यह नया साल तुम्हारे बिना आकार मेरे दरवाजे पे खड़ा हो गया है । उसका दावा है कि उसके पास मेरे लिए नई उम्मीद नई खुशियाँ और बहुत कुछ ऐसा है जो सतरंगी सपनों की तरह मेरी दुनियाँ बदल के रख देगा । अब तुम्ही बताओ मैं इसे कैसे समझाऊँ कि तुम्हारे बिना मेरी ज़िंदगी में कोई साल कभी भी शामिल नहीं हो सकता ।
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।