हर लफ़्ज़ तिरे जिस्म की खुशबू में ढला
है
ये तर्ज़, ये
अन्दाज-ए-सुख़न हमसे चला है
अरमान हमें एक रहा हो तो कहें भी
क्या जाने, ये दिल
कितनी चिताओं में जला है
अब जैसा भी चाहें जिसे हालात बना दें
है यूँ कि कोई शख़्स बुरा है, न भला है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में गाली का स्वरूप और महत्व भाषा, लोक-संस्कृति, साहित्य और सामाजिक मनोविज्ञान के संदर्भ में एक अध्ययन डॉ. मनीष कुमार स...
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