ये रात कैसे बीतेगी ? लाइट चली गयी है और बिस्तर पर पसीने से तर – बतर पड़ा हुआ हूं ।बड़ी ख़ामोशी से अपनी तनहाई से लड़ रहा था । लेकिन थक गया , शरीर में जैसे जान ही नहीं बची । जान तो अटकी हुई है उसकी हाँ या ना में , या शायद हाँ और ना दोनों के ही डर में । लगभग 13 – 14 सालों की उलझन और इंतजार के बाद , आज दो टूक पूछ लिया । लेकिन पूरा शरीर जैसे निचुड़ सा गया है । सांसें गर्म और धड़कन तेज़ । ज़िंदगी ख़ुद जैसे एक बीमारी हो और इश्क़ इस बीमारी की जड़ । फ़िर काहे का इश्क़ ? अपनी बकैती ही साली .......... अजीब सा डर और घबराहट है । क्या पिछला सब ख़त्म हो जाएगा ? क्या वो कुछ बोलेगी ? क्या अब कभी नहीं बोलेगी ? और बोलेगी तो क्या होगा ? क्या मैं कर पाऊँगा ? उफ़ !!! सर भारी हुआ जा रहा है । लग रहा है जैसे कोई सर में खीलें ठोक रहा हो , मैं जितना चिल्लाऊँ वह उतनी ही ज़ोर से हथौड़ा मेरे सर पर मारे । रात के दो बजे हैं , बाहर अजीब सा सन्नाटा है। बाहर जितना सन्नाटा है अंदर उतना ही ...
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।