आज मै अपना ही अतीत था ; मेरे जनाजे को रौंदा उसने जों मेरा सबसे करीब था / मेरे आहत मन से बने ,मेरी तल्ख़ आवाज से बुने , मेरे सवालों पे बड़ी शालीनता से पूंछा तेरा सवाल खूब था ; तू आज कौन है मेरा भले कभी तू मेरा महबूब था ?

मेरा दिल है बावरा तेरी मुलाकात के लिए ,

मेरा दिल है बावरा तेरी मुलाकात के लिए , सिने में जलती मशाल है तेरे प्यार के लिए ; सोचों में दिन गुजरा यादों में रात , मेरी आखें सुनी है तेरे इक ख्वाब के लिए /

हवाओं से बात करता रहा मैं /

हवाओं से बात करता रहा मैं ; आखें बिछा रखी थी राहों में , आसमान ताकता रहा मैं ; कान तरसते रहे चन्द बोल उनके सुने , काटों बीच खुसबू तलाशता रहा मैं ; सुबह फिजाओं से हाल उनका पूंछा , भोर की किरणों में उनको पुकारता रहा मैं / हवाओं से बात करता रहा मैं ;

झुके कंधे आँखों में आंसू लिए ,

झुके कंधे आँखों में आंसू लिए , खड़ा एक कोने में चेहरे पे उदासी लिए , इंतजार अब भी है उसको की वो पलट आएगा , क्या जानता था वो की उसका प्यार बदल जायेगा / दबी हुई आशाओं से अब लड़ पड़ता है वो ; क्या पता था की निराशाओं से ना लड़ पायेगा / झुके कंधे आँखों में आंसू लिए , खड़ा एक कोने में चेहरे पे उदासी लिए , उस दिल को कभी मोहब्बत सिखाया था उसने , उस हंसी के इश्क से दिल के हर कोने को सजाया था उसने ; उस गुदाज बदन को कभी भावों से संवारा था उसने , क्या जानता था वो अनजान बन यूँ ही निकल जायेगा , क्या जानता था उसके दिल में पत्थर भी बसाया था उसने ; झुके कंधे आँखों में आंसू लिए , खड़ा एक कोने में चेहरे पे उदासी लिए /

अमरकांत का प्रकीर्ण साहित्य

अमरकांत का प्रकीर्ण साहित्य :-        अमरकांत ने गंभीर कहानियों एवम् उपन्यासों के अतिरिक्त कुछ बाल साहित्य तथा प्रौढ नवसाक्षर लोगों के लिए भी कुछ छोटी-छोटी पुस्तकें लिखी हैं। उन्हीं में से कुछ का हम यहाँ संक्षेप में परिचय प्राप्त करेंगे। 1) झगरू लाल का फैसला :-        'कृतिकार` प्रकाशन द्वारा 1997 में प्रकाशित 23 पृष्ठों की यह पुस्तक बढ़ती जनसंख्या की समस्या को लेकर लिखी गयी है। यह पुस्तक कराड़ों साधारण लोगों के बीच परिवार कल्याण की योजनाओं को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से लिखी गयी है।        इसमें झगरू और मगरूलाल नामक दो भाईयों की कहानी है जो पिता की मृत्यु के उपरांत अलग हो जाते हैं। झगरू अपना परिवार बढ़ाता जाता है जिसके कारण आर्थिक संकटों में फसा रहता है। मगरू और उसकी पत्नी परिवार नियोजन के उपयों को अपनाते हैं और दो से अधिक बच्चे नहीं होने देते। इस कारण वे झगरू की अपेक्षा अधिक अच्छा जीवन यापन करते हैं।        पुस्तक का संदेश यही है कि हमे...

कुछ यादें कुछ बातें/amerkant

कुछ यादें कुछ बातें :-        कहानियों एवम् उपन्यासों के अतिरिक्त अमरकांत द्वारा लिखी गयी यह एकमात्र संस्मरणात्मक पुस्तक है। 147 पृष्ठों की इस पुस्तक का प्रकाशन 'राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.` द्वारा सन् 2005 में हुआ।        इस पुस्तक में अमरकांत में कई साक्षात्कारों, समय-समय पर छपे आलेखों एवम् संस्मरणों को संकलित किया गया है। अमरकांत के व्यक्तित्व एवम् साहित्यिक यात्रा को समझने में यह पुस्तक बड़ी ही सहायक है। इसमें अमरकांत के बचपन से लेकर सफल साहित्यकार बनने तक की सारी बातों का बड़े ही रोचक तरीके से वर्णन किया गया है।        इसके अतिरिक्त रामविलास शर्मा, प्रकाशचन्द गुप्त, अमृतराय, रांगेय राघव, नामवर सिंह, मार्कण्डेय, शेखर जोशी, डॉ. जगदीश गुप्त जैसे कई साहित्यकारों एवम् समीक्षकों से अपनी मुलाकातों का जिक्र अमरकांत ने विस्तार के साथ किया है। साथ ही साथ इनमें से कइयों के साहित्य एवम् विचारधारा के संदर्भ में अपना अभिमत भी अमरकांत ने व्यक्त किया है।     ...

