Friday, 5 June 2009
फरिश्तों का नसीब कहाँ की इन्सान का गुन पाए ;
फरिश्तों का नसीब कहाँ की इन्सान का गुन पाए ;
इन्सान खुदा की चाहत है ,वो फरिस्ता क्यूँ बन जाए ;
आसमान सजदा करता है जमीं की धुल का हरदम ,
बिखरे कितना भी, अपनी पहचान कहाँ से वो पाए ?
जो सिर्फ़ अपनी ही कहते हैं ,वो प्यार का जज्बा क्या जाने ,
इश्क नही उनके बस का जो जान संजोते रहते हैं ;
चाँद की किस्मत फूटी है ,पपीहे को ना सुन पाए ;
पथरीली मिटटी क्या जाने ,फूलों की खुसबू किसको कहते हैं /
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हिन्दी कविता hindi poetry
[ बादलों की प्यास हूँ मै ,
जो पूरी न हुयी ,वो आस हूँ मै ;
फूलों की घाटी का ,
दल से बिछडा गुलाब हूँ मै ;
सुबह का पूरा न हुवा ;
वो अधुरा ख्वाब हूँ मै / ]====
{ तजुर्बा उम्र का है या उम्र तजुर्बे की ?
कैसे कहें की बात सच की है या सपने की ?
जो दिया जिंदगी ने समेट लिया ,
जो कहा अपनो ने सहेज लिया /
रास्ते कहाँ जायेंगे जानता नहीं हूँ मै;
खुदा की राह है,मंजिल तलाशता नहीं हूँ मै / }
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( मेरी मोहब्बत से मुझको शिकायत है ,
ऐसे न कर सका की उनको भी आहट हो / )
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pathriiliimittii par nagfanii hi ugaa karte hai.
ReplyDeleteho sake to meri nai kahani awashya padhe
pathriilii mittii par nagfanii hi ugaa karte hai.
ReplyDeletemeri bhi nai kahanii awasya padhe