सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मीडिया और समाज

मीडिया और समाज **************************************

                                      मीडिया का मतलब या अर्थ अगर आप अब भी -माध्यम समझते हैं,तो  इसे आप क़ी नादानी ही नहीं भोलापन भी समझना होगा .आज हम और जिस समय में जी रहे हैं,वह समय पूँजी और मानवीयता के संघर्ष का समय है. आम आदमी इतना अधिक कमजोर ,मजबूर ,जकड़ा हुआ और भ्रमित है क़ि वह यह ही नहीं समझ पा रहा है क़ि वह क्या है ? कौन है ?क्यों है ? और किसका है ? उसकी पूरी क़ी-पूरी जिन्दगी एक अंधी दौड़ बन गई है . वह तो बस भाग रहा है,जब तक भाग सकता है भाग रहा है.जिस दिन वह भागते हुवे गिर जायेगा ,सभी उसे कुचलते हुवे आगे निकल जायेंगे . जाना कंहा है ?किसी को नहीं मालूम .
                                     आज से ८-९ साल पहले जब मैं इस तरह क़ी बात सोचता था,तो मुझे लगता था क़ी -हम भारतीय कितने पिछड़े हुवे हैं.हमे समय के साथ चलना नहीं आता . अपना विकास करना नहीं आता .हम लोग ईमोस्न्ल फूल हैं. हमे जिन्दगी में प्रेक्टिकल होना चाहिए. पैसा कमाना चाहिए.सबसे आगे रहना चाहिए. ये धर्म और दर्शन क़ी बातों से कुछ नहीं होता.लेकिन आज जब इन सब बातों पे सोचता हूँ,आज के हालात देखता हूँ तो अपनी गलती का एहसास हो जाता है. बाजारवाद और मंडीकरन क़ी इस दुनिया ने रिश्तों क़ी कीमत का एहसास करा दिया. जीवन में संतुष्टि का महत्व समझा दिया. साथ ही साथ अपने धर्म और दर्शन के प्रति सम्मान भी इसी बाजारवाद ने ही मुझे समझाया .हमसब आज जिस तनाव और स्पर्धा के युग में जी रहे हैं,उससे बचने के सभी रास्ते भारतीय धर्म और दर्शन में है.बात सिर्फ इतनी सी है क़ी हम इस बात को समझने में वक्त कितना लेते हैं.
                                अपनों से दूर अकेले किसी शहर में लाखों के पैकेज पे काम करने वाले लगभग सभी दोस्त कहते हैं क़ि-''-कुत्ता बना के रख दिया है यार.इतना तनाव रहता है क़ि क्या बताऊँ .पैसा है लेकिन उसका करना क्या है .बस कमाओ और उडाओ,यही जिन्दगी बन गई है .कोई सोसल लाइफ नहीं रह गई है.अलग ही दुनिया है .''इन  सब बातों को सुनता हूँ तो समझ में आता है क़ि जिन्दगी वो नहीं है जो आज कल  सभी तरह के विज्ञापनों के माध्यम से प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है .इसमें मुख्य भूमिका निभाने वाली मीडिया आज सिर्फ माध्यम नहीं रह गई है,बल्कि वो हमारा ही एक विस्तृत अंग बन गई है.वो हमारा एक ऐसा हिस्सा बन गई है ,जिसे हम चाहें तो भी अपने से काट के अलग नहीं कर सकते.ऐसा हम कर भी नहीं सकते क्योंकि हम जिस समय में रह रहे हैं वह समय इन्मध्य्मिन के द्वारा नियंत्रित और व्यवस्थित किया जा रहा है.हमारी सोच और समझ पर इन माध्यमों का हमसे जादा ध्यान है. अपने निर्णय हमे लेन हैं लेकिन विकल्पों क़ि सूची ये माध्यम प्रदान करेंगे .साथ ही साथ हमारे लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा यह भी वे ही हमे बतायेंगे .हमे सिर्फ अपनी हैसियत के अनुसार किसी को चुन लेना है.वैसे यह चुनाव भी कितना हमारा होगा यह कहना मुश्किल है. 
                             किसी ने जिन्दगी क़ि परिभाषा देते हुए लिखा क़ि-''जिन्दगी विकल्पों के बीच से चुनाव का नाम है.''लेकिन आज हालत यह है क़ि -''जिन्दगी प्रायोजित और प्रचारित विकल्पों के बीच आर्थिक क्षमता का प्रदर्शन मात्र है.''हम ऐसी कठपुतली बन गए हैं क़ि जिसकी डोर बड़े-बड़े पूंजीपतियों के हाथ में है.मीडिया और इस मीडिया को चलाने वाला पैसा समाज के सरोंकारों से कोसों दूर जा चुका है. लाभ-हानि के गणित में मानवीयता क़ि कीमत कुछ नहीं है.संवेदनाएं मीडिया का हथियार हैं.मुनाफा कमाने का हथियार .इस मुनाफे के आगे कोई दूसरी बात मायने नहीं रखती. मूल्यों और कीमत क़ि लड़ाई में मानवीय मूल्यों का जो पतन हो रहा है,उसे जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना अच्छा है.
     

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Trafficking and india

Factbook on Global Sexual Exploitation India Trafficking As of February 1998, there were 200 Bangladeshi children and women awaiting repatriation in different Indian shelters. ("Boys, rescued in India while being smuggled to become jockeys in camel races," www.elsiglo.com, 19 February 1998) India, along with Thailand and the Philippines, has 1.3 million children in its sex-trade centers. The children come from relatively poorer areas and are trafficked to relatively richer ones. (Soma Wadhwa, "For sale childhood," Outlook, 1998) In cross border trafficking, India is a sending, receiving and transit nation. Receiving children from Bangladesh and Nepal and sending women and children to Middle Eastern nations is a daily occurrence. (Executive Director of SANLAAP, Indrani Sinha, Paper on Globaliation and Human Rights" India and Paksitan are the main destinations for children under 16 who are trafficked in south Asia. (Masako Iijima, "S. Asia ...

kathadesh on internet

साहित्य, संस्कृति और कला का समग्र मासिक कवि‍तायें 1.  मधुवेश: 2.  सेर्गेई एसेनिन: रूसी कविता का अमर लोकगायक : उमा         आलेख 3  हुसैन प्रसंग : प्रभु जोशी 4. सब कुछ पूछो यह मत पूछो आम आदमी कैसा है : अविनाश . उपन्‍यास वजह बेगानगी नहीं मालूम : विनोद कुमार श्रीवास्तव संस्मरण 5. अज्ञेय के तीन पत्र राजेन्द्र मिश्र के नाम कहानि‍यां 6. साक्षी : संजीव कुमार 7. नाइजीरियाई कहानी : नाम में क्या धरा है: काची ए. ओजुम्बा 8. अपने-अपने डर : नवरत्न पांडे 9. साड़ू : : हरदर्शन सहगल 10 सन् 1945 का एक रविवार :  प्रभाकर चौबे 11 तल-घर :  दीपक शर्मा 12 शहादत दिलाने वाले : सआदत हसन मंटो दलित प्रश्न 13. केरल में दलित, दलित आन्दोलन और दलित साहित्य : बजरंग बिहारी तिवारी रंगमंच 14. महाभोज की पहली प्रस्तुति :  देवेन्द्र राज अंकुर 15. लोक से सम्बन्धों की पड़ताल : हृषीकेश सुलभ प्रसंगवश व्यक्तिगत और राजन...

अमरकांत : संक्षिप्त जीवन वृत्त

       कथाकार अमरकांत : संवेदना और शिल्प   कथाकार अमरकांत पर शोध प्रबंध अध्याय - 1   क) अमरकांत : संक्षिप्त जीवन वृत्त 1. जन्म 2. परिवार 3. शिक्षा-दीक्षा 4. रहन-सहन और स्वभाव 5. सेवा मार्ग 6. संघर्ष 7. व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ 8. पुरस्कार एवम् सम्मान ख) अमरकांत : विचारधारा एवम् साहित्यिक दृष्टि 1. तरुण कवि के रूप में 2. साहित्यिक वातावरण 3. साहित्यिक प्रेरणा स्रोत 4. प्रभावित करने वाली विचार धाराएँ 5. कथा लेखन क) कहानी ख) उपन्यास 6. साहित्यिक दृष्टि  अमरकांत : संक्षिप्त जीवन वृत्त 1. जन्म :        उत्तर प्रदेश के सबसे पूर्वी जिले बलिया में एक तहसील है - 'रसड़ा`। इस रसड़ा तहसील के सुपरिचित गाँव 'नगरा` से सटा हुआ एक छोटा सा गाँव और है। यह गाँव है - 'भगमलपुर`। देखने में यह गाँव नगरा गाँव का टोला लगता है।        भगमलपुर गाँव...