अरुणोदित किरणे सहमी सी मुस्कान लिए , मद्धिम हवा के झोंके इक अनोखी शान लिए , पत्तों पे ओस की बुँदे एक सुनहरा भान लिए , पक्षी के कलरव भौरों की गूंज महकी धरती संज्ञान लिए , एक सहज सी शांति थी फैली इश्वर है कण कण में ज्ञान लिए , चीत्कारा जंगल गाडिओं की आवाजें भोपूं के सीत्कार लिए , सन्नाटा फैला नीरवता छाई स्तब्ध शमा आक्रांत लिए , अरुणोदित किरणे सहमी सी मुस्कान लिए ,
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।