Tuesday, 23 February 2010

सच्चाई का जीना हितकर ,अच्छाई का जीना पुण्य है /

अनुदान की बेला जब आई , आख्यान हमेशा काम आई ;

दान की नीयत बन आई ,जब सम्मान की सूरत दिख पाई;

बिना किये जो मिल जाये ,वो सबको सुख कर होती है

है दौर दिखावे का ये लेकिन , अच्छाई कब खुद को खोती है ;

बंदिश से हो हासिल क्या , स्वतंत्रता से हो गाफिल क्या ?

बिना कर्म कब शांति मिली है ,वासनाओं से कब क्रांति मिली है /

देने से सुख कर कब क्या है ,लेने से दुःख कर कब क्या है ;

बंद हथेली लाख की अब भी ,खुली हथेली ख़ाक की है ;

बिना स्वार्थ के दान पुण्य है ,अपनो का मान पुण्य है /

सच्चाई का जीना हितकर ,अच्छाई का काम पुण्य है /

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