लहरें -अमरकांत का नया उपन्यास /amerkant

लहरें -अमरकांत का नया उपन्यास  :-        अमरकांत का यह उपन्यास अभी पुस्तकाकार रूप में नहीं छपा है। इसका प्रकाशन कादम्बिनी पत्रिका के उपहार अंक-1 में अक्तूबर, 2005 में प्रकाशित हुआ। लेकिन यह उपन्यास, अमरकांत की कथा यात्रा का एक प्रमुख एवम् महत्वपूर्ण पड़ाव है। अत: अमरकांत के उपन्यासों की चर्चा मंे 'लहरें ` की चर्चा बड़ी आवश्यक है।        इस उपन्यास के संदर्भ में अमरकांत स्वयं लिखते हैं कि, ''इस दुनिया में स्त्री और पुरूष परस्पर विरोधी प्रतिस्पर्धी नहीं हैं। वे बनावट और प्रकृति में भिन्न होते हुए भी परस्पर सहयोगी, सहभागी एवम् संपूरक हैं। उनके मेल से ही एक संपूर्ण संसार बनता है और दूसरा नया संसार निर्मित होने की भूमिका तैयार होती है। स्पष्ट है कि किसी सामाजिक प्रगति या नये समाज के निर्माण में इनका परस्पर स्वैच्छिक, मनपसंद सहयोग एवं सहभागिता जरूरी है परंतु आज के भारतीय समाज में शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन जनतांत्रिक अधिकार, सुरक्षा, न्याय आदि के मामलों में स्त्रियों की प्राप्तियाँ वांछित अनुपात से...

सुन्नर पांडे की पतोह / amerkant

सुन्नर पांडे की पतोह :-        112 पृष्ठों का यह छोटा सा उपन्यास सन् 2005 में 'राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.` द्वारा प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास अपने पति द्वारा परिव्यक्त राजलक्ष्मी नामक स्त्री की कहानी है जो अपने ही ससुर की बुरी नीयत को ताड़कर घर छोड़कर निकल जाती है। घर से बाहर निकलकर वह समाज के नर-भेडियों से न केवल अपनी इज्जत की रक्षा करती है बल्कि कुछ ऐसे कार्य भी करती है जो उसके जैसी समाज की स्त्रियों के लिए एक सबक, एक प्रेरणा स्त्रोत का काम करता है।        रविवार दिनांक 27 नवंबर 1988 को 'जनसत्ता` में अमरकांत का एक साक्षात्कार छपा। उनसे यह साक्षात्कार कुमुद शर्मा ने लिया था। इस साक्षात्कार में उन्होंने बतलाया कि, ''जीवन की कई घटनाओं को देखने-सुनने से ही इस रचना को लिखने की प्रेरणा हुई थी। कभी एक कहानी लिखी थी 'सुहागिन` नाम से जो छपी नहीं। छपने के लिए कहीं भेजी ही नहीं। बाद में सोचा कि इस पर विस्तार से लिखना ठीक होगा। इसमें एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अशिक्षित है, जिसका पति उसे छोड़कर चला जाता है। ले...

अमरकांत का उपन्यास -इन्हीं हथियारों से

  अमरकांत का उपन्यास -इन्हीं हथियारों  से         'राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.` द्वारा सन् 2003 में प्रकाशित 536 पृष्ठों का यह उपन्यास, अमरकांत द्वारा लिखे गए अब तक के उपन्यासों में सबसे बडा है। साथ ही साथ इसका कथानक भी बाकी उपन्यासों से बिलकुल अलग है। 'सूखा पत्ता` के बाद अमरकांत के जिस उपन्यास की चर्चा सबसे ज्यादा हुई वह 'इन्हीं हथियारों से` है।        उपन्यास के आरंभ में उपन्यास के बारे में बताते हुए अमरकांत लिखते हैं कि, ''यह रचना उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से जनपद पर केंन्द्रित स्वाधीनता आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। सन् 1942 ई. में 'भारत छोड़ो` जनक्रान्ति के दौरान कुछ दिनों के लिए बलिया में ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया था। गाँवों में पंचायत सरकारें कायम हुई थी। परन्तु, यह ऐतिहासिक उपन्यास नहीं है, बल्कि उस आन्दोलन से जुड़े व्यक्तियों के निजी अनुभवों, ऐतिहासिक घटनाओं तथा बयालिस से लेकर स्वतंत्रता- प्राप्ति तक के समय की एक यथार्थवादी परिकल्पना है। वस्तुत: बलिया के बहाने, एक कल्पित ...

अमरकांत और निम्न मध्यमवर्गीय जीवन बोध

 अमरकांत और निम्न मध्यमवर्गीय जीवन बोध         अमरकांत ने अपने कथा साहित्य के माध्यम से निम्न मध्यमवर्गीय समाज का चित्रण अधिक किया है। अमरकांत हमेशा अपने परिवेश से जुड़े रहे और वास्तविक जीवन में जो कुछ देखा, समझा उसी को अपने साहित्य का विषय बनाया। इसी संदर्भ में शेखर जोशी लिखते हैं कि, ''आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य की विडम्बना यह रही की घोर पारम्परिक व्यवस्था में रहते हुए भी अनेकों कथाकार आधुनिकता के जोश में महानगर के खण्डित पारिवारिक सम्बन्धों पर झूटी रचनाएँ करने लगे जबकि अमरकांत ने अपनी रचनाओं के लिए वही भूमि चुनी जिसमें वे जी रहे थे। यही उनके जैनुइन होने का रहस्य है।``24 शायद यही कारण है कि अमरकांत निम्न मध्यवमवर्गीय समाज के अंदर व्याप्त लाचारी, परेशानी, तंगी, स्वार्थ, आदर्श, मोहभंग, दीनता और मनोवैज्ञानिक मानसिक स्थितियों को इतनी गंभीरता के साथ चित्रित करने में सफल हुए। व्यंग्य, निरीहता, पीड़ा, शोषण, विसंगतियां, चालाकी, कुटिलता और मूर्खता तथा गवारूपन जैसी अनेकों बातों के चित्रण मे अमरकांत को महारत हासिल है।  ...