आजकल देखता हूँ तुम्हारे गले में ख़राश जादा हो गयी है । पर कमाल यह है कि ये कोई बिमारी नहीं तुम्हारी एक नई अदा है तुम्हारी बदमाशियों से भरे नए पाठ्यक्रम का नया सेमेस्टर । तुम्हारे गले की ख़राश कुछ उलझी हुई बातों को दरअसल साफ साफ सुनना चाह रही हैं पर मैं जानता हूँ प्यार में उलझना आसान है सुलझना नामुमकिन । इसलिए हम उलझने बढ़ा रहे हैं और तुम हो कि सब कुछ सुलझा देना चाहती हो थोड़ा तुम भी उलझने की कोशिश करो तुम देखोगी कि तब तुम्हारी ख़राश मेरे गले में होगी और तुम प्यार में । हम तो पैतरा खेल रहे थे सो बच के निकल लेंगे पर छोड़ जाएँगे मीठी यादों के साथ तुम्हारे ओठों पे मुस्कान । और फिर जब भी कंही जिक्र होगा तुम्हारा तो कुछ कहने से पहले मैं महसूस करूंगा कि गले की ख़राश बढ़ रही है ।
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।