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अपने देश की आजादी

६२ साल की बूढी हो गयी, अपने देश की आजादी । हाल मगर बेहाल रहा, जनता रह गयी ठगी प्रिये । भूख-गरीबी-लाचारी, अब भी हमको जकडे है फसा इन्ही के चंगुल में, देखो पूरा देश प्रिये । हर आँख के आंसू पोछ्नेवाला, सपना ना जाने कँहा गया ? खून के आंसू रोने को, सब जन हैं मजबूर प्रिये । गिद्धों के सम्मलेन में, गो-रक्षा पे चर्चा है। नही-नही जंगल में नही , संसद की यह बात प्रिये । अपने देश में आने से, खुशियों ने इनकार किया । दुःख की ही अगवानी में, बीते इतने साल प्रिये । लोकतंत्र के तंत्र-मन्त्र में, चिथडा-चिथडा जनतंत्र हुआ । रक्षक ही भक्षक बनकर, नोच रहे यह देश प्रिये ।...