अजीब सी आदत से परेशान हूँ तुम्हे सोच -सोचकर हैरान हूँ जो था,वो सब कुछ तुम्हे दे दिया, अब बाजार क़ी एक बंद दुकान हूँ . अब भी बहुत याद आती हो तुम, सोचो तो , कितना नादान हूँ . अकेला हूँ, आज इस वलेंटाइन डे पर , क्योंकि अब भी तेरा ही सामान हूँ .
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।