जो कहनी थी , वही मैं बात , यारों भूल जाता हूँ किसी क़ी झील सी आँखों में , जब भी डूब जाता हूँ नहीं मैं आसमाँ का हूँ , कोई तारा मगर सुन लो किसी के प्यार के खातिर , मैं अक्सर टूट जाता हूँ शिकायत सब से है लेकिन , किसी से कह नहीं सकता बहुत गुस्सा जो आता है , तो खुद से रूठ जाता हूँ किसी क़ी राह का कांटा , कभी मैं बन नहीं सकता इसी कारण से मफिल में , अकेला छूट जाता हूँ मासूम से सपनों क़ी मिट्टी , का घड़ा हूँ मैं , नफरत क़ी बातों से , हमेशा फूट जाता हूँ .
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।