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Friday, 12 April 2013

प्रेम विस्तार है

 प्रेम  विस्तार  है , स्वार्थ  संकुचन  है . इसलिए  प्रेम  जीवन  का  सिद्धांत  है . वह  जो  प्रेम  करता  है  जीता  है , वह  जो  स्वार्थी  है  मर  रहा  है .   इसलिए  प्रेम  के  लिए  प्रेम  करो , क्योंकि  जीने  का  यही  एक  मात्र  सिद्धांत  है , वैसे  ही  जैसे  कि  तुम  जीने  के  लिए  सांस  लेते  हो .

स्वामी विवेकानंद


                                                                                            

संविधान सभा की बहसों में शराब अनुच्छेद 47 की निर्मिति, निषेध-विमर्श, स्वतंत्रता, जनस्वास्थ्य और आदिवासी स्वायत्तता का ऐतिहासिक-संवैधानिक अध्ययन डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

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