Sunday, 25 December 2011
आवारगी- 2
आवारगी मेरी फ़ितरद मेँ है
,
आवारगी मेरी आदत मेँ है ।
ज़िंदगी तो वही थी जो आवारगी में बीती
,
मजा कहाँ कोई इस शराफत मेँ है ।
,
हौसला, हिम्मत और ताकत चाहिए,
लुफ्त बहुत ही बगावत मेँ है ।
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और तो कोई बात नहीं - गज़ल/ डॉ मनीष कुमार मिश्रा
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