Monday, 29 March 2010

बोध कथा १४ : मेहनत का पारस

बोध कथा १४ : मेहनत का पारस
*******************************************
                                किसी गाँव में एक संत स्वभाव का मोची रहता था. सब से प्रेम से मिलता और आदर पूर्वक व्यवहार कर्ता. गाँव में उस मोची क़ी सभी प्रशंशा करते.उस मोची क़ी प्रशंशा को सुकर एक बार एक महात्मा हिमालय से उसके पास आये. इतने बड़े महात्मा को अपने घर अतिथि के रूप मे पाकर वः मोची अपने को धन्य समझ रहा था. उसने उस महात्मा क़ी बहुत सेवा क़ी. जो कुछ भी उससे हो सकता वः सब उसने किया.
                           कई दिनों तक मोची के घर रहने के बाद,एक दिन वे महात्मा वापस हिमालय क़ी तरफ जाने को निकले.जाने से पहले उन्होंने अपने झोले से एक सफ़ेद पत्थर निकाल कर मोची को देते हुवे बोले,''हे भक्त,मैं तुम्हारी सेवा से खूब  प्रसन्न हूँ. यह पारस 
  पत्थर मैं तुम्हे इनाम के तौर पर देता हूँ.तुम इस पत्थर से लोहे को सोना बना सकते हो .''
                        उन महात्मा क़ी बात सुनकर उस मोची ने कहा  क़ि,'' महाराज,मैं मेहनत पे विश्वाश रखता हूँ.अपनी मेहनत से अपने परिवार का पेट पाल लेता हूँ.मुझे इस पत्थर क़ि जरूरत नहीं है.'' इस पर वे महात्मा बोले क़ि ,'' यह पत्थर मैंने घोर तपस्या से प्राप्त किया है. मैं इसे तुम्हारे पास छोड़ जाता हूँ. तुम चाहो तो इसे इस्तमाल कर लेना,अन्यथा मैं जब दुबारा आऊंगा तो मुझे लौटा देना .'' वह मोची इस बात पर तैयार हो गया.पत्थर आलमारी में रख वह महात्मा को छोड़ने के लिए गाँव क़ी सीमा तक उनके साथ ही रहा.
                             महात्मा  के चले जाने के बाद वह मोची फिर से अपनी दिन चर्या में लग गया.उस पारस पत्थर क़ी तो उसे याद ही नहीं रही. कई साल इसीतरह  बीत गए. एक दिन जब वह मोची पसीने से तरबतर कोई चप्पल बनाने का काम कर रहा था,तभी वही महात्मा   वंहा वापस आये. मोची क़ी वही दसा देख उन्हें बड़ा दुःख हुआ. उन्होंने जब पारस पत्थर के बारे में पूछा तो उस मोची ने आलमारी से उसे निकाल कर महात्मा को वापस कर दिया.
                          पारस  ले कर वे महात्मा बोले,''तुम मूर्ख हो.इतनी कीमती वास्तु पास रहते हुवे भी तुम इतनी जी तोड़ मेहनत कर रहे हो .'' महात्मा क़ी बात को सुन वह संत मोची विनम्रता से बोला ,''महात्मा जी ,जो बात मेहनत क़ी कमाई में है वो किसी और में नहीं. मेरे इस मेहनत के पसीने में किसी पारस पत्थर से अधिक शक्ति है.''इतना कहकर उस मोची ने जूते-चप्पल बनाने वाले लोहे के स्टैंड को अपने पसीने से भीगे माथे से जैसे ही लगाया,वह लोहे का स्टैंड सोने में बदल गया. यह चमत्कार देख वे महात्मा हतप्रभ रह गए.वे समझ गए क़ी यह मोची कोई साधारण व्यक्ति नहीं है.और वे महात्मा उस मोची  के पैरों में गिर पड़े. और बोले महाराज अपना परिचय दें .
                          महात्मा को उठाकर उस व्यक्ति ने खड़ा किया और बोला,''मुझे संत रैदास कहते हैं. याद रखना मेहनत का पारस ही वह पारस है जो लोहे को सोने में बदल सकता है. जिसे अपनी मेहनत पर भरोसा नहीं,वह जीवन में  कुछ भी हासिल नहीं कर सकता .'' 
                            संत रैदास क़ी बातों से वे बहुत प्रभावित हुवे.संत रैदास को प्रणाम कर उन्होंने अपनी राह पकड़ी.सच ही कहा है किसी ने क़ि-------------------------
      
                               '' खून-पसीने की मेहनत का ,जो भी मिल जाए अच्छा है
                                 किसी और का हक जो छीने, वही व्यक्ति  तो गन्दा है '' 

No comments:

Post a Comment

Share Your Views on this..

Most trending searches in the world

  The most searched topics in the world change hour by hour, but based on the latest Google Trends and global search activity, these are amo...

Popular Posts