लौटा है आज वो घर बरसों बाद , हर साल दो साल बाद , वो घर आता जरूर था ; पर लौटा है घर आज वो बरसों बाद / ख़त या इ मेल तो अपनो को करता था ; पर वो बस खोखले शब्दों का मायाजाल है मात्र / उसने अपने फ्लैट में गमले सजाएँ हैं ; कई छुट्टियाँ शहर के आस पास के पहाडों ,औ पर्यटन स्थल पे बिताएं हैं/ कहाँ पाया उसने गाँव की मिट्टी का अपनापन ! शहर की पार्टियों पर ,नेटवर्क की साइटों पर ,सैकडों मित्र, मैत्रिणी है उसकी , कहाँ पाया उसने ;बचपन के दोस्तों की निश्छलता ,अपनापन ; कैसे पाए अपने वो मचले दिन ? बचपन की लड़ाई ,वो कसक , उतावलापन ; लौटा है आज वो घर बरसों बाद / कभी फ़ोन ,कभी मोबाइल पे बात कर लिया करता था अपनो से , पर कहाँ पाए वो उष्मा दादी की गोद का , मामा की सोच का , चाचा की डांट का , पडोसी के दुलार का ; माँ की ममता का , पिता की कडाई का , दादा की रजाई का / बड़ा आदमी बन गया है अब वो , प्यार को कितना तरस गया है वो ; लौटा है आज वो घर बरसों बाद / बिस्तर माँ को जकडे पड़ा है ; पिता की आखों में खालीपन सा छुपा है ; बचपन का दोस्ताना ,अपनो का याराना कहीं खो सा गया है / भाई भाभी विस्मित है...