यूं ही तुम्हे सोचते हुए सोचता हूँ क़ि चंद लकीरों से तेरा चेहरा बना दूं फिर उस चेहरे में , खूबसूरती के सारे रंग भर दूं . तुझे इसतरह बनाते और सवारते हुए , शायद खुद को बिखरने से रोक पाऊंगा पर जब भी कोशिश की , हर बार नाकाम रहा . कोई भी रंग , कोई भी तस्वीर , तेरे मुकाबले में टिक ही नहीं पाते . तुझसा , हू - ब - हू तुझ सा , तो बस तू है या फिर तेरा अक्स है जो मेरी आँखों में बसा है . वो अक्स जिसमे प्यार के रंग हैं रिश्तों की रंगोली है कुछ जागते - बुझते सपने हैं दबी हुई सी कुछ बेचैनी है और इन सब के साथ , थोड़ी हवस भी है . इन आँखों में ही तू है तेरा ख़्वाब है तेरी उम्मीद है तेरा जिस्म है और हैं वो ख्वाहीशें , जो तेरे बाद तेरी अमानत के तौर पे मेरे पास ही रह गयी हैं . मैं जानता हूँ की मेरी ख्वाहिशें , अब किसी और की जिन्दगी है . इस कारण अब इन ख्वाहिश...
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।