हर लफ़्ज़ तिरे जिस्म की खुशबू में ढला
है
ये तर्ज़, ये
अन्दाज-ए-सुख़न हमसे चला है
अरमान हमें एक रहा हो तो कहें भी
क्या जाने, ये दिल
कितनी चिताओं में जला है
अब जैसा भी चाहें जिसे हालात बना दें
है यूँ कि कोई शख़्स बुरा है, न भला है।
1. भूमिका : स्वच्छंदतावाद की संकल्पना स्वच्छंदतावाद (Romanticism) अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विकसित एक सशक्त साहित्यिक, कलात्मक और...
No comments:
Post a Comment
Share Your Views on this